मिथिलांचल में मां दुर्गा की खोइंछा भरने की परंपरा, आस्था और समर्पण का अनूठा संगम

 -मां की विदाई के समय सुहागिन महिलाएं भरती हैं खोइंछा, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की करती हैं कामना

ख़बर मॉर्निंग , विशेष आलेख

मिथिलांचल की संस्कृति, परंपराओं और धार्मिक आस्थाओं में मां दुर्गा की पूजा का विशेष स्थान है। यहां शारदीय नवरात्र और दुर्गापूजा केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि लोकजीवन, पारिवारिक संबंधों और नारी सम्मान से जुड़ा एक भावनात्मक पर्व भी है। इन्हीं परंपराओं में मां दुर्गा की विदाई के समय उन्हें खोइंछा भरने की परंपरा बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। इस अवसर पर महिलाएं मां को अपनी बेटी और घर की सुहागिन के रूप में मानकर उनकी गोद में श्रद्धापूर्वक शुभ सामग्रियां अर्पित करती हैं। यह परंपरा मां के प्रति प्रेम, श्रद्धा, ममता और समर्पण का प्रतीक है।

मिथिलांचल में खोइंछा भरने की परंपरा का संबंध लोकसंस्कृति और पारिवारिक भावनाओं से गहराई से जुड़ा हुआ है। मैथिली समाज में जब किसी बेटी को विदाई दी जाती है, तो उसकी मां और परिवार की महिलाएं उसकी आंचल में चावल, हल्दी, दूब, सुपारी, सिक्का तथा अन्य शुभ वस्तुएं रखकर सुखी जीवन और समृद्धि का आशीर्वाद देती हैं। इसी भाव के साथ मां दुर्गा को भी बेटी मानकर उनकी विदाई के समय खोइंछा भरा जाता है। इस दौरान महिलाओं की आंखें नम हो जाती हैं और पूरा वातावरण भक्ति तथा भावुकता से भर उठता है।

धार्मिक मान्यता के अनुसार, मां दुर्गा को खोइंछा अर्पित करना सुख-समृद्धि, पारिवारिक मंगल और सौभाग्य की कामना से जुड़ा है। महिलाएं मां से अपने परिवार की खुशहाली, संतान की उन्नति, पति की दीर्घायु और घर में सुख-शांति बनाए रखने की प्रार्थना करती हैं। खोइंछा में रखी जाने वाली सामग्रियां शुभता, उर्वरता, समृद्धि और मंगलकामना का प्रतीक मानी जाती हैं। हालांकि, इसकी सामग्री और विधि परिवारों तथा स्थानीय परंपराओं के अनुसार अलग-अलग हो सकती है।

मिथिलांचल में दुर्गापूजा के दौरान मां के दर्शन, पूजा-अर्चना और आरती के साथ उनकी विदाई का क्षण भी विशेष महत्व रखता है। महिलाएं मां के चरणों में शीश झुकाकर अपनी श्रद्धा व्यक्त करती हैं और खोइंछा भरते हुए उनसे अगले वर्ष फिर आने की प्रार्थना करती हैं। यह दृश्य मां और बेटी के बीच के आत्मीय रिश्ते की याद दिलाता है। लोकमान्यता में मां दुर्गा को मायके आने वाली बेटी के रूप में देखने की भावना इस परंपरा को और भी भावुक बना देती है।

खोइंछा भरने की यह परंपरा केवल धार्मिक विश्वास तक सीमित नहीं है, बल्कि मिथिलांचल की सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा है। यह महिलाओं की आस्था, पारिवारिक संस्कारों और पीढ़ियों से चली आ रही लोकपरंपराओं को जीवंत बनाए रखती है। आधुनिक समय में भी यह परंपरा अपनी भावनात्मक गरिमा के साथ कायम है। मां दुर्गा की विदाई के समय भरा जाने वाला खोइंछा मानो यह संदेश देता है कि मां अपने भक्तों के जीवन में सुख, शांति और समृद्धि का आशीर्वाद देकर जाती हैं और भक्त अगले वर्ष उनके पुनः आगमन की प्रतीक्षा करते हैं।

मां दुर्गा की खोइंछा भरने की परंपरा मिथिलांचल की उस अनूठी सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक है, जहां देवी केवल पूजनीय शक्ति नहीं, बल्कि घर की बेटी, परिवार की संरक्षिका और सुख-समृद्धि की अधिष्ठात्री भी हैं।

Post a Comment

Previous Post Next Post