लेखक: विनोद कुमार झा
सहरसा जिले के एक छोटे से गांव सोनबरसा में रामलोचन चौधरी का बड़ा नाम था। गांव में कोई भी काम हो पंचायत का फैसला, शादी-ब्याह की सलाह या खेत-खलिहान का विवाद सब उनकी चौखट पर पहुंचते थे। कारण सिर्फ उनका अनुभव नहीं था, बल्कि उनका मीठा व्यवहार भी था। वे हमेशा मुस्कुराकर बात करते, सामने वाले का हाथ पकड़कर हालचाल पूछते और ऐसे अपनापन दिखाते कि कोई भी तुरंत प्रभावित हो जाए। लेकिन गांव के लोग धीरे-धीरे एक बात समझने लगे थे रामलोचन के होंठों पर जितनी मिठास थी, उनकी जुबान उतनी ही कंटीली थी। सामने वे मीठी बातें करते, पर पीठ पीछे किसी की ऐसी बुराई करते कि रिश्तों में जहर घुल जाता।
एक दिन गांव के स्कूल में नए शिक्षक बनकर अभय कुमार आए। पढ़े-लिखे, शांत स्वभाव और ईमानदार। बच्चों को पढ़ाने के साथ-साथ वे गांव में स्वच्छता, शिक्षा और आपसी मेल-जोल की बातें भी करते। कुछ ही महीनों में बच्चे उन्हें बहुत मानने लगे। गांव के बुजुर्ग भी उनकी तारीफ करने लगे।
रामलोचन चौधरी को यह बात चुभने लगी। उन्हें लगने लगा कि गांव में उनका प्रभाव कम हो रहा है। एक शाम चौपाल पर उन्होंने मुस्कुराते हुए अभय को अपने पास बुलाया। “अरे मास्टर साहेब! गांव तो आपके आने से धन्य हो गया,” उन्होंने हंसते हुए कहा। अभय विनम्रता से बोले, “चौधरी जी, आपका आशीर्वाद है।”
चौपाल में बैठे लोग मुस्कुरा रहे थे। लेकिन उसी रात रामलोचन कुछ लोगों के बीच बैठकर बोले, “बहुत सज्जन बनता है मास्टर! देखना, एक दिन गांव की जमीन पर स्कूल के नाम पर कब्जा कर लेगा।”
धीरे-धीरे यह बात गांव में फैल गई। लोग अभय को शक की नजर से देखने लगे। बच्चों के अभिभावक भी दूरी बनाने लगे। अभय समझ नहीं पा रहे थे कि अचानक माहौल क्यों बदल गया।
एक दिन अभय स्कूल के पीछे बैठे उदास थे। तभी गांव की वृद्ध महिला दुलारी काकी वहां आईं। उन्होंने कहा, “बेटा, दुखी मत हो। गांव में कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके होंठों पर मुस्कान होती है, लेकिन जुबान कांटों से भरी रहती है।” अभय समझ गए कि इशारा किस ओर है। लेकिन उन्होंने प्रतिक्रिया देने के बजाय अपने काम पर ध्यान देना जारी रखा।
कुछ महीनों बाद गांव में भीषण बाढ़ आई। चारों ओर पानी भर गया। कई घर डूब गए। उसी रात खबर आई कि रामलोचन चौधरी का छोटा पोता तेज बुखार में तड़प रहा है और पानी के कारण अस्पताल पहुंचना मुश्किल है।
गांव के बड़े-बड़े लोग बहाने बनाने लगे। तब अभय ने बिना देर किए अपनी जान जोखिम में डाल दी। वे बांस की नाव लेकर चौधरी जी के घर पहुंचे और बच्चे को लेकर कई किलोमीटर दूर अस्पताल तक गए। पूरी रात इलाज करवाने के बाद सुबह बच्चे की जान बच गई।
रामलोचन चौधरी अस्पताल के बरामदे में बैठे थे। उनके चेहरे की मुस्कान गायब थी। आंखों में पछतावा था। उन्होंने कांपती आवाज में कहा, “मास्टर साहेब, मैंने आपके बारे में कितना गलत बोला... और आपने मेरे पोते की जान बचा ली।” अभय हल्के से मुस्कुराए, “चौधरी जी, इंसान की पहचान उसके शब्दों से नहीं, कर्मों से होती है।”
यह सुनते ही रामलोचन की आंखों से आंसू बहने लगे। पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि मीठी मुस्कान का कोई अर्थ नहीं, अगर जुबान दूसरों को चोट पहुंचाती रहे। बाढ़ के बाद गांव में एक सभा हुई। वहां रामलोचन खुद खड़े हुए और सबके सामने बोले, “मैंने जिंदगी भर लोगों के सामने मुस्कुराहट दिखाई, लेकिन मेरी जुबान ने कई दिल दुखाए। आज मैं समझ गया हूं कि कंटीली जुबान इंसान को अंदर से अकेला कर देती है।”
उस दिन के बाद गांव में रामलोचन सचमुच बदल गए। अब उनकी मुस्कान के साथ उनकी वाणी में भी सच्चाई और अपनापन आने लगा। गांव के लोग अक्सर कहा करते, “होंठों की मुस्कान तभी सुंदर लगती है, जब जुबान में भी मिठास हो।”
