लेखक: विनोद कुमार झा
मिथिला के एक छोट सन गांव सीतामढ़ी जिला के सीमा पर बसल जहां सब दिन सूरज संग जीवन शुरू होइत आ सांझ के चूल्हा के धुआं संग थम जाइत। ओहि गांव में रहैत छलथिन रामनारायण झा, एक सादा जीवन जीबय वाला, धोती-कुर्ता पहिरय वाला, आ माथ पर ललका गमछा बांधय वाला आदमी। हुनकर ई तीन चिन्ह धुआ धोती आ ललका गमछा गांव में हुनकर पहचान बनि गेल छल।
रामनारायण झा गरीब जरूर छलथिन, मुदा आत्मसम्मान में कखनो कमी नहि छल। खेत कम छल, आमदनी सीमित, मुदा मन में संतोष के खजाना छल। हुनकर घर माटि के बनल, आंगन में तुलसी चौरा, आ कोना में एक पुरान चूल्हा, जतय हर दिन धुआं उठैत छल जैसे जीवन के संघर्ष के गवाही देत हो।
एक दिन हुनकर बेटा, सुरेश, जे शहर में पढ़ाई करैत छल, छुट्टी में गांव एल। सुरेश शहर के रंग-ढंग में ढलि गेल