विनोद कुमार झा
भारत और अमेरिका के आर्थिक संबंधों में एक बार फिर महत्वपूर्ण मोड़ आया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के बीच हालिया टेलीफोन वार्ता के बाद व्यापार नीति में जो बदलाव सामने आए हैं, वे केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वैश्विक भू-राजनीति और ऊर्जा सुरक्षा के व्यापक परिदृश्य को भी प्रभावित करेंगे।
सबसे बड़ी खबर यह है कि अमेरिका ने भारत पर लगाए गए पारस्परिक टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत कर दिया है। साथ ही, रूसी तेल खरीद को लेकर लगाया गया 25 प्रतिशत अतिरिक्त टैरिफ भी हटाने की घोषणा की गई है। यह निर्णय ऐसे समय में आया है जब दोनों देशों के बीच व्यापारिक तनाव अपने चरम पर पहुंच चुका था और अगस्त 2025 तक भारत पर कुल 50 प्रतिशत टैरिफ लागू हो चुका था। पिछले वर्ष जब अमेरिका ने भारत पर क्रमिक रूप से टैरिफ बढ़ाए थे, तब यह स्पष्ट हो गया था कि वाशिंगटन नई वैश्विक व्यापार व्यवस्था में भारत को दबाव में रखना चाहता है। भारतीय इस्पात, एल्युमिनियम और कुछ अन्य उत्पादों पर 25 प्रतिशत पारस्परिक टैरिफ, और फिर रूसी तेल खरीद को लेकर अतिरिक्त 25 प्रतिशत टैरिफ कुल मिलाकर 50 प्रतिशत शुल्क ने भारतीय निर्यातकों के लिए गंभीर चुनौती खड़ी कर दी थी।
अब 18 प्रतिशत पर कटौती यह संकेत देती है कि अमेरिका भी समझ रहा है कि भारत को अलग-थलग करना उसके हित में नहीं है। चीन के मुकाबले भारत को कम टैरिफ देना इस बात का प्रमाण है कि वाशिंगटन नई आर्थिक धुरी में दिल्ली को एक रणनीतिक साझेदार के रूप में देख रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध के बीच भारत द्वारा रूसी तेल खरीदना अमेरिका को नागवार गुजरा था। लेकिन यथार्थ यह है कि भारत की ऊर्जा जरूरतें विशाल हैं, और उसे किफायती ऊर्जा स्रोत चाहिए। अब जब व्हाइट हाउस ने यह कहा है कि भारत ने रूसी तेल खरीद धीरे-धीरे कम करने पर सहमति जताई है, तो यह भारत की कूटनीतिक कुशलता को दर्शाता है जहां उसने अपने हित भी सुरक्षित रखे और पश्चिमी दबाव को भी संतुलित किया। इसके साथ ही अमेरिका से और संभवतः वेनेजुएला से अधिक तेल खरीदने की बात भारत के लिए ऊर्जा आपूर्ति में विविधता लाने का अवसर भी है।
प्रधानमंत्री मोदी ने ट्रंप को “प्रिय मित्र” बताया और 1.4 अरब भारतीयों की ओर से धन्यवाद दिया। वहीं, ट्रंप ने मोदी को “मेरे सबसे अच्छे दोस्तों में से एक” कहा। यह व्यक्तिगत संबंध निश्चित रूप से माहौल को नरम करते हैं, लेकिन भारत के लिए असली परीक्षा यह होगी कि क्या ये संबंध दीर्घकालिक संस्थागत व्यापार समझौते में बदलते हैं। दिलचस्प बात यह है कि जहां ट्रंप ने “व्यापार समझौते” का दावा किया, वहीं मोदी के बयान में इसका सीधा उल्लेख नहीं था। यह भारत की सतर्क कूटनीति को दिखाता है वादा कम, काम ज्यादा। अमेरिकी अधिकारियों के अनुसार, अब भारत पर लगाए गए टैरिफ चीन (20%), बांग्लादेश (20%), इंडोनेशिया (19%) और वियतनाम (34%) की तुलना में कम हैं। यह स्पष्ट रूप से अमेरिका की “चीन+1” रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह आपूर्ति श्रृंखला को चीन से हटाकर भारत जैसे लोकतांत्रिक देशों की ओर मोड़ना चाहता है। भारत के लिए यह सुनहरा अवसर है लेकिन इसके लिए उसे अपने श्रम कानून, बुनियादी ढांचा, लॉजिस्टिक्स और विनिर्माण प्रतिस्पर्धा को और मजबूत करना होगा। विदेश मंत्री एस. जयशंकर की वाशिंगटन यात्रा और क्रिटिकल मिनरल्स मिनिस्ट्रियल में भागीदारी बताती है कि भारत केवल व्यापार का खिलाड़ी नहीं, बल्कि रणनीतिक साझेदार बन रहा है। सेमीकंडक्टर, दुर्लभ खनिज, रक्षा सहयोग और स्वच्छ ऊर्जा में भारत-अमेरिका साझेदारी आने वाले वर्षों में निर्णायक साबित हो सकती है।
यह घटनाक्रम भारत के लिए जीत भी है और चुनौती भी। जीत इसलिए कि टैरिफ घटा, व्यापारिक माहौल सुधरा और रणनीतिक महत्व बढ़ा। चुनौती इसलिए कि अब भारत को अपने निर्यात, विनिर्माण और ऊर्जा नीति में दीर्घकालिक सुधार करने होंगे। मोदी सरकार के लिए यह समय कूटनीति के साथ-साथ आर्थिक सुधारों को तेज करने का है। क्योंकि वैश्विक व्यवस्था बदल रही है और इसमें वही देश आगे बढ़ेंगे जो आर्थिक रूप से मजबूत, राजनीतिक रूप से स्थिर और रणनीतिक रूप से चतुर होंगे। भारत सही दिशा में है, लेकिन मंज़िल अभी दूर है।
