भारत-नीदरलैंड संबंधों का नया अध्याय

 विनोद कुमार झा 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा और द हेग में भारतीय समुदाय को दिया गया संबोधन केवल एक राजनयिक कार्यक्रम भर नहीं था, बल्कि बदलते वैश्विक परिदृश्य में भारत की बढ़ती कूटनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक शक्ति का प्रभावशाली प्रदर्शन भी था। द हेग में उमड़ा प्रवासी भारतीयों का उत्साह इस बात का जीवंत प्रमाण बना कि आज भारत केवल अपनी सीमाओं तक सीमित राष्ट्र नहीं, बल्कि विश्व मंच पर आत्मविश्वास के साथ उभरती हुई एक वैश्विक चेतना है। प्रधानमंत्री का यह संबोधन अतीत की उपलब्धियों का स्मरण मात्र नहीं था, बल्कि वर्ष 2047 तक ‘विकसित भारत’ के निर्माण में वैश्विक भारतीय समुदाय की निर्णायक भूमिका को रेखांकित करने वाला दूरदर्शी दृष्टिपत्र भी था।

भारत और नीदरलैंड के संबंध ऐतिहासिक रूप से व्यापार, समुद्री संपर्क और जल प्रबंधन जैसे क्षेत्रों तक सीमित माने जाते रहे हैं, किंतु वर्तमान समय में यह साझेदारी रणनीतिक गहराई प्राप्त कर चुकी है। आज नीदरलैंड यूरोप में भारत का एक प्रमुख व्यापारिक और निवेश साझेदार बनकर उभरा है। अर्धचालक निर्माण, हरित ऊर्जा, डिजिटल तकनीक, कृत्रिम बुद्धिमत्ता और नवाचार आधारित उद्योगों में बढ़ता सहयोग यह संकेत देता है कि दोनों देश केवल पारंपरिक आर्थिक रिश्तों तक सीमित नहीं रहना चाहते, बल्कि भविष्य की वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला और तकनीकी संरचना में साझा नेतृत्व की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं।

विशेष रूप से भारत-यूरोपीय संघ मुक्त व्यापार समझौते की संभावनाएँ इस संबंध को नई गति दे सकती हैं। यदि यह समझौता मूर्त रूप लेता है, तो निवेश, रोजगार, तकनीकी हस्तांतरण और निर्यात के क्षेत्र में दोनों देशों के लिए अभूतपूर्व अवसर उत्पन्न होंगे। भारत के विशाल उपभोक्ता बाजार और नीदरलैंड की तकनीकी दक्षता का यह संगम आने वाले दशकों में वैश्विक अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण आधार बन सकता है।

इस यात्रा का सबसे भावनात्मक और रणनीतिक पक्ष सुरिनामी-हिंदुस्तानी समुदाय को लेकर की गई घोषणा रही। सदियों पहले भारत से दूर जाकर बसे इस समुदाय ने अपनी भाषा, संस्कृति, परंपराओं और भारतीय मूल्यों को जिस प्रकार जीवित रखा है, वह भारतीय सभ्यता की जीवंतता और सांस्कृतिक शक्ति का अद्भुत उदाहरण है। प्रधानमंत्री द्वारा भारतीय प्रवासी नागरिकता पात्रता को चौथी पीढ़ी से बढ़ाकर छठी पीढ़ी तक विस्तारित करने की घोषणा केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं, बल्कि करोड़ों प्रवासी भारतीयों के साथ भावनात्मक संबंधों को और मजबूत करने वाला ऐतिहासिक कदम है।

यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि भारत अपनी जड़ों से जुड़े प्रत्येक व्यक्ति को अपने व्यापक राष्ट्रीय परिवार का हिस्सा मानता है। इससे न केवल सुरिनामी-हिंदुस्तानी समुदाय का भारत से जुड़ाव और गहरा होगा, बल्कि वे आर्थिक, सांस्कृतिक और बौद्धिक रूप से भी भारत के विकास अभियान में अधिक सक्रिय भागीदारी निभा सकेंगे। यह भारत की ‘प्रवासी-प्रथम’ नीति की परिपक्वता और संवेदनशीलता का प्रमाण है।

प्रधानमंत्री का यह कथन कि “भारत सरकार दुनिया के हर भारतीय के साथ मजबूती से खड़ी है” आज के आत्मविश्वासी भारत की वैश्विक साख को प्रतिबिंबित करता है। कोविड महामारी, युद्धग्रस्त क्षेत्रों से नागरिकों की सुरक्षित वापसी और अंतरराष्ट्रीय संकटों के दौरान भारत द्वारा अपने नागरिकों एवं प्रवासियों की सुरक्षा हेतु किए गए प्रयासों ने इस विश्वास को और मजबूत किया है कि नया भारत केवल आर्थिक रूप से ही नहीं, बल्कि मानवीय दृष्टि से भी वैश्विक स्तर पर एक भरोसेमंद शक्ति बन चुका है।

हरित हाइड्रोजन, रक्षा सहयोग, साइबर सुरक्षा और अर्धचालक निर्माण जैसे रणनीतिक क्षेत्रों में हुए नए समझौते इस बात का संकेत हैं कि भारत अब केवल एक विशाल बाजार नहीं, बल्कि वैश्विक समाधान प्रदाता के रूप में स्वयं को स्थापित कर रहा है। ‘विकसित भारत 2047’ का संकल्प केवल देश के भीतर आधारभूत संरचना और विनिर्माण को मजबूत करने तक सीमित नहीं है, बल्कि दुनिया भर में फैले भारतीय प्रवासियों की प्रतिभा, पूंजी, अनुभव और नेटवर्क को राष्ट्र निर्माण के इस महायज्ञ से जोड़ने की व्यापक सोच भी उसमें निहित है।

नीदरलैंड की यह यात्रा इसी साझा भविष्य की मजबूत आधारशिला प्रतीत होती है एक ऐसा भविष्य, जिसमें भारत अपनी सांस्कृतिक विरासत, तकनीकी क्षमता और वैश्विक प्रवासी शक्ति के सहारे विश्व मंच पर और अधिक प्रभावशाली भूमिका निभाने की ओर अग्रसर है।

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