सोना मत खरीदिए : इतिहास के आईने में ...

 -सोना, राजनीति और अर्थव्यवस्था का सच

विनोद कुमार झा 

भारत में सोना केवल एक धातु नहीं है। यह भारतीय समाज की भावनाओं, परंपराओं और सामाजिक प्रतिष्ठा का अभिन्न हिस्सा है। बेटी के विवाह से लेकर त्योहारों तक, संकट के समय की बचत से लेकर पारिवारिक सुरक्षा तक सोना सदियों से भारतीय जीवन में विश्वास और सम्मान का प्रतीक रहा है। लेकिन जब देश की अर्थव्यवस्था कठिन दौर से गुजरती है, तब यही सोना सरकारों के लिए चिंता का कारण भी बन जाता है।

हाल के दिनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा सोने की खरीद को लेकर संयम बरतने की अपील पर राजनीतिक विवाद खड़ा हो गया। विपक्षी दलों ने इसे जनता को भ्रमित करने वाला कदम बताया, जबकि सरकार समर्थकों ने इसे आर्थिक विवेक से जोड़ा। किंतु इस पूरे विवाद के बीच इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय लगभग भुला दिया गया।

दरअसल, देशहित में सोने की खरीद को लेकर चिंता व्यक्त करने वाले नरेंद्र मोदी पहले प्रधानमंत्री नहीं हैं। वर्ष 1967 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने भी देशवासियों से लगभग इसी प्रकार की अपील की थी। उस समय भारत गंभीर विदेशी मुद्रा संकट से गुजर रहा था। विकास योजनाओं, खाद्यान्न आयात और औद्योगिक आवश्यकताओं के लिए विदेशी मुद्रा की अत्यधिक आवश्यकता थी। ऐसे दौर में सरकार का मानना था कि बढ़ता हुआ सोना आयात देश की अर्थव्यवस्था पर अतिरिक्त बोझ डाल रहा है।

15 मार्च 1967 को प्रकाशित द हिंदू और नवभारत टाइम्स की रिपोर्टों के अनुसार, इंदिरा गांधी ने देशवासियों से अपील करते हुए कहा था कि वे किसी भी रूप में सोना न खरीदें और “राष्ट्रीय अनुशासन” का पालन करें। उन्होंने स्पष्ट कहा था कि विदेशी विनिमय की स्थिति अत्यंत गंभीर है और सोने का आयात देश पर भारी बोझ बनता जा रहा है। यह केवल आर्थिक चेतावनी नहीं थी, बल्कि नागरिक जिम्मेदारी और राष्ट्रीय त्याग का आह्वान भी था।

उस समय सरकार ने स्वर्ण नियंत्रण आदेशों को कठोर बनाने, सोने के आयात को सीमित करने और उसके उपयोग को नियंत्रित करने की दिशा में कदम उठाए थे। बाद में सरकारी सूत्रों ने यह भी संकेत दिया कि विदेशी मुद्रा की स्थिति को देखते हुए सोने के आयात पर और सख्ती की जा सकती है। जनता से आग्रह किया गया था कि वह कठिन आर्थिक परिस्थितियों में सरकार का सहयोग करे ताकि देश की आर्थिक स्थिरता बनी रह सके।

आज भारत की अर्थव्यवस्था 1967 के भारत से कहीं अधिक मजबूत और विस्तृत है, लेकिन सोने को लेकर मूल चिंता अब भी समाप्त नहीं हुई है। भारत आज भी दुनिया के सबसे बड़े सोना आयातक देशों में शामिल है। हर वर्ष अरबों डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार सोने के आयात पर खर्च होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में सोने की कीमतें बढ़ती हैं, तब इसका सीधा असर व्यापार घाटे और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ता है। यही कारण है कि समय-समय पर सरकारें नागरिकों से विवेकपूर्ण खरीदारी की अपील करती रही हैं।

लोकतंत्र में विपक्ष का दायित्व सरकार से सवाल पूछना है और यह आवश्यक भी है। लेकिन हर आर्थिक अपील को केवल राजनीतिक हथियार बना देना लोकतांत्रिक परिपक्वता का संकेत नहीं माना जा सकता। यदि अलग-अलग विचारधाराओं की सरकारें अलग-अलग समय में एक जैसी चिंता व्यक्त करती रही हैं, तो यह स्पष्ट संकेत है कि समस्या वास्तविक है, केवल राजनीतिक बयानबाजी नहीं।

यह भी सही है कि भारतीय परिवार सोने को सुरक्षित निवेश मानते हैं। विशेषकर ग्रामीण भारत में आज भी बैंकिंग व्यवस्था की तुलना में सोना अधिक भरोसेमंद माना जाता है। किंतु बदलते आर्थिक परिवेश में यह भी आवश्यक है कि समाज निवेश के आधुनिक विकल्पों जैसे म्यूचुअल फंड, सरकारी बॉन्ड, इंफ्रास्ट्रक्चर निवेश और अन्य उत्पादक क्षेत्रों की ओर भी ध्यान दे। यदि देश की पूंजी उद्योग, उत्पादन और रोजगार सृजन में लगेगी, तो उसका लाभ अंततः आम नागरिकों को ही मिलेगा।

यह विषय केवल सोना खरीदने या न खरीदने का नहीं है। यह आर्थिक समझ, राष्ट्रीय प्राथमिकताओं और राजनीतिक जिम्मेदारी का प्रश्न है। इतिहास यह बताता है कि जब-जब देश आर्थिक चुनौतियों से घिरा, तब-तब सरकारों ने जनता से संयम, अनुशासन और त्याग की अपेक्षा की। उस समय इन अपीलों को राष्ट्रहित के संदर्भ में देखा जाता था, न कि केवल राजनीतिक बहस के रूप में।

आज आवश्यकता इस बात की है कि आर्थिक मुद्दों पर राजनीतिक शोर से ऊपर उठकर गंभीर विमर्श किया जाए। सोना भारतीय संस्कृति का हिस्सा है, लेकिन राष्ट्र की आर्थिक शक्ति उससे कहीं अधिक महत्वपूर्ण है। यदि देशहित और व्यक्तिगत निवेश के बीच संतुलन स्थापित किया जाए, तभी सच्चे अर्थों में आर्थिक राष्ट्रभक्ति संभव होगी।

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