मैथिली कहानी: मुरझाबैत विदाई के भाड़ आ पेटार ?

 -माटि, ममता आ परंपरा के आखिरी रोशनी

विनोद कुमार झा 

मिथिलांचल के धरती पर जब बसंत के हवा बहैत छै, त आम के मंजर से पूरा गाँव महक उठैत छै। पोखर के पानी में आसमान के छवि झिलमिल करैत छै, आ आँगन में बैठल दादी-नानी अपन बीतल समय के किस्सा सुनबैत रहैत छथि। ओहि किस्सा में सिर्फ कहानी नय, बल्कि पूरा एक संस्कृति बसल रहैत छै एहने एक परंपरा रहल “बेटी के विदाई में भाड़ आ पेटार”।

माधोपुर गाँव में ई परंपरा कखनो शान मानल जाएत छल। जब बेटी के विदाई होइत छल, त भरिया (मजदूर) अपन माथ पर भाड़ आ पेटार उठा क’ ससुराल तक पहुँचाबैत छल। भाड़ मिट्टी के बनल ओ बर्तन, जकरा में दही,चावल, दाल, गुड़, मखान, आ मिठास भरल रहैत छल। पेटार बांस के आ लकड़ी के सुंदर संदूक, जकरा में कपड़ा, गहना, आ माय-बाप के आशीर्वाद सहेजल रहैत छल। ई सिर्फ सामान नय, बल्कि बेटी के साथ मायके के आत्मा जाएत छल।

लेकिन समय बदलल…अब ना ओ भरिया रहि गेल, ना ओ भाड़ बनावे वाला कुम्हार। पेटार के जगह प्लास्टिक के सूटकेस आ चमकदार बैग ले लेलक। परंपरा धीरे-धीरे मुरझा गेल जइसे धूप में सूखल फूल।

एक पिता के जिद… एक दादी के सपना: ओहि गाँव में रामबाबू नाम के एक किसान रहैत छल। साधारण जीवन, सीमित साधन, लेकिन दिल में संस्कार के अथाह समुंदर। ओकर एकलौती बेटी सुनीता अब बियाह के लायक भ’ गेल छल। घर में बियाह के तैयारी शुरू भेल। गीत गूंज रहल छल “विदाई के बेला अइया, नयन भरि आंसू बहैया…”लेकिन एक कोना में बैठल दादी चुप-चाप सब देख रहल छली। ओकर आँखि में एक खालीपन छल जइसे किछु छूट रहल हो।

एक दिन ओ रामबाबू के बुला क’ धीरे से कहली “बाबू, तोहर बियाह में हम देखलियै तोहर बहिन के विदाई में तीन-तीन भरिया भाड़-पेटार ले क’ गेल छल। ओ दृश्य आजो आँखि में बसल अछि… की हम सुनीता के विदाई में ओ देख सकब?”

रामबाबू चुप भ’ गेल। खर्चा, समाज, आधुनिक सोच सब ओकरा दिमाग में घूमे लागल। ओ धीरे से कहलक “अम्मा, आब ओ सब के जमाना नय रहल। लोग हँसी उड़ायत…”दादी के आँखि नम भ’ गेल “बेटी के विदाई में अगर परंपरा छोड़ देब, त बचत की?”

अंतरात्मा के आवाज : ओ रात रामबाबू के नींद गायब छल। ओ अपन बचपन में लौट गेल ओ दिन याद आइल, जखन ओकर बहिन के विदाई होइत छल। भरिया माथ पर पेटार उठौने, गाँव के औरत सब रोइत-गावत, आ ओकर बाबूजी गर्व से भरल। “हमरा बहिन के साथ हमर मान-सममान गेल छल…” रामबाबू बुदबुदेलक। ओ अचानक उठि बैठल “नय! ई परंपरा खत्म नय होए देब।”

परंपरा के पुनर्जन्म :  अगिला दिन से गाँव में हलचल मच गेल। रामबाबू कुम्हार के घर गेल“एक ठो मजबूत, सुंदर भाड़ बनाबऽ जइसे पुराना समय में बनैत छल।” कुम्हार के आँख चमक उठल “हमरा बुझायल छल ई काम खत्म भ’ गेल… आज दिल खुश भ’ गेल!”

बढ़ई और डोमा के बुलायल गेल “एक पेटार बनाबऽ मजबूत, आ सुन्दर नक्काशी वाला।” धीरे-धीरे पूरा गाँव जिज्ञासा से भर गेल “ई रामबाबू आखिर कर क्या रहल छथि?”

बियाह के दिन पूरा माधोपुर सजि उठल। ढोल-नगाड़ा, शहनाई, आ गीत के मधुर धुन वातावरण में गूंज रहल छल। सुनीता लाल जोड़ा में सजी जइसे चांद धरती पर उतर आयल हो। लेकिन ओकर आँखि में विदाई के डर आ ममता के लहर साफ दिख रहल छल। विदाई के समय… सबके सांस थम गेल। तीनटा भरिया सिर पर भाड़ आ पेटार उठौने धीरे-धीरे आगे बढ़ल। भाड़ में धान, चावल, दाल, मखान, आ घर के मिठास।

पेटार में साड़ी, चूड़ी, सिंदूर, गहना, आ माय के हाथ से सहेजल हर छोटी-बड़ी चीज। पूरा माहौल भावुक हो उठल। दादी के आँखि से आँसू बहि रहल छल “आज हमर आत्मा तृप्त भ’ गेल…”

सुनीता जब विदा होए लागल, त ओ पेटार पर हाथ फेरलक।धीरे से कहलक“ई सिर्फ सामान नय अछि… ई हमर घर, हमर बचपन, हमर ममता अछि।” ओ अपन बाबूजी के गले लग गेल “आप हमरा सिर्फ विदा नय कयलियै, बल्कि अपन परंपरा के गर्व सेहो देलियै।” रामबाबू के आँखि भर आयल “बेटी, तोहर साथ हमर संस्कार सेहो जा रहल अछि।”

ससुराल में जखन भाड़-पेटार पहुंचल, त सब चकित रहि गेल “आजो एहन परंपरा जिंदा अछि? लोग प्रशंसा करए लागल। धीरे-धीरे ई बात आसपास के गाँव में फैल गेल। अगिला साल, माधोपुर में दोसर बेटी के विदाई में फेर भाड़-पेटार भेजल गेल।फेर तीसरा, चौथा...आ एहन क’ एक मरैत परंपरा फेर से जी उठल।

समय बदलैत अछि, साधन बदलैत अछि, लेकिन संस्कार आ परंपरा अगर दिल में जिंदा हो, त ओ कखनो मरैत नय अछि।भाड़ आ पेटार सिर्फ बर्तन नय रहल ई बनि गेल ममता के प्रतीक, सम्मान के निशानी, आ मिथिलांचल के आत्मा।कखनो-कखनो एक आदमी के छोट-सा निर्णय इतिहास के दिशा बदलि दैत अछि… आ रामबाबू ओही बदलाव के नाम बनि गेल।

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