शीशे से टूटते पत्थर...

 लेखक : विनोद कुमार झा

शहर के बिल्कुल किनारे पर बसा था छोटा-सा मोहल्ला  पतली गलियाँ, जर्जर मकान, और उन मकानों के बीच फैले रिश्तों के अनदेखे धागे। बाहर से देखने पर यह मोहल्ला साधारण लगता था, लेकिन भीतर इसकी दीवारों में कहानियाँ साँस लेती थीं। इन्हीं गलियों में रहता था आरव, एक संवेदनशील युवक, जो शीशे के काम की छोटी-सी दुकान चलाता था। लोग कहते थे कि उसके हाथों में जादू है वह टूटे शीशों को जोड़ सकता था, लेकिन दिलों के दरारों को नहीं।

उसी मोहल्ले में रहती थी मीरा, एक साधारण-सी लड़की, जिसकी आँखों में अनकहे सपने थे। उसके पिता रिक्शा चलाते थे और माँ घरों में काम करती थी। गरीबी के बावजूद, उनके घर में स्नेह की कमी नहीं थी। मीरा अक्सर आरव की दुकान के सामने से गुजरती और काँच के रंगीन टुकड़ों को निहारती रहती। उसे लगता था जैसे हर शीशा उसकी जिंदगी का कोई अनकहा हिस्सा बयान कर रहा हो।

एक दिन मोहल्ले में नया निर्माण कार्य शुरू हुआ। बड़े ठेकेदार आए और पुराने घरों को गिराने की बात करने लगे। वे चाहते थे कि लोग अपना पुश्तैनी मोहल्ला छोड़ दें। इस खबर से पूरे इलाके में हलचल मच गई। कुछ लोग खुश थे कि उन्हें पैसा मिलेगा, तो कुछ डर रहे थे कि वे अपनी पहचान खो देंगे।

आरव का घर भी उन्हीं मकानों में था जिन्हें तोड़ा जाना था। वह परेशान था उसका बचपन, उसकी माँ की हँसी, उसके पिता की यादें सब इसी घर में बसी थीं। उसने ठेकेदारों के सामने विरोध किया, पर उसकी आवाज़ पत्थर पर पड़ते शीशे की तरह बिखर जाती थी।

इसी बीच आरव और मीरा के बीच नज़दीकियाँ बढ़ने लगीं। वे रोज़ शाम को मोहल्ले के पुराने पीपल के पेड़ के नीचे मिलते। मीरा कहती, “अगर घर टूट भी जाए, तो क्या हमारी यादें भी टूट जाएँगी?”

आरव चुप रहता, पर उसकी आँखों में डर साफ झलकता था।एक रात भारी बारिश हुई। सुबह जब लोग उठे तो देखा कि कई घरों की दीवारें दरक चुकी थीं। ठेकेदारों ने तुरंत बुलडोज़र भेज दिए। मोहल्ले के लोग अपने घरों से सामान निकालने लगे। कहीं रोने की आवाज़ थी, कहीं गुस्सा, कहीं बेबसी।

आरव ने गुस्से में एक बड़ा पत्थर उठाया और बुलडोज़र की ओर फेंक दिया लेकिन वह शीशे की तरह टूटकर बिखर गया। मशीन रुकी नहीं। उस पल उसे समझ आया कि ताकत के सामने अकेला आदमी कितना कमजोर होता है।

मीरा ने उसका हाथ थाम लिया। उसने कहा,“अगर शीशा टूटता है, तो उसे फिर जोड़ा जा सकता है। लेकिन अगर दिल टूट गया, तो सब खत्म हो जाएगा।”

उसी दिन दोनों ने फैसला किया कि वे मोहल्ला छोड़ेंगे, लेकिन रिश्तों को नहीं। वे शहर के दूसरे कोने में एक छोटा कमरा किराए पर लेने चले गए। आरव ने वहाँ नई शीशे की दुकान खोली और मीरा ने सिलाई का काम शुरू किया।

वक्त बीता। जहाँ उनका पुराना मोहल्ला था, वहाँ ऊँची-ऊँची इमारतें खड़ी हो गईं। चमकदार शीशों वाली दीवारें थीं पर उनमें अपनापन नहीं था। लोग लिफ्ट में चढ़ते थे, पर एक-दूसरे से बात नहीं करते थे।

एक दिन आरव वहीं काम के सिलसिले में पहुँचा। उसने उन काँच की दीवारों को देखा और मुस्कुराया ये वही शीशे थे, पर इनमें मोहल्ले की मिट्टी की महक नहीं थी। उसे लगा जैसे पत्थरों ने शीशा नहीं, बल्कि इंसानों का दिल तोड़ दिया हो। वह घर लौटा तो मीरा उसका इंतज़ार कर रही थी। उन्होंने साथ बैठकर चाय पी और पुराने दिनों को याद किया।

आरव ने कहा, “हमारा घर टूट गया, पर हमारा रिश्ता नहीं टूटा।”मीरा ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “क्योंकि प्यार शीशा नहीं है, जो पत्थर से टूट जाए।”उस रात बारिश फिर हुई, लेकिन इस बार आँसू नहीं थे सिर्फ़ सुकून था।

और कहीं दूर खड़ी चमकती इमारतों के शीशों में उनका अक्स झिलमिला रहा था मानो कह रहा हो कि असली मजबूती ईंट-पत्थर में नहीं, दिलों के जुड़ाव में होती है।

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