फाटल गमछा, नबका अंगा...

 विनोद कुमार झा 

मिथिला के धरती हरियर खेत, कच्चा रस्ता, आ माटि के सोंधी गंध सँ भरल एक छोट गाम छल “सोनबरसा”। एही गाम में रहैत छल एक गरीब लेकिन आत्मसम्मानी परिवार रघुनाथ आ ओकर एकलौता बेटा मधुकर। रघुनाथ विधुर छल; मधुकर के माय बहुत साल पहिने गुजरि गेल छल। ओ दिन सँ रघुनाथ अपन बेटा के माय-बाप दुनू बनि क’ पालि रहल छल।

रघुनाथ के जीवन बहुत कठिन छल। भोर भ’ते उठि जायत, कखनो खेत में मजूरी करैत, त कखनो गाम के धनवान लोकनि के घर पर काम। दिन भरि पसीना बहबैत, तब जाके साँझ में किछु रुपैया हाथ लगैत। ओहि सँ घर चलैत। लेकिन ओकर पास एक चीज एहन छल, जे ओ बहुत सँजो क’ रखैत छल ओकर पुरान गमछा।

ओ गमछा कतेको साल सँ ओकर संग छल धूप में माथा पर, पसीना पोंछे में, कखनो ठंड में ओढ़े में। गमछा एतेक पुरान भ’ गेल छल जे जगह-जगह सँ फाटल, रंग उड़ि गेल, लेकिन रघुनाथ लेल ओ खाली कपड़ा नहि, ओकर संघर्ष के साथी छल।

मधुकर धीरे-धीरे जवान भ’ रहल छल। ओ तेज दिमाग के लड़का छल। जखन गाम के दोसर बच्चा स्कूल जाए, किताब ल’ क’ पढ़े, त मधुकर दूर सँ देखैत रहि जायत। ओकर मन में पढ़े के तीव्र इच्छा छल, लेकिन गरीबी ओकरा रोकि दैत। ओकर लगे एकटा पुरान अंगा छल एतेक घिसल-पिटल जे जगह-जगह सँ सिलाई उधड़ि गेल छल।

एक दिन मधुकर साहस क’ अपन बाप सँ कहलक  “बाबा, हमहूँ स्कूल जाए चाहैत छी। हम पढ़ि-लिखि क’ किछु बन’ चाहैत छी… लेकिन ई हालत में हम स्कूल जएब त लोक हँसत।”

रघुनाथ बेटा के बात सुनि क’ चुप भ’ गेल। ओकर हृदय अंदर सँ टूटि रहल छल। ओ जानैत छल जे बेटा ठीक कहि रहल अछि, लेकिन ओ किछु कर’ में असमर्थ छल। ओ रात रघुनाथ के नींद उड़ि गेल। ओ बार-बार अपन फाटल गमछा के देखैत रहल जणु ओहि सँ किछु रास्ता निकलत।

अगिला भोर, सूरज उगए से पहिने, रघुनाथ चुपचाप उठल। ओ अपन गमछा उठेलक, आँखि सँ लगेलक, आ बाजार दिस निकलि पड़ल। रस्ता भरि ओकर मन में उथल-पुथल चलैत रहल “ई गमछा हमरा संग बरसों रहल… लेकिन अगर ई सँ बेटा के भविष्य बनि सकैत अछि, त ई त्याग छोट नहि।”

बाजार पहुँचि क’ ओ एक दरजी के दुकान पर गेल। दरजी गमछा देखिते हँसि पड़ल “ए बाबू, ई त पूरा फाटल अछि! एही सँ की बनत?”

रघुनाथ हाथ जोड़ि क’ कहलक “भाय, हमरा पास दोसरा किछु नहि अछि। एही सँ हमर बेटा लेल एकटा अंगा बना दे। ओ स्कूल जाए चाहैत अछि…”

दरजी रघुनाथ के आँखि में देखलक ओतय सच्चाई आ बेबसी साफ झलकैत छल। दरजी के दिल पसीज गेल। “ठीक अछि, हम कोशिश करैत छी,” ओ कहलक।

पूरा दिन दरजी ओ फाटल गमछा के टुकड़ा-टुकड़ा जोड़ैत रहल। कतेको जगह पैबंद लगेलक, कहीं सिलाई मजबूत केलक। साँझ तक एकटा अंगा तैयार भ’ गेल साधारण, लेकिन मेहनत आ ममता सँ भरल।

रघुनाथ ओ अंगा ल’ क’ घर आयल। मधुकर उत्सुकता सँ देखलक। जखन ओ अंगा पहनलक, ओकर चेहरा खुशी सँ चमकि उठल।

“बाबा! ई त बहुत सुंदर अछि!”

रघुनाथ के आँखि भरि आयल। ओ सोचलक “आज हम अपन बेटा के सपना के एक छोट शुरुआत दे देलियै।”

अगिला दिन मधुकर पहिल बेर स्कूल गेल। शुरुआत में किछु बच्चा ओकर अंगा देख हँसल, लेकिन जखन गुरुजी ओकर जवाब सुनलखिन, त ओ चौंकि गेलखिन। मधुकर बहुत तेज निकसल। धीरे-धीरे सब ओकरा सम्मान दे’ लगल।

दिन बीतैत गेल। मधुकर हर कठिनाई के पार करैत पढ़ाई में आगे बढ़ैत गेल। ओ रात में दीया के रोशनी में पढ़ैत, दिन में बाप के मदद करैत। ओकर मेहनत रंग ल’ आयल। सालों के संघर्ष के बाद ओ शहर गेल, पढ़ाई पूरी केलक आ अंततः एकटा बड़ सरकारी अधिकारी बनि गेल।

कतेको साल बाद मधुकर अपन गाम लौटि आयल। अब ओ चमचमाता गाड़ी में आयल छल। गाम के लोक आश्चर्यचकित छल। ओ सीधा अपन घर पहुँचल। रघुनाथ अब बूढ़ भ’ गेल छल, लेकिन आँखि में वही अपनापन छल।

मधुकर अपन बाप लेल नबका कपड़ा, धोती, आ दर्जनों अंगा ल’ क’ आयल। “बाबा, आब तोरा किछु कमी नहि रहत,” ओ कहलक।

रघुनाथ मुस्कुरायल। ओ धीरे सँ एक डिब्बा निकाललक। ओहि में ओ फाटल गमछा के एक टुकड़ा अभीयो सुरक्षित छल।

मधुकर चौंकि गेल “बाबा, अहाँ अभीयो ई राखने छी?”

रघुनाथ प्रेम सँ कहलक “बेटा, ई फाटल गमछा नहि अछि… ई हमर त्याग, हमर संघर्ष आ तोहर सपना के शुरुआत अछि। एही सँ त तोहर पहिल नबका अंगा बनल छल।”

मधुकर के आँखि भरि आयल। ओ अपन बाप के गले लगेलक। ओ दिन ओ बुझि गेल जिनगी में सफलता केवल मेहनत सँ नहि, बल्कि ममता आ त्याग सँ बनैत अछि।

जिनगी में कतेको अभाव किएक नहि हो, अगर हृदय में प्रेम, त्याग आ दृढ़ संकल्प अछि, त हर “फाटल गमछा” एक दिन “नबका अंगा” बनि क’ जीवन बदलि सकैत अछि।

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