राजनीतिक मझधार में क्या खोया, क्या पाया!

 -आजादी से वर्तमान तक सत्ता, शिक्षा, बेरोजगारी और चुनावी वादों का हिसाब

विनोद कुमार झा 

भारत की आजादी केवल अंग्रेजों की गुलामी से मुक्ति नहीं थी, बल्कि एक ऐसे राष्ट्र के निर्माण का सपना भी थी, जहां गरीब को सम्मान, युवाओं को रोजगार, बच्चों को गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और प्रत्येक नागरिक को समान अवसर मिले। 15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो जनता ने बेहतर भविष्य की उम्मीदें संजोईं। आजादी के लगभग आठ दशक बाद भारत ने विज्ञान, तकनीक, कृषि, उद्योग, सड़क, संचार और लोकतंत्र के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति की है। इसके बावजूद बेरोजगारी, महंगाई, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक असमानता जैसे सवाल बने हुए हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि राजनीतिक मझधार में जनता ने आखिर क्या खोया और क्या पाया?

आजादी से पहले का भारत संघर्ष, गरीबी और सीमित अवसरों का भारत था। अंग्रेजी शासन के दौरान शिक्षा और औद्योगिक विकास का लाभ समाज के बड़े हिस्से तक नहीं पहुंच पाया था। स्वतंत्रता सेनानियों ने ऐसे भारत का सपना देखा, जहां जनता अपने भविष्य का फैसला स्वयं कर सके। आजादी के साथ देश को विभाजन, विस्थापन और सांप्रदायिक हिंसा की त्रासदी भी झेलनी पड़ी। नवस्वतंत्र भारत के सामने लोकतंत्र की स्थापना, आर्थिक विकास, खाद्य सुरक्षा और शिक्षा का विस्तार जैसी बड़ी चुनौतियां थीं।

आजादी के बाद के पहले 20 वर्षों में कांग्रेस के नेतृत्व में राष्ट्र निर्माण की नींव रखी गई। जवाहरलाल नेहरू के कार्यकाल में सार्वजनिक क्षेत्र, बड़े बांधों, वैज्ञानिक संस्थानों, तकनीकी शिक्षा और औद्योगिक विकास पर जोर दिया गया। लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत करने के साथ योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था की शुरुआत हुई। हालांकि गरीबी, अशिक्षा और सीमित रोजगार के अवसर बड़ी चुनौतियां बने रहे। शिक्षा संस्थानों का विस्तार हुआ, लेकिन ग्रामीण और गरीब परिवारों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने का लक्ष्य अधूरा रहा।

आजादी के 20 से 40 वर्षों के बीच राजनीति में सत्ता परिवर्तन और सामाजिक बदलाव का दौर आया। 1975 से 1977 के आपातकाल ने नागरिक स्वतंत्रता और लोकतांत्रिक अधिकारों पर गंभीर सवाल खड़े किए। 1977 में जनता पार्टी की सरकार बनी, लेकिन आंतरिक मतभेदों के कारण वह अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर सकी। 1980 में कांग्रेस फिर सत्ता में लौटी। इसी अवधि में हरित क्रांति ने खाद्यान्न उत्पादन बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, हालांकि उसका लाभ सभी क्षेत्रों और किसानों तक समान रूप से नहीं पहुंचा। शिक्षा और रोजगार के अवसर बढ़े, लेकिन बढ़ती आबादी के अनुरूप पर्याप्त रोजगार उपलब्ध कराना चुनौती बना रहा।

आजादी के 40 से 70 वर्षों के बीच भारतीय राजनीति और अर्थव्यवस्था ने नई दिशा पकड़ी। 1991 में पी.वी. नरसिंह राव के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की। निजी क्षेत्र, सूचना प्रौद्योगिकी, दूरसंचार और सेवा क्षेत्र में नए अवसर पैदा हुए। मंडल आयोग की सिफारिशों के लागू होने से सामाजिक न्याय और पिछड़े वर्गों के प्रतिनिधित्व पर राष्ट्रीय बहस तेज हुई। इस दौरान भाजपा, जनता दल, वामपंथी और विभिन्न क्षेत्रीय दलों ने भी केंद्र तथा राज्यों की राजनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली सरकार ने राष्ट्रीय राजमार्गों और दूरसंचार के विस्तार को प्राथमिकता दी। मनमोहन सिंह के नेतृत्व वाली यूपीए सरकारों के दौरान मनरेगा, सूचना का अधिकार और शिक्षा का अधिकार जैसे महत्वपूर्ण कानून सामने आए। इन प्रयासों ने रोजगार सुरक्षा, पारदर्शिता और शिक्षा तक पहुंच को नया आधार दिया। हालांकि योजनाओं के क्रियान्वयन, रोजगार की गुणवत्ता और लाभों के समान वितरण पर सवाल भी उठते रहे।

