राष्ट्र की सुरक्षा, संकल्प और सम्मान का प्रतीक है सेना दिवस

  विनोद कुमार झा

हर वर्ष 15 जनवरी को मनाया जाने वाला सेना दिवस केवल एक तिथि नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता, सुरक्षा और आत्मसम्मान का जीवंत प्रतीक है। यह वही दिन है जब वर्ष 1949 में फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा ने स्वतंत्र भारत के पहले भारतीय थलसेना प्रमुख के रूप में कार्यभार संभाला था। तभी से यह दिन भारतीय सेना के अदम्य साहस, अनुशासन, त्याग और राष्ट्रभक्ति को नमन करने का अवसर बन गया।

भारतीय सेना केवल एक सैन्य बल नहीं, बल्कि देश की आत्मा की रक्षक है। सीमाओं पर तैनात सैनिक कठोर मौसम, दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों और निरंतर खतरे के बीच खड़े रहकर यह सुनिश्चित करते हैं कि देश का हर नागरिक सुरक्षित रहे। जब हम अपने घरों में चैन की नींद सोते हैं, तब कोई जवान बर्फीली चोटियों पर, कोई रेगिस्तान की तपती रेत पर और कोई घने जंगलों में राष्ट्र की सुरक्षा की मशाल थामे खड़ा होता है।

सेना और लोकतंत्र का मजबूत रिश्ता : भारतीय सेना की सबसे बड़ी विशेषता उसका लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अटूट समर्पण है। सेना सत्ता का साधन नहीं, बल्कि संविधान के अधीन रहकर कार्य करने वाली संस्था है। विश्व के अनेक देशों में सैन्य हस्तक्षेप के उदाहरण मिलते हैं, लेकिन भारतीय सेना ने सदैव लोकतंत्र, नागरिक शासन और संवैधानिक मर्यादाओं का सम्मान किया है। यही कारण है कि सेना को जनता का अपार विश्वास प्राप्त है।

युद्ध से आगे की भूमिका : भारतीय सेना की भूमिका केवल युद्ध तक सीमित नहीं है। प्राकृतिक आपदाओं भूकंप, बाढ़, चक्रवात या भूस्खलन के समय सबसे पहले राहत और बचाव कार्यों में सेना ही आगे आती है। चाहे उत्तराखंड की आपदा हो, केरल की बाढ़ या हाल के वर्षों में विभिन्न राज्यों में आई विपत्तियाँ सेना ने मानवीय संवेदना और सेवा भावना का परिचय दिया है। इसके अलावा, संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों में भारतीय सेना की भागीदारी ने वैश्विक स्तर पर देश की प्रतिष्ठा को मजबूत किया है।

आधुनिकीकरण और आत्मनिर्भरता की चुनौती : तेजी से बदलते वैश्विक सुरक्षा परिदृश्य में भारतीय सेना के सामने नई चुनौतियाँ हैं साइबर युद्ध, ड्रोन तकनीक, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाइब्रिड वॉरफेयर। ऐसे में सेना का आधुनिकीकरण समय की मांग है। ‘मेक इन इंडिया’ और ‘आत्मनिर्भर भारत’ के तहत स्वदेशी रक्षा उत्पादन को बढ़ावा देना न केवल रणनीतिक रूप से आवश्यक है, बल्कि आर्थिक दृष्टि से भी लाभकारी है। सेना को आधुनिक हथियारों, बेहतर तकनीक और उन्नत प्रशिक्षण से लैस करना राष्ट्रीय प्राथमिकता होनी चाहिए।

सैनिकों का सम्मान केवल शब्दों में नहीं : सेना दिवस पर भाषण, परेड और श्रद्धांजलि देना महत्वपूर्ण है, लेकिन इससे भी अधिक आवश्यक है कि सैनिकों और उनके परिवारों के कल्याण को ठोस नीतियों के माध्यम से सुनिश्चित किया जाए। शहीदों के परिजनों, दिव्यांग सैनिकों और सेवानिवृत्त जवानों के जीवन की गरिमा बनाए रखना समाज और सरकार दोनों की जिम्मेदारी है। सम्मान केवल नारों से नहीं, बल्कि संवेदनशील प्रशासन और समयबद्ध सहायता से प्रकट होता है।

युवाओं के लिए प्रेरणा : भारतीय सेना देश के युवाओं के लिए प्रेरणा का स्रोत है। अनुशासन, नेतृत्व, निस्वार्थ सेवा और राष्ट्रप्रेम जैसे मूल्य आज के समय में अत्यंत प्रासंगिक हैं। सेना दिवस युवाओं को यह याद दिलाता है कि राष्ट्र निर्माण केवल शब्दों से नहीं, बल्कि कर्म, संकल्प और सेवा से होता है।

सेना दिवस हमें यह सोचने का अवसर देता है कि हम एक राष्ट्र के रूप में अपनी सेना के प्रति कितने उत्तरदायी हैं। सीमाओं पर खड़ा जवान किसी एक वर्ग, भाषा या क्षेत्र का नहीं, बल्कि पूरे देश का प्रतिनिधि होता है। उसका बलिदान हमारी स्वतंत्रता की कीमत है। इस सेना दिवस पर संकल्प लिया जाना चाहिए कि हम केवल आज नहीं, हर दिन भारतीय सेना के सम्मान, सशक्तिकरण और समर्थन के लिए खड़े रहेंगे।

भारतीय सेना अमर रहे क्योंकि उसकी शक्ति में ही राष्ट्र की शक्ति निहित है।

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