विनोद कुमार झा
सुबह की ठंडी हवा जब कच्चे आंगन से होकर गुजरती, तो मिट्टी की सोंधी खुशबू के साथ एक सुकून भी लेकर आती। उसी आंगन के एक कोने में बैठी रहती थी शांति। नाम की तरह ही स्वभाव में ठहराव, आँखों में अथाह गहराई और माथे पर जिम्मेदारियों की लकीरें। उसका आंचल सिर्फ कपड़े का टुकड़ा नहीं था, वह एक पूरी दुनिया था जिसमें ममता की गर्माहट भी थी और जरूरत पड़ने पर कठोरता की ठंडी धार भी।
शांति की सुबहें हमेशा जल्दी शुरू होतीं। सूरज निकलने से पहले उठकर चूल्हा जलाना, बच्चों के लिए रोटियाँ सेंकना, सास की दवाइयाँ तैयार करना और पति के खेत जाने से पहले उसका थैला भर देना ये सब उसके दिन की सामान्य शुरुआत थी। पर इन रोज़मर्रा के कामों के बीच, उसके मन में एक अलग ही सपना पलता रहता अपने बच्चों को उस दुनिया तक पहुँचाने का, जहाँ तक वह खुद कभी नहीं जा सकी थी।
उसका बड़ा बेटा रवि, किताबों में डूबा रहने वाला, थोड़ा संकोची स्वभाव का था। छोटी बेटी मीरा, चंचल और सवालों से भरी। शांति जानती थी कि इन दोनों के रास्ते अलग हैं, पर मंज़िल एक सम्मान और आत्मनिर्भरता। वह बच्चों से बहुत प्यार करती थी, पर उसका प्यार सिर्फ लाड़ नहीं था; उसमें अनुशासन की सख्ती भी शामिल थी। जब रवि खेलने के बहाने पढ़ाई टाल देता, तो शांति का स्वर सख्त हो जाता “आज नहीं पढ़ोगे, तो कल पछताओगे।” और जब मीरा देर रात तक लालटेन के नीचे बैठी लिखती रहती, तो वही शांति उसका सिर सहलाते हुए कहती “थक गई होगी, थोड़ी देर आराम भी जरूरी है।”
गाँव का समाज शांति को हमेशा समझ नहीं पाया। लोग कहते “इतनी पढ़ाई-लिखाई बच्चों के लिए ठीक नहीं, लड़का खेत संभाल लेगा, लड़की घर।” कुछ ताने सीधे उसके कानों तक आते, कुछ पीठ पीछे। पर शांति ने तानों को कभी अपने आंचल में जगह नहीं दी। वह जानती थी कि समाज की बातें मौसम की तरह होती हैं, आज ठंडी, कल गर्म पर बच्चों का भविष्य स्थायी होता है।
पति रामदीन सरल स्वभाव का था, पर कभी-कभी समाज की बातों से डगमगा जाता। एक शाम उसने कहा, “इतना खर्चा पढ़ाई पर… लोग क्या कहेंगे?” शांति ने उस दिन बहुत शांत स्वर में उत्तर दिया, “लोग आज कुछ कहेंगे, कल कुछ और पर अगर हमारे बच्चे आगे बढ़े, तो वही लोग गर्व करेंगे।” उस दिन रामदीन ने पहली बार शांति की आँखों में वह दृढ़ता देखी, जो किसी मजबूत दीवार से कम नहीं थी।
समय के साथ कठिनाइयाँ बढ़ीं। फसल खराब हुई, पैसों की तंगी आई। कई रातें ऐसी थीं जब शांति ने अपने हिस्से की रोटी बच्चों को दे दी। पर सुबह वही चेहरे पर मुस्कान ओढ़े खड़ी होती जैसे ठंडी हवाओं में भी आंचल की गर्मी बनी रहती है। वह बच्चों को कभी अपनी परेशानियों का बोझ नहीं बनने देती। “तुम बस मेहनत करो,” वह कहती, “बाकी रास्ता खुद बन जाएगा।”
रवि का शहर के कॉलेज में चयन हुआ, तो गाँव में चर्चा का विषय बन गया। कुछ ने बधाई दी, कुछ ने कहा “अब शहर जाकर भूल जाएगा।” शांति ने बेटे को विदा करते समय आंचल से उसका माथा छुआ और कहा, “जहाँ भी रहो, अपनी जड़ों को मत भूलना।” मीरा ने उस दिन माँ को पहली बार रोते देखा, पर वह आँसू कमजोर नहीं थे, वे गर्व से भरे थे।
मीरा खुद भी सपनों के पीछे चल पड़ी। समाज ने फिर सवाल उठाए “लड़की को इतना बाहर भेजना ठीक है?” शांति ने इस बार भी बिना हिचक कहा “ठीक वही है, जो उसे मजबूत बनाए।” उसकी कठोरता लोगों को चुभती थी, पर बच्चों के लिए वही ढाल थी।
साल बीतते गए। रवि नौकरी में सफल हुआ, मीरा अपने क्षेत्र में नाम कमाने लगी। जब वे छुट्टियों में घर लौटते, तो वही ठंडी हवा, वही आंगन, और बीच में बैठी शांति थोड़ी झुकी हुई, पर आँखों में वही चमक। बच्चे समझ चुके थे कि माँ का आंचल सिर्फ बचपन की शरण नहीं था, बल्कि जीवन भर का संबल था।
एक दिन गाँव के उसी चौपाल पर लोग शांति का नाम सम्मान से लेने लगे। वही समाज, जिसने कभी सवाल उठाए थे, अब उदाहरण देने लगा। शांति चुपचाप सुनती रही। उसे न तारीफ की जरूरत थी, न मान्यता की। उसकी सबसे बड़ी जीत उसके बच्चों की आत्मविश्वास से भरी आँखें थीं।
शाम को ठंडी हवा फिर चली। शांति आंगन में बैठी थी, आंचल में बचपन की यादें, कठोर फैसलों की गूँज और ममता की अनकही कहानियाँ समेटे। उसने आसमान की ओर देखा और हल्के से मुस्कुराई। उसे पता था, उसके आंचल की छांव में पले ये ठंडी हवाओं के झोंके, अब दूर-दूर तक खुशबू बनकर फैल चुके हैं।
