टायर वाला चप्पल संग खरपा...

 विनोद कुमार झा 

मिथिलांचल के धूल-धूसरित गांव में जब भोर के उजास संग कोयल के मीठ स्वर गूंजैत छल, ओहि समय एक पुरान परंपरा सेहो अपन अस्तित्व बचाबए के जद्दोजहद करैत दिखैत छल टायर वाला चप्पल आ खरपा। ई दुनू चीज सिर्फ एक साधारण वस्तु नहि छल, बल्कि एक युग के पहचान, मेहनतकश जिनगी के साथी आ स्वाभिमान के प्रतीक छल।

दरभंगा जिला के एक छोट गाम बिस्फी में रहैत छल रामचरित्र महतो। रामचरित्र एक साधारण किसान छल, लेकिन ओकर जीवन दर्शन बहुत गहिर। ओ अपन खेत में दिन-रात मेहनत करैत छल। ओकर पांव में हमेशा रहैत छल टायर से बनल चप्पल, आ हाथ में खरपा। ई दुनू ओकर पहचान बनि गेल छल।

“ई चप्पल आ खरपा हमरा लेल सिर्फ औजार नहि, हमर साथी अछि,” रामचरित्र अक्सर कहैत छल।

गाम में एक समय छल जखन हर घर में टायर वाला चप्पल बनैत छल। पुरान ट्रक या साइकिल के टायर काटि के बनाओल चप्पल न त जल्दी टूटैत छल, न पानी से खराब होइत छल। ओहि तरह खरपा एक छोट लोहे के औजार खेत में निराई-गुड़ाई के लेल अनिवार्य छल।

लेकिन समय बदलल। बजार में चमचमैत जूता-चप्पल आबए लगल। प्लास्टिक आ रबर के सस्ता लेकिन कम टिकाऊ विकल्प लोक के आकर्षित करए लगल। धीरे-धीरे टायर वाला चप्पल आ खरपा के उपयोग घटए लगल।

रामचरित्र के बेटा राकेश, जे शहर में पढ़ाई करैत छल, एक दिन छुट्टी में गाम एल। ओ देखलक कि ओकर बाबूजी अबहियो ओहि पुरान चप्पल पहिर खेत में काम करैत छथि।

“बाबूजी, आब ई सब छोड़ि दी। बजार में बढ़िया जूता मिलैत अछि,” राकेश कहलक।

रामचरित्र मुस्कुरेलाह, “बेटा, जे चीज हमरा जिनगी भर साथ देलक, ओकरा हम कियैक छोड़ि दी? ई चप्पल हमरा हर कठिन रास्ता में साथ देलक अछि।”

राकेश के मन में जिज्ञासा जगल। ओ अपन बाबूजी के संग खेत गेल। दिन भर के मेहनत के बाद राकेश समझि गेल कि ई साधारण दिखए वाला चप्पल आ खरपा कतेक महत्वपूर्ण अछि।

एक दिन गाम में एक मेला लगल। शहर से आयल एक पत्रकार स्मिता ओहि मेला के कवर करए आयल छल। ओकर नजर रामचरित्र पर पड़ल पांव में टायर वाला चप्पल, हाथ में खरपा, माथ पर पसीना, लेकिन चेहरा पर संतोष।

स्मिता ओहि पर एक कहानी लिखए के निर्णय लेल। ओ रामचरित्र से बातचीत कएलक, ओकर जीवन, संघर्ष आ परंपरा के बारे में जानल। “ई सिर्फ चप्पल नहि अछि, ई हमर संस्कृति अछि,” रामचरित्र कहलक।

स्मिता के लेख राष्ट्रीय अखबार में प्रकाशित भेल “टायर वाला चप्पल संग खरपा: मिथिला के माटि से जुड़ल एक पहचान”।

लेख पढ़ि क’ बहुत लोक प्रभावित भेल। शहर के लोक सेहो एहि पारंपरिक चीज में रुचि देखाबए लगल। धीरे-धीरे गाम में फेर से टायर वाला चप्पल बनए के काम शुरू भेल। युवा वर्ग सेहो एहि में रोजगार के संभावना देखलक।

राकेश सेहो अपन पढ़ाई के बाद गाम लौटि एल। ओ अपन बाबूजी के संग मिलि एक छोट उद्योग शुरू कएलक “मिथिला टायर चप्पल उद्योग”। ओ आधुनिक डिजाइन के संग पारंपरिक मजबूती के जोड़लक।

अब ओ चप्पल सिर्फ गाम में नहि, बल्कि ऑनलाइन प्लेटफॉर्म पर सेहो बिकए लगल। खरपा सेहो नया डिजाइन में बाजार में लोकप्रिय होए लगल।

रामचरित्र के आंख में आंसू छल खुशी के। “हम सोचलियै कि ई सब खत्म भ’ जायत, लेकिन आब लगैत अछि कि हमर परंपरा फेर जिंदा भ’ गेल अछि,” ओ कहलक।

ई कहानी सिर्फ एक आदमी के नहि, बल्कि एक संस्कृति के पुनर्जागरण के कथा अछि। टायर वाला चप्पल आ खरपा ई दुनू आज फेर से मिथिलांचल के माटि में अपन पहचान बना रहल अछि।

जखन आधुनिकता के आंधी सब किछु उड़ा ले जाए के कोशिश करैत अछि, तखन किछु लोक अपन जड़ से जुड़ल रहि के इतिहास के बचाबैत छथि। मिथिला के ई कहानी हमरा सिखबैत अछि कि सादगी में शक्ति अछि, आ परंपरा में भविष्य।

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