दीवारों की कान, परछाई की शान

विनोद कुमार झा 

पुराने शहर की तंग गलियों के बीचों-बीच एक विशाल हवेली खड़ी थी। उसकी ऊंची दीवारें, लकड़ी के पुराने दरवाजे और खिड़कियों पर जमी धूल मानो बीते समय की कहानियां अपने भीतर छुपाए बैठी थीं। लोग उसे “श्याम निवास” के नाम से जानते थे। मगर मोहल्ले में उसकी एक और पहचान थी “वो हवेली जिसकी दीवारों के भी कान हैं।”

कहते थे कि उस घर में बोला गया हर शब्द किसी न किसी रूप में बाहर पहुंच ही जाता था। इसलिए लोग वहां जाते तो संभलकर बात करते। हवेली के मालिक थे रघुवीर प्रसाद, जिनका परिवार कभी शहर का सबसे सम्मानित परिवार माना जाता था। लेकिन समय के साथ रिश्तों में ऐसी दरारें आईं कि अब वही घर कलह का अड्डा बन चुका था।

रघुवीर प्रसाद के दो बेटे थे विक्रम और अजय। दोनों एक ही छत के नीचे रहते जरूर थे, मगर दिलों के बीच इतनी दूरी थी कि जैसे दो किनारे कभी मिल ही नहीं सकते। बड़ी बहू नीलम को लगता कि छोटी बहू सविता हर बात में उसकी बुराई करती है। वहीं सविता को विश्वास था कि नीलम जानबूझकर उसे नीचा दिखाने का मौका ढूंढती रहती है।

घर की दीवारें हर दिन तानों, शिकायतों और कटु शब्दों से गूंजती रहतीं। “कुछ लोग घर में रहकर भी अपने नहीं होते…” “इज्जत कमानी पड़ती है, मुफ्त में नहीं मिलती…”ऐसे ताने अक्सर रसोई से आंगन तक सुनाई देते।

इस हवेली में एक और व्यक्ति रहता था रघुवीर प्रसाद की पोती आराध्या। वह कॉलेज में पढ़ती थी और बाकी परिवार से बिल्कुल अलग सोच रखती थी। उसे हमेशा लगता कि यह घर टूट नहीं रहा, बल्कि लोग खुद अपने हाथों रिश्तों को तोड़ रहे हैं।

एक शाम आराध्या छत पर बैठी पढ़ाई कर रही थी। नीचे आंगन में फिर वही झगड़ा शुरू हो गया। छोटी-सी बात इतनी बढ़ गई कि दोनों बहुओं ने एक-दूसरे के परिवार तक को अपमानित कर दिया। रघुवीर प्रसाद चुपचाप कुर्सी पर बैठे सब सुनते रहे। उनकी आंखों में गहरी उदासी थी।

उस रात आराध्या ने पहली बार दादा जी से पूछा, “दादाजी, लोग कहते हैं कि इस घर की दीवारों के कान हैं। क्या सच में?”

रघुवीर प्रसाद हल्का मुस्कुराए और बोले, “दीवारों के कान नहीं होते बेटी, मगर घर में बोले गए शब्द हमेशा यहीं रह जाते हैं। वे हवा में घुलकर रिश्तों की परछाई बन जाते हैं।”आराध्या देर तक उन शब्दों के बारे में सोचती रही।

कुछ दिनों बाद मोहल्ले में एक बड़ी घटना हुई। पड़ोस के शर्मा जी का परिवार टूट गया। भाइयों में संपत्ति को लेकर इतना बड़ा विवाद हुआ कि मामला अदालत तक पहुंच गया। पूरा मोहल्ला बातें करने लगा। उसी दौरान किसी ने रघुवीर प्रसाद के परिवार की भी पुरानी बातें बाहर फैला दीं।

अब लोग हवेली की इज्जत पर उंगली उठाने लगे। “बाहर से बड़े संस्कारी बनते हैं, अंदर रोज लड़ाई होती है…” ये बातें सुनकर रघुवीर प्रसाद अंदर से टूट गए। जिस सम्मान को उन्होंने पूरी जिंदगी मेहनत से कमाया था, वह धीरे-धीरे बिखर रहा था।

उस रात हवेली में पहली बार सन्नाटा था। तभी आराध्या ने पूरे परिवार को आंगन में बुलाया। सब हैरान थे कि आखिर वह कहना क्या चाहती है।

आराध्या ने दीवारों की ओर देखते हुए कहा, “हम सब कहते हैं कि दीवारों के कान होते हैं। मगर सच ये है कि दीवारें कुछ नहीं बोलतीं। हम खुद अपनी आवाजों से अपने घर की इज्जत गिराते हैं। घर की परछाई हमारे शब्दों से बनती है। अगर हम एक-दूसरे का सम्मान नहीं करेंगे, तो बाहर वाले क्यों करेंगे?”

उसकी आवाज कांप रही थी, मगर शब्द सीधे सबके दिल में उतर रहे थे। नीलम और सविता पहली बार चुप थीं। आराध्या आगे बोली, “जिस घर में रोज अपमान बोया जाए, वहां प्यार कभी नहीं उगता। और जिस घर की परछाई बदनाम हो जाए, उसकी शान भी धीरे-धीरे खत्म हो जाती है।”

रघुवीर प्रसाद की आंखों से आंसू निकल पड़े। उन्होंने कांपते हाथों से आराध्या का सिर सहलाया। उस दिन के बाद धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। नीलम ने पहली बार सविता से बिना कटुता के बात की। अजय और विक्रम साथ बैठने लगे। छोटी-छोटी बातों पर होने वाले झगड़े अब बातचीत से सुलझने लगे।

कुछ महीनों बाद वही हवेली फिर से हंसी से गूंजने लगी। त्योहारों पर घर जगमगाता, आंगन में मिलकर खाना बनता और रघुवीर प्रसाद की आंखों में फिर से संतोष दिखाई देने लगा।

एक दिन मोहल्ले की एक बुजुर्ग महिला ने हवेली को देखकर कहा , “पहले इस घर की दीवारें झगड़े सुनती थीं, अब दुआएं सुनती हैं।”आराध्या मुस्कुरा दी। उसे अब समझ आ गया था कि घर की असली शान उसकी ऊंची दीवारें नहीं होतीं, बल्कि वहां रहने वाले लोगों के शब्द और व्यवहार होते हैं।

क्योंकि दीवारें चाहे जितनी मजबूत हों, अगर रिश्तों की परछाई कमजोर पड़ जाए, तो घर की पहचान भी धुंधली हो जाती है।और जहां सम्मान, अपनापन और प्रेम की रोशनी हो, वहां हर परछाई भी शान बन जाती है।

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