ससुराल बना खजाना...

लेखक: विनोद कुमार झा 

बरसात की हल्की फुहारों से भीगी वह सुबह गांव के पुराने कच्चे रास्तों को जैसे नई चमक दे रही थी। पेड़ों की पत्तियों पर ठहरी बूंदें सूरज की किरणों से मोतियों की तरह चमक रही थीं। उसी सुबह पूजा की विदाई हुई थी। आंखों में आंसू, मन में डर और भविष्य को लेकर हजारों सवाल लिए वह अपने ससुराल की ओर बढ़ रही थी। मां बार-बार उसके माथे को चूमती और कहती,  “बेटी, ससुराल सिर्फ घर नहीं होता, वह लड़की की नई दुनिया होती है। वहां अपने संस्कारों से सबका दिल जीत लेना।”

लेकिन पूजा के मन में डर था। उसने अक्सर गांव-मोहल्लों में ससुराल की कड़वी कहानियां सुनी थीं कहीं दहेज के ताने, कहीं बहुओं की बेबसी, तो कहीं रिश्तों में जहर। इसलिए उसके कदम भारी थे। उसे लग रहा था कि शायद उसकी जिंदगी अब केवल जिम्मेदारियों के बोझ में दबकर रह जाएगी।

ससुराल पहुंचते ही दरवाजे पर आरती हुई। उसकी सास सावित्री देवी ने मुस्कुराते हुए कहा, “बहू नहीं, बेटी आई है हमारे घर।” यह सुनकर पूजा थोड़ा चौंकी। उसे लगा शायद यह केवल दिखावे की बातें होंगी। मगर धीरे-धीरे दिन बीतने लगे और वह हैरान होती चली गई। उसके ससुर रामदयाल जी हर सुबह चाय बनाकर सबको खुद बुलाते थे। पति अमन ऑफिस जाने से पहले रसोई में उसका हाथ बंटा देता। छोटी ननद रानी उसके साथ बैठकर हंसी-मजाक करती।

पूजा को सबसे ज्यादा आश्चर्य तब हुआ जब शादी के कुछ दिन बाद उसकी सास ने कहा,  “बहू, तुमने बी.एड किया है ना? आगे नौकरी करना चाहो तो जरूर करो। सपनों को रसोई में कैद मत करना।” पूजा की आंखें भर आईं। उसे पहली बार लगा कि यह घर केवल दीवारों का मकान नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान से भरा संसार है।

कुछ महीनों बाद पूजा को शहर के एक स्कूल में नौकरी मिल गई। पूरे घर में खुशी का माहौल था। सास ने पड़ोसियों से गर्व से कहा,  “हमारी बहू मास्टरनी बन गई।”

धीरे-धीरे पूजा का आत्मविश्वास बढ़ने लगा। उसने अपनी तनख्वाह से घर में छोटे-छोटे बदलाव करने शुरू किए। पुराने आंगन में फूलों का बगीचा बनवाया, ससुर के लिए आरामदायक कुर्सी खरीदी और ननद की पढ़ाई में मदद करने लगी। उसके व्यवहार ने पूरे घर में नई ऊर्जा भर दी।

लेकिन जिंदगी हमेशा आसान नहीं रहती। एक दिन अमन की नौकरी अचानक छूट गई। घर की आर्थिक स्थिति कमजोर होने लगी। रिश्तेदार ताने देने लगे, “अब देखो, बहू की कमाई से घर चलेगा।” अमन अंदर ही अंदर टूटने लगा। उसे लगने लगा कि वह परिवार पर बोझ बन गया है। मगर पूजा ने उसका हाथ पकड़कर कहा, “सुख में साथ निभाना आसान होता है, असली रिश्ता दुख में मजबूत बनता है।”

सास-ससुर ने भी बेटे को संभाला। रामदयाल जी बोले, “बेटा, घर परिवार प्यार से चलता है, पैसों से नहीं।” पूजा ने अपनी नौकरी जारी रखी और अमन ने छोटा-सा ऑनलाइन काम शुरू किया। परिवार ने मिलकर कठिन समय काटा। कुछ ही महीनों में अमन का काम चल निकला। धीरे-धीरे घर की हालत फिर सुधरने लगी।

एक रात छत पर बैठे अमन ने पूजा से कहा, “तुम जानती हो, लोग कहते हैं कि शादी के बाद लड़की को खजाना नहीं मिलता, बल्कि जिम्मेदारियां मिलती हैं। मगर तुमने मेरे घर को सच में खजाना बना दिया।” पूजा मुस्कुरा दी। उसने आसमान की ओर देखा जहां चांद बादलों के बीच चमक रहा था। उसे महसूस हुआ कि असली खजाना सोना-चांदी नहीं होता। असली खजाना होता है प्यार, सम्मान, अपनापन और साथ निभाने वाले रिश्ते।

समय बीतता गया। गांव में लोग उस परिवार की मिसाल देने लगे। जहां दूसरे घरों में छोटी-छोटी बातों पर झगड़े होते, वहां पूजा का ससुराल हंसी और अपनत्व से भरा रहता। एक दिन पूजा की मां उससे मिलने आईं। उन्होंने बेटी को खुश देखकर राहत की सांस ली। जाते समय उन्होंने सावित्री देवी का हाथ पकड़कर कहा, “आपने मेरी बेटी को बहू नहीं, सच में बेटी बनाकर रखा।”

सावित्री देवी मुस्कुराईं, “बहुएं अगर बेटियां बन जाएं, तो हर ससुराल खजाना बन जाता है।” उस दिन पूजा की आंखों में खुशी के आंसू थे। उसे अब समझ आ चुका था कि इंसान की सबसे बड़ी दौलत पैसा नहीं, बल्कि ऐसे रिश्ते होते हैं जहां सम्मान और प्रेम कभी कम नहीं होता। वही ससुराल, जिससे वह डरते हुए आई थी, आज उसकी जिंदगी का सबसे अनमोल खजाना बन चुका था।

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