आखिर दोषी कौन...

 "जब हम खुद दोषी हैं तो किसे दोषी कहूँ..."

लेखक: विनोद कुमार झा 

शाम का समय था। आसमान में ढलते सूरज की लालिमा फैली हुई थी। पार्क की एक पुरानी बेंच पर बैठे हुए राघव की आँखें कहीं दूर शून्य में टिकी थीं। उसके चेहरे पर गहरी उदासी और पछतावे की लकीरें साफ दिखाई दे रही थीं। ऐसा लग रहा था जैसे वह अपने जीवन के बीते हुए वर्षों को एक-एक करके याद कर रहा हो।

राघव एक सरकारी विद्यालय में शिक्षक था। समाज में उसकी अच्छी प्रतिष्ठा थी। लोग उसका सम्मान करते थे। लेकिन आज वह स्वयं की नजरों में गिर चुका था। उसकी आँखों के सामने बार-बार एक ही प्रश्न घूम रहा था "आखिर दोषी कौन है?"

कुछ दिनों पहले उसके पिता का निधन हुआ था। अंतिम संस्कार के बाद जब वह घर लौटा तो उसे अपने पिता की पुरानी डायरी मिली। उस डायरी के पन्नों में पिता की भावनाएँ, उनके संघर्ष और उनकी उपेक्षा का दर्द भरा हुआ था।

डायरी के पहले पन्ने पर लिखा था, "बच्चों को बड़ा करने में पूरी जिंदगी लगा दी। उनकी हर खुशी को अपनी खुशी समझा। आज उम्र के इस पड़ाव पर जब सहारे की जरूरत है, तब सब अपने-अपने जीवन में व्यस्त हैं। शायद यही समय का नियम है।"

राघव यह पढ़कर कुछ क्षण के लिए ठिठक गया। उसने आगे पढ़ना शुरू किया। "आज फिर पूरे दिन किसी ने मुझसे ठीक से बात नहीं की। राघव सुबह जल्दी निकल गया। बहू भी अपने काम में व्यस्त रही। मैं समझता हूँ कि सभी के अपने-अपने काम हैं, लेकिन कभी-कभी दो मीठे शब्द भी जीवन को आसान बना देते हैं।"

राघव की आँखों में आँसू आ गए। उसे याद आने लगा कि कैसे पिछले कुछ वर्षों से वह अपने काम, अपने बच्चों और अपनी जिम्मेदारियों में इतना उलझ गया था कि अपने बूढ़े पिता की भावनाओं को समझ ही नहीं पाया।

उसे हमेशा लगता था कि वह अपने पिता के लिए बहुत कुछ कर रहा है। अच्छे कपड़े, दवाइयाँ, आरामदायक कमरा सब कुछ तो था। लेकिन वह यह भूल गया था कि बुजुर्गों को केवल सुविधाएँ नहीं, अपनापन भी चाहिए होता है।

उस रात राघव सो नहीं पाया। उसके मन में बचपन की यादें उमड़ने लगीं। उसे याद आया जब वह छोटा था और स्कूल जाने से डरता था। उसके पिता उसे कंधे पर बैठाकर स्कूल छोड़ने जाते थे। जब वह बीमार पड़ता, तो पूरी रात उसके सिरहाने बैठकर जागते रहते। अपनी जरूरतों को भूलकर उन्होंने अपने बच्चों के सपनों को पूरा किया।

लेकिन जब पिता बूढ़े हो गए, तो वही बेटा उनके लिए समय नहीं निकाल पाया। अगले दिन राघव अपने मित्र सुरेश से मिलने गया। सुरेश एक सामाजिक कार्यकर्ता था।

राघव ने भारी मन से पूछा, "यार, बताओ आखिर दोषी कौन है? मैं अपने पिता को सारी सुविधाएँ देता था। फिर भी वे अकेले क्यों महसूस करते रहे?"

सुरेश ने कुछ देर चुप रहकर कहा, "दोष किसी एक व्यक्ति का नहीं होता। लेकिन कभी-कभी हम अपनी जिम्मेदारियों को केवल भौतिक सुविधाओं तक सीमित कर देते हैं। हमें लगता है कि पैसा और आराम ही सब कुछ है। जबकि इंसान को सबसे ज्यादा जरूरत प्रेम, सम्मान और समय की होती है।"

राघव चुप हो गया। सुरेश की बात उसके दिल में उतर गई। घर लौटते समय उसने सड़क किनारे एक वृद्धा को बैठे देखा। उनके कपड़े साधारण थे। पास में एक छोटा-सा थैला रखा था।

राघव उनके पास गया और पूछा, "माँ जी, आप यहाँ अकेली क्यों बैठी हैं?"

