बादशाह पत्नी, डरपोक पति

 लेखक: विनोद कुमार झा 

दिल्ली से लगभग पचास किलोमीटर दूर बसा छोटा-सा कस्बा था  रामपुर। कस्बा छोटा जरूर था, लेकिन वहाँ के लोगों की बातें किसी महानगर से कम नहीं थीं। हर गली में राजनीति पर चर्चा, हर चौपाल पर समाज सुधार की बहस और हर घर में पति-पत्नी की छोटी-मोटी तकरार आम बात थी।

इसी कस्बे में रहते थे  रमेश और उसकी पत्नी सुनीता। रमेश सरकारी दफ्तर में क्लर्क था। दुबला-पतला शरीर, आँखों पर मोटा चश्मा और आवाज इतनी धीमी कि कभी-कभी खुद उसे भी सुनाई नहीं देती थी। दूसरी ओर उसकी पत्नी सुनीता पूरे मोहल्ले में “बादशाह पत्नी” के नाम से प्रसिद्ध थी।

उसकी चाल में ऐसा आत्मविश्वास था कि लोग रास्ता छोड़ देते थे। मोहल्ले की महिलाएँ उससे सलाह लेतीं, दुकानदार उससे डरते और नेता लोग भी चुनाव के समय उसके दरवाजे पर हाथ जोड़कर खड़े रहते। रमेश उससे इतना डरता था कि घर में पानी पीने से पहले भी पूछ लेता, “सुनीता… पानी पी लूँ?” और सुनीता बिना उसकी ओर देखे कहती, “हाँ-हाँ, लेकिन पूरा गिलास खत्म करना। आधा छोड़ोगे तो फिर मैं ही धोऊँगी।”

मोहल्ले वाले अक्सर मजाक उड़ाते, “अरे रमेश भाई, घर में आपकी चलती है या भाभी जी की?” रमेश फीकी हँसी हँस देता,“हमारे यहाँ लोकतंत्र है… लेकिन अंतिम निर्णय प्रधानमंत्री जी का ही होता है।” सब ठहाका लगाते और रमेश शर्म से सिर झुका लेता। सुनीता का स्वभाव बचपन से तेज था। उसके पिता स्कूल के प्रधानाचार्य थे। घर में अनुशासन ऐसा कि बिना अनुमति कोई खाँस भी नहीं सकता था। वही आदत सुनीता में भी आ गई थी।

शादी के बाद जब वह रमेश के घर आई तो शुरू के कुछ दिनों तक उसने खुद को शांत रखा। लेकिन धीरे-धीरे उसे समझ आ गया कि रमेश सीधा-सादा आदमी है। बस फिर क्या था, घर की पूरी सत्ता उसके हाथ में आ गई। किस दिन क्या बनेगा, कौन-सा सामान खरीदा जाएगा, किस रिश्तेदार के यहाँ जाना है, सब फैसले वही करती।

एक बार रमेश ने हिम्मत करके कहा, “सुनीता, इस महीने थोड़ा बचत कर लेते हैं। नया मोबाइल अगले महीने ले लेना।” सुनीता ने भौंहें तान दीं, “क्यों? तुम्हारा पुराना मोबाइल चल रहा है न? फिर मेरे मोबाइल पर क्यों रोक?” रमेश तुरंत बोला, “नहीं-नहीं… मेरा मतलब था कि… अच्छा वही ले लो।” उस दिन के बाद उसने कभी बजट पर चर्चा नहीं की।

 रामपुर की सबसे लोकप्रिय जगह थी  शर्मा जी की चाय की दुकान। वहीं रोज शाम को मोहल्ले के पुरुष इकट्ठा होते और अपनी-अपनी पत्नियों की शिकायतें करते। एक दिन चर्चा फिर रमेश पर आ गई। गुप्ता जी बोले, “यार रमेश, तुम तो बिल्कुल ही दब्बू हो। आदमी को घर में थोड़ा रौब रखना चाहिए।” वर्मा जी ने भी हामी भरी, “सही कहा। मेरी पत्नी भी तेज है, लेकिन मैं एक बार आँख दिखा दूँ तो चुप हो जाती है।”

रमेश ने धीरे से पूछा, “फिर बाद में?” “बाद में क्या?” “बाद में खाना मिलता है?” पूरी दुकान हँसी से गूंज उठी। तभी शर्मा जी बोले, “रमेश भाई, एक दिन जोर से डाँट दो भाभी जी को। देखना, सब ठीक हो जाएगा।” रमेश ने चाय का कप नीचे रखा और गंभीर होकर बोला, “भाई साहब, आप लोग युद्ध की सलाह दे रहे हैं… लेकिन शहीद तो मैं ही होऊँगा।” लेकिन आदमी कितना भी डरपोक क्यों न हो, उसके भीतर कहीं न कहीं आत्मसम्मान जरूर होता है। एक रविवार रमेश ने तय किया कि आज वह अपनी बात मनवाकर रहेगा।

सुबह-सुबह उसने जोर से कहा, “सुनीता! आज मैं अपने दोस्तों के साथ पिकनिक पर जा रहा हूँ।” सुनीता रसोई से बाहर आई और बोली  “किससे पूछकर?” रमेश ने काँपते हुए कहा, “म… मतलब… बता तो रहा हूँ।” सुनीता ने हाथ कमर पर रखा,“और घर का राशन कौन लाएगा?” “शाम को ले आऊँगा।” “बिजली का बिल?” “कल भर दूँगा।” “और माँ को डॉक्टर के पास कौन ले जाएगा?”

