विनोद कुमार झा
भारतीय सनातन परंपरा में पति-पत्नी के रिश्ते को केवल सांसारिक बंधन नहीं, बल्कि सात जन्मों का अटूट संबंध माना गया है। इसी पवित्र रिश्ते की दीर्घायु, सुख-समृद्धि और अखंड सौभाग्य की कामना के लिए सुहागिन महिलाएं श्रद्धा और आस्था के साथ वट सावित्री व्रत करती हैं। यह व्रत केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि नारी के प्रेम, त्याग, समर्पण और अटूट विश्वास का प्रतीक है।
ज्येष्ठ मास की अमावस्या तिथि को मनाया जाने वाला यह व्रत विशेष रूप से उत्तर भारत, बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और राजस्थान में अत्यंत श्रद्धा से किया जाता है। इस दिन महिलाएं वट अर्थात बरगद के वृक्ष की पूजा कर अपने पति की लंबी आयु और परिवार की सुख-समृद्धि की कामना करती हैं।
वट सावित्री व्रत का धार्मिक महत्व
वट वृक्ष को हिंदू धर्म में त्रिदेवों का स्वरूप माना गया है। इसकी जड़ों में ब्रह्मा, तने में विष्णु और शाखाओं में भगवान शिव का वास माना जाता है। बरगद का वृक्ष लंबे समय तक जीवित रहता है, इसलिए यह दीर्घायु और स्थिरता का प्रतीक माना गया है। सुहागिन महिलाएं इस वृक्ष की पूजा कर अपने वैवाहिक जीवन में स्थायित्व और पति की लंबी आयु की प्रार्थना करती हैं।
यह व्रत नारी शक्ति, धैर्य और संकल्प का भी प्रतीक है। मान्यता है कि जिस प्रकार माता सावित्री ने अपने तप, बुद्धि और अटल प्रेम से यमराज से अपने पति सत्यवान के प्राण वापस प्राप्त किए थे, उसी प्रकार यह व्रत महिलाओं को अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद प्रदान करता है।
वट सावित्री व्रत की पौराणिक कथा
प्राचीन समय में मद्र देश में अश्वपति नामक एक प्रतापी राजा राज्य करते थे। उनके पास धन-दौलत और वैभव की कोई कमी नहीं थी, लेकिन संतान सुख न होने के कारण वे अत्यंत दुखी रहते थे। राजा और उनकी रानी ने वर्षों तक माता सावित्री की कठोर आराधना की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी ने उन्हें एक तेजस्वी कन्या प्राप्त होने का वरदान दिया।
कुछ समय बाद राजा के घर एक सुंदर और तेजस्वी कन्या ने जन्म लिया, जिसका नाम सावित्री रखा गया। सावित्री बचपन से ही अत्यंत बुद्धिमान, संस्कारी और साहसी थीं। जब वह विवाह योग्य हुईं, तब राजा अश्वपति ने उन्हें स्वयं अपना वर चुनने की अनुमति दी।
सावित्री वन-वन घूमते हुए एक दिन सत्यवान नामक राजकुमार से मिलीं। सत्यवान अत्यंत गुणवान, धर्मात्मा और वीर थे, लेकिन वे वन में अपने अंधे माता-पिता के साथ साधारण जीवन व्यतीत कर रहे थे। सावित्री ने सत्यवान को ही अपना पति मान लिया।
जब नारद मुनि को यह ज्ञात हुआ, तब उन्होंने राजा अश्वपति को चेतावनी दी कि सत्यवान अल्पायु हैं और विवाह के एक वर्ष बाद उनकी मृत्यु निश्चित है। यह सुनकर राजा चिंतित हो उठे, लेकिन सावित्री अपने निर्णय से नहीं डिगीं। उन्होंने कहा कि एक बार जिसे पति मान लिया, उसे जीवनभर नहीं बदल सकतीं।
विवाह के बाद सावित्री अपने सास-ससुर और पति की सेवा में लग गईं। धीरे-धीरे वह दिन भी निकट आ गया, जब सत्यवान की आयु समाप्त होने वाली थी। उस दिन सावित्री ने कठोर व्रत रखा और अपने पति के साथ वन में चली गईं।
वन में लकड़ी काटते समय अचानक सत्यवान के सिर में तेज पीड़ा हुई और वे सावित्री की गोद में सिर रखकर लेट गए। तभी यमराज उनके प्राण लेने आए। सावित्री भी यमराज के पीछे-पीछे चलने लगीं।
यमराज ने उन्हें वापस लौटने को कहा, लेकिन सावित्री ने अपने पतिव्रत धर्म, बुद्धिमत्ता और विनम्रता से उन्हें प्रभावित कर दिया। प्रसन्न होकर यमराज ने उन्हें वरदान मांगने को कहा। सावित्री ने पहले अपने अंधे सास-ससुर की आंखों की रोशनी मांगी, फिर उनका खोया हुआ राज्य और अंत में सौ पुत्रों की माता बनने का वरदान मांगा।
यमराज ने वरदान दे दिया, लेकिन तुरंत समझ गए कि बिना पति के सावित्री सौ पुत्रों की माता कैसे बन सकती हैं। तब उन्हें अपने वचन की मर्यादा रखनी पड़ी और उन्होंने सत्यवान के प्राण लौटा दिए।
इस प्रकार सावित्री ने अपने अटूट प्रेम, तपस्या और बुद्धिमत्ता से अपने पति को पुनर्जीवन दिलाया। तभी से वट सावित्री व्रत की परंपरा शुरू हुई।
व्रत की पूजा विधि
वट सावित्री के दिन सुहागिन महिलाएं प्रातः स्नान कर नए वस्त्र और श्रृंगार धारण करती हैं। हाथों में मेहंदी, मांग में सिंदूर और सोलह श्रृंगार कर महिलाएं पूजा की थाली सजाती हैं। इसमें फल, फूल, रोली, अक्षत, धूप, दीप, भीगा चना, मिठाई और कच्चा सूत रखा जाता है।
महिलाएं वट वृक्ष के पास जाकर जल अर्पित करती हैं और उसके चारों ओर कच्चा सूत लपेटते हुए परिक्रमा करती हैं। इसके बाद सावित्री-सत्यवान की कथा सुनी जाती है और पति की लंबी आयु की कामना की जाती है।
वट सावित्री व्रत केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि परिवार की एकता, विश्वास और रिश्तों की मजबूती का संदेश भी देता है। यह पर्व हमें सिखाता है कि सच्चा प्रेम केवल सुख में नहीं, बल्कि कठिन परिस्थितियों में भी साथ निभाने का नाम है।
आज के आधुनिक दौर में भी यह व्रत भारतीय संस्कृति की जड़ों को मजबूत बनाए हुए है। महिलाएं पूरे विश्वास और श्रद्धा के साथ यह व्रत कर अपने परिवार की खुशहाली और दांपत्य जीवन की सुख-शांति की कामना करती हैं।
वट सावित्री व्रत भारतीय नारी के त्याग, समर्पण और अटूट प्रेम का अनुपम उदाहरण है। माता सावित्री की कथा हर युग में यह प्रेरणा देती है कि सच्चे प्रेम और दृढ़ संकल्प के सामने मृत्यु भी हार मान लेती है। यही कारण है कि यह व्रत आज भी सुहागिन महिलाओं के लिए अत्यंत पवित्र और महत्वपूर्ण माना जाता है।