वृद्धा मुस्कुराईं। "बेटा, बच्चे बड़े शहरों में रहते हैं। पैसे भेज देते हैं। लेकिन मिलने का समय नहीं मिलता। मैं उनकी मजबूरी समझती हूँ। फिर भी कभी-कभी मन करता है कि कोई पास बैठकर दो बातें कर ले।" उनकी बात सुनकर राघव के मन में जैसे कोई तीर चुभ गया। उसने महसूस किया कि यह केवल उसके पिता की कहानी नहीं थी। यह समाज के हजारों बुजुर्गों की कहानी थी।

समय बीतता गया। एक दिन विद्यालय में नैतिक शिक्षा पर भाषण देने का अवसर मिला। राघव मंच पर खड़ा था। सामने सैकड़ों छात्र बैठे थे। उसने बच्चों से पूछा, "तुम में से कितने लोग रोज अपने दादा-दादी या माता-पिता के साथ कुछ समय बिताते हैं?" बहुत कम हाथ उठे।

राघव ने गहरी साँस ली और कहा, "हम जीवन में सफलता के पीछे भागते हैं। अच्छे अंक, अच्छी नौकरी, बड़ा घर, बड़ी गाड़ी सब कुछ पाने की कोशिश करते हैं। लेकिन इस दौड़ में अक्सर उन लोगों को भूल जाते हैं जिन्होंने हमें चलना सिखाया था। "पूरा हाल शांत था।

उसने आगे कहा, "एक दिन जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तब एहसास होता है कि सबसे बड़ी कमी पैसे की नहीं थी, समय की थी। सबसे बड़ी गरीबी संसाधनों की नहीं, रिश्तों की थी। "उसकी आँखें भर आईं।

उस दिन के बाद राघव ने समाज में जागरूकता फैलाने का संकल्प लिया। वह वृद्धाश्रम जाने लगा। बुजुर्गों के साथ समय बिताने लगा। छात्रों को परिवार के महत्व के बारे में समझाने लगा। लेकिन उसके दिल का एक कोना अब भी खाली था।

एक शाम वह अपने पिता की तस्वीर के सामने बैठा था। उसने तस्वीर को देखते हुए कहा, "पिताजी, मैं आपको सारी सुविधाएँ देता रहा, लेकिन आपका अकेलापन नहीं समझ पाया। मैं सोचता रहा कि मैं एक अच्छा बेटा हूँ। लेकिन शायद अच्छा बेटा होने का अर्थ केवल खर्च उठाना नहीं होता।"

उसकी आँखों से आँसू बह निकले। "आज मैं बार-बार सोचता हूँ कि आखिर दोषी कौन है? समय को दोष दूँ? परिस्थितियों को दोष दूँ? आधुनिक जीवन को दोष दूँ? या फिर स्वयं को?"

कुछ क्षण बाद उसने स्वयं ही उत्तर दिया,  "जब मैं खुद दोषी हूँ तो किसे दोषी कहूँ।" उसे महसूस हुआ कि जीवन में सबसे बड़ी गलती अक्सर वही होती है जिसे हम गलती मानते ही नहीं।

हम अपने प्रियजनों को खोने के बाद समझते हैं कि उनका महत्व क्या था। हम उनके चले जाने के बाद उनकी आवाज़ सुनना चाहते हैं। हम उनके न होने पर उनके साथ बिताने के लिए समय खोजते हैं। लेकिन तब बहुत देर हो चुकी होती है।

राघव की कहानी धीरे-धीरे पूरे शहर में चर्चा का विषय बन गई। लोग उससे प्रेरणा लेने लगे। कई युवाओं ने अपने माता-पिता और दादा-दादी के साथ समय बिताना शुरू किया।

राघव जब भी किसी मंच पर बोलता, तो अंत में केवल एक बात कहता, "रिश्तों की कीमत उनके खो जाने के बाद मत समझिए। अपने लोगों के लिए समय निकालिए। क्योंकि जीवन की सबसे बड़ी त्रासदी मृत्यु नहीं, बल्कि वह पछतावा है जो हमारे दिल में रह जाता है।"

और फिर वह मुस्कुराते हुए कहता , "अगर कभी आपके मन में यह सवाल आए कि आखिर दोषी कौन है, तो एक बार स्वयं के भीतर झाँककर जरूर देखिए। शायद उत्तर वहीं मिल जाए। "उस दिन के बाद राघव के जीवन का उद्देश्य बदल गया था।

वह जान चुका था कि दुनिया में सबसे कठिन न्यायालय इंसान का अपना अंतर्मन होता है। वहाँ न कोई वकील होता है, न कोई गवाह।

वहाँ केवल सच होता है। और सच यही था कि कई बार हम दूसरों पर उँगली उठाने से पहले यह भूल जाते हैं कि तीन उँगलियाँ हमारी ओर भी इशारा कर रही होती हैं।

इसलिए जीवन का सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि दोषी कौन है, बल्कि यह है कि हम अपनी गलतियों को कब स्वीकार करते हैं। क्योंकि जिस दिन इंसान अपनी जिम्मेदारी स्वीकार कर लेता है, उसी दिन से उसके भीतर परिवर्तन की शुरुआत हो जाती है।

और शायद यही इस कहानी का सबसे बड़ा संदेश है- "जब हम खुद दोषी हैं तो किसे दोषी कहें। पहले स्वयं को बदलें, फिर समाज अपने आप बदलने लगेगा।"

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