रमेश का आत्मविश्वास धीरे-धीरे पिघलने लगा। अंत में बोला “ठीक है… पिकनिक अगले रविवार।” सुनीता मुस्कराई और बोली  “अच्छे बच्चे।” रमेश ने मन ही मन सोचा,  “हे भगवान! मुझे अगला रविवार देखने की शक्ति देना।”

एक दिन अचानक रमेश के ऑफिस में नया अधिकारी आया   अरविंद सक्सेना। ऊँची आवाज, तेज व्यक्तित्व और आत्मविश्वास से भरा इंसान। उसने कुछ ही दिनों में समझ लिया कि रमेश बहुत दब्बू स्वभाव का है।

एक दिन उसने रमेश से पूछा, “तुम इतने डरे-डरे क्यों रहते हो?” रमेश ने मजाक में पत्नी की कहानी सुना दी। सक्सेना हँस पड़ा, “डर कर जीने से अच्छा है खुलकर जीना सीखो। पत्नी दुश्मन नहीं होती, लेकिन पति अगर हर समय झुका रहेगा तो सामने वाला हावी हो ही जाएगा।” उसकी बात रमेश के दिल में उतर गई। उस रात रमेश देर तक सोचता रहा। उसे एहसास हुआ कि गलती सिर्फ सुनीता की नहीं थी। उसने खुद कभी अपनी बात रखने की कोशिश ही नहीं की।

अगले दिन रात के खाने पर रमेश ने धीरे से कहा, “सुनीता, मैं तुमसे कुछ कहना चाहता हूँ।” सुनीता ने सामान्य स्वर में पूछा “क्या?” “मुझे लगता है कि घर के फैसले हम दोनों को मिलकर लेने चाहिए।” सुनीता चौंकी। शायद शादी के दस साल में पहली बार रमेश ने इतने सीधे शब्दों में अपनी बात कही थी।

वह कुछ पल उसे देखती रही। फिर बोली,  “अचानक यह ज्ञान कहाँ से आ गया?” रमेश ने साहस जुटाकर कहा,  “ज्ञान नहीं… बस एहसास हुआ कि मैं हर बात में डरता रहता हूँ। और यह ठीक नहीं है।” कमरे में कुछ देर सन्नाटा रहा।

फिर सुनीता धीमे स्वर में बोली, “तुम्हें पता है मैं इतनी सख्त क्यों रहती हूँ?” “क्यों?” “क्योंकि तुम कभी जिम्मेदारी लेते ही नहीं। अगर मैं सब न संभालूँ तो घर बिखर जाए।”

रमेश पहली बार उसकी आँखों में थकान देख रहा था। उसे एहसास हुआ कि सुनीता केवल हुक्म चलाने वाली औरत नहीं थी; वह पूरे घर का बोझ अकेले उठाते-उठाते कठोर हो गई थी।

उस दिन के बाद धीरे-धीरे चीजें बदलने लगीं। रमेश ने घर के कामों में हाथ बँटाना शुरू किया। बिजली का बिल, बैंक का काम, बच्चों की पढ़ाई  वह जिम्मेदारी लेने लगा।

दूसरी ओर सुनीता भी पहले जैसी तीखी नहीं रही। अब दोनों साथ बैठकर फैसले लेते। एक शाम मोहल्ले की वही चाय की दुकान पर रमेश बड़े आत्मविश्वास से बैठा था।

गुप्ता जी ने पूछा,  “क्या बात है? आज बड़े खुश लग रहे हो।” रमेश मुस्कराया, “अब हमारे घर में गठबंधन सरकार है।” सब हँस पड़े। तभी पीछे से सुनीता की आवाज आई, “और वित्त मंत्रालय अभी भी मेरे पास है।” पूरी दुकान ठहाकों से गूँज उठी। लेकिन इस बार रमेश भी खुलकर हँस रहा था। क्योंकि अब वह डरपोक पति नहीं, बल्कि समझदार साथी बन चुका था।

पति-पत्नी का रिश्ता सत्ता का खेल नहीं होता। जहाँ एक व्यक्ति हमेशा हुक्म चलाए और दूसरा हमेशा डरता रहे, वहाँ प्रेम धीरे-धीरे खत्म होने लगता है। रिश्ता तभी मजबूत बनता है जब दोनों एक-दूसरे को सम्मान दें, जिम्मेदारियाँ बाँटें और डर नहीं बल्कि विश्वास के साथ साथ चलें।

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