2014 के बाद भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने विकास, डिजिटल सेवाओं और बुनियादी ढांचे पर जोर दिया। स्वच्छ भारत मिशन, जनधन योजना, उज्ज्वला योजना, आयुष्मान भारत, डिजिटल भुगतान और सड़क निर्माण जैसी पहलों को प्रमुखता मिली। सरकार ने वित्तीय समावेशन, सरकारी सेवाओं के डिजिटलीकरण और कल्याणकारी योजनाओं को अपनी उपलब्धियों के रूप में प्रस्तुत किया। वहीं विपक्षी दलों ने बेरोजगारी, महंगाई, कृषि संकट और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे उठाए। नोटबंदी और जीएसटी के शुरुआती क्रियान्वयन के प्रभावों पर भी बहस हुई। विभिन्न राज्यों में कांग्रेस, भाजपा, वामपंथी और क्षेत्रीय दलों की सरकारों ने अपनी नीतियों के अनुसार शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और कल्याणकारी योजनाओं को आगे बढ़ाया।

शिक्षा के क्षेत्र में भारत ने लंबी दूरी तय की है। सरकारी आंकड़ों के अनुसार, 1951 में देश की साक्षरता दर 18.32 प्रतिशत थी, जो 2011 की जनगणना में बढ़कर 74.04 प्रतिशत हो गई। यह शिक्षा के विस्तार की महत्वपूर्ण उपलब्धि है। लेकिन साक्षरता बढ़ना और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा मिलना अलग-अलग बातें हैं। सरकारी विद्यालयों में शिक्षकों की उपलब्धता, शिक्षा का स्तर, उच्च शिक्षा की लागत और डिग्री के अनुरूप रोजगार आज भी महत्वपूर्ण प्रश्न हैं।

बेरोजगारी आज भी राजनीति की सबसे बड़ी चुनौतियों में शामिल है। सरकारी आवधिक श्रम बल सर्वेक्षण की 2025 की वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 15 वर्ष और उससे अधिक आयु के माध्यमिक या उससे अधिक शिक्षा प्राप्त व्यक्तियों में सामान्य स्थिति के आधार पर बेरोजगारी दर 2024 के 7 प्रतिशत से घटकर 2025 में 6.5 प्रतिशत दर्ज की गई। हालांकि केवल बेरोजगारी दर से रोजगार की पूरी तस्वीर सामने नहीं आती। नियमित नौकरी, उचित वेतन, सामाजिक सुरक्षा और योग्यता के अनुरूप काम मिलना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

राजनीतिक मंचों से भाषण और जमीनी परिणाम के बीच की दूरी भी जनता के मूल्यांकन का विषय है। कांग्रेस ने विभिन्न दौर में गरीबी उन्मूलन, धर्मनिरपेक्षता और कल्याणकारी योजनाओं पर जोर दिया। भाजपा ने राष्ट्रवाद, सुशासन, बुनियादी ढांचे और विकास को प्रमुखता दी। वामपंथी दलों ने श्रमिक अधिकारों और सामाजिक समानता, जबकि क्षेत्रीय दलों ने स्थानीय विकास, पहचान और सामाजिक प्रतिनिधित्व के मुद्दे उठाए। इन सभी दलों के शासनकाल का मूल्यांकन उनके समय, नीतियों और वास्तविक परिणामों के आधार पर होना चाहिए।

केवल नए विद्यालय खोलना शिक्षा की सफलता नहीं, बल्कि बच्चों का सीखना भी जरूरी है। केवल रोजगार के वादे करना पर्याप्त नहीं, बल्कि यह देखना भी जरूरी है कि कितने युवाओं को स्थायी और सम्मानजनक काम मिला। इसी तरह सड़क, अस्पताल और डिजिटल सेवाओं की उपलब्धियां तभी व्यापक अर्थ रखती हैं, जब उनका लाभ आम नागरिक तक पहुंचे। सत्ता पक्ष को अपने काम का हिसाब देना चाहिए और विपक्ष को आलोचना के साथ व्यावहारिक विकल्प भी प्रस्तुत करने चाहिए।

आखिर जनता ने क्या खोया और क्या पाया? भारत ने लोकतंत्र, वैज्ञानिक क्षमता, कृषि उत्पादन, औद्योगिक विकास, शिक्षा के विस्तार और तकनीकी प्रगति के रूप में महत्वपूर्ण उपलब्धियां हासिल की हैं। लेकिन गरीबी, बेरोजगारी, शिक्षा की गुणवत्ता और आर्थिक अवसरों की असमानता जैसी चुनौतियां अब भी मौजूद हैं। किसी एक राजनीतिक दल को सभी उपलब्धियों का श्रेय या सभी समस्याओं का जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं होगा। आजादी से लेकर वर्तमान तक हर सरकार की नीतियों और परिणामों का निष्पक्ष आकलन जरूरी है।

अतः लोकतंत्र में जनता केवल वोट देने वाली भीड़ नहीं, बल्कि सरकारों की जवाबदेही तय करने वाली सबसे बड़ी शक्ति है। चुनावी नारों, बड़े भाषणों और घोषणाओं से आगे बढ़कर रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य और जनकल्याण के वास्तविक परिणामों को देखना होगा। कांग्रेस हो या भाजपा, वामपंथी दल हों या क्षेत्रीय पार्टियां सभी से यह पूछा जाना चाहिए कि उन्होंने जनता के जीवन में क्या बदलाव लाया।

क्योंकि आजादी की असली सार्थकता केवल सत्ता बदलने में नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन में सम्मान, रोजगार, गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और समान अवसर सुनिश्चित करने में है। राजनीतिक मंचों से गूंजने वाले भाषण समय के साथ शांत हो जाते हैं, लेकिन सरकारों के कामकाज के परिणाम पीढ़ियों तक याद रखे जाते हैं।


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