पुरुषोत्तम मास : नाम सबसे शुभ, फिर भी शुभ कार्यों में विराम क्यों?

 आस्था, अध्यात्म और संयम का अद्भुत संगम

विनोद कुमार झा 

भारतीय सनातन परंपरा में वर्ष का प्रत्येक दिन, प्रत्येक तिथि और प्रत्येक मास किसी न किसी आध्यात्मिक महत्व से जुड़ा हुआ है। इन्हीं में एक अत्यंत विशेष और रहस्यमयी मास है — पुरुषोत्तम मास, जिसे सामान्य जनमानस में अधिक मास भी कहा जाता है।

यह वही मास है जिसे स्वयं भगवान श्रीहरि विष्णु का प्रिय माना गया है। पुराणों में वर्णित कथा के अनुसार जब सभी महीनों ने अधिक मास का तिरस्कार किया, तब भगवान विष्णु ने उसे अपना नाम “पुरुषोत्तम” देकर संसार में सर्वोच्च स्थान प्रदान किया।

लेकिन प्रश्न यह उठता है कि जब यह मास स्वयं भगवान विष्णु को प्रिय है, तब विवाह, गृह प्रवेश, मुंडन, यज्ञोपवीत जैसे मांगलिक कार्यों पर रोक क्यों लगाई जाती है? आखिर इस मास में क्या करें और क्या न करें? 

आस्था और शास्त्र के इसी रहस्य को समझना आज के समय में अत्यंत आवश्यक हो गया है।

क्या है पुरुषोत्तम मास?

हिंदू पंचांग चंद्र और सूर्य की गति पर आधारित है। चंद्र वर्ष लगभग 354 दिनों का होता है जबकि सौर वर्ष 365 दिनों का। दोनों के बीच लगभग 11 दिनों का अंतर आता है। यही अंतर लगभग 32 महीने 16 दिन बाद एक अतिरिक्त मास के रूप में जुड़ जाता है, जिसे अधिक मास कहा जाता है।

शास्त्रों में यह मास किसी विशेष राशि परिवर्तन से जुड़ा नहीं होता, इसलिए इसे प्रारंभ में “मल मास” कहा गया। किंतु भगवान विष्णु ने इसे अपने नाम से विभूषित कर “पुरुषोत्तम मास” बना दिया। तभी से यह मास अत्यंत पुण्यदायी और मोक्ष प्रदान करने वाला माना गया।

शुभ कार्यों में विराम क्यों?

यह सबसे बड़ा प्रश्न है कि जब यह इतना पवित्र मास है, तब विवाह या अन्य शुभ कार्य क्यों नहीं होते?

दरअसल सनातन धर्म में हर समय का अपना अलग उद्देश्य माना गया है। कुछ समय भोग और सामाजिक उत्सव के लिए होते हैं, तो कुछ समय आत्मचिंतन, तप, साधना और ईश्वर भक्ति के लिए निर्धारित किए गए हैं।

पुरुषोत्तम मास को विशेष रूप से तपस्या, जप, दान, व्रत, कथा श्रवण, गीता एवं श्रीमद्भागवत पाठ, तथा भगवान विष्णु की आराधना के लिए श्रेष्ठ माना गया है।

इसलिए इस मास में सांसारिक मांगलिक उत्सवों की बजाय आध्यात्मिक उन्नति को प्राथमिकता दी जाती है। यह निषेध अशुभता का प्रतीक नहीं, बल्कि मनुष्य को कुछ समय के लिए भौतिकता से हटाकर अध्यात्म की ओर ले जाने का प्रयास है।

पुराणों में वर्णित कथा :  पौराणिक कथा के अनुसार अधिक मास स्वयं को अपमानित और उपेक्षित महसूस करता था क्योंकि किसी भी देवता ने उसे अपना अधिपति स्वीकार नहीं किया था। दुखी होकर वह भगवान विष्णु के पास पहुँचा।

भगवान विष्णु ने उसकी व्यथा सुनकर कहा, “आज से तुम मेरे नाम ‘पुरुषोत्तम’ से प्रसिद्ध होगे। जो भी व्यक्ति इस मास में श्रद्धा से भक्ति, दान और पुण्य करेगा, उसे अन्य महीनों की अपेक्षा कई गुना फल प्राप्त होगा।” तभी से यह मास भगवान विष्णु का अत्यंत प्रिय माना जाने लगा।

पुरुषोत्तम मास में क्या करें?

1. भगवान विष्णु की उपासना :  प्रतिदिन “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जप अत्यंत फलदायी माना गया है।

2. गीता और भागवत का पाठ : इस मास में श्रीमद्भगवद्गीता, विष्णु सहस्रनाम और भागवत कथा का श्रवण विशेष पुण्य देता है।

3. दान-पुण्य:  अन्नदान, वस्त्रदान, गौसेवा, गरीबों की सहायता और जल सेवा का महत्व कई गुना बढ़ जाता है।

4. सात्विक जीवन : क्रोध, झूठ, अहंकार और तामसिक भोजन से दूर रहकर सात्विकता अपनानी चाहिए।

5. व्रत और संयम : एक समय भोजन, फलाहार या उपवास रखकर मन और इंद्रियों पर नियंत्रण करने का प्रयास करना चाहिए।

क्या न करें?

-विवाह, सगाई और गृह प्रवेश जैसे मांगलिक कार्यों से बचना चाहिए।

-तामसिक भोजन, नशा और अनैतिक कार्यों से दूरी बनानी चाहिए।

-किसी का अपमान, विवाद या छल-कपट नहीं करना चाहिए।

-धन के अहंकार और दिखावे से बचना चाहिए।

आज का मनुष्य भौतिक उपलब्धियों की दौड़ में इतना व्यस्त हो चुका है कि उसके पास स्वयं के लिए भी समय नहीं बचा। पुरुषोत्तम मास मानो जीवन को कुछ क्षणों के लिए रोककर आत्मा की आवाज सुनने का अवसर देता है।

यह मास सिखाता है कि केवल उत्सव और भोग ही जीवन नहीं हैं, बल्कि आत्मशुद्धि, सेवा और ईश्वर चिंतन भी उतने ही आवश्यक हैं।

संभवतः इसी कारण हमारे ऋषि-मुनियों ने इस मास को सांसारिक शुभ कार्यों से अलग रखते हुए आध्यात्मिक उन्नति का पर्व बना दिया।

पुरुषोत्तम मास कोई अशुभ काल नहीं, बल्कि आत्मिक जागरण का श्रेष्ठ अवसर है।

यह मास हमें बताता है कि जीवन में कभी-कभी रुककर स्वयं को समझना भी आवश्यक है। शुभ कार्यों में विराम का अर्थ नकारात्मकता नहीं, बल्कि ईश्वर के अधिक निकट जाने का निमंत्रण है।

जब संसार की चकाचौंध से हटकर मनुष्य भगवान विष्णु की भक्ति में लीन होता है, तभी वह वास्तव में “पुरुषोत्तम” अर्थात श्रेष्ठ मनुष्य बनने की दिशा में अग्रसर होता है।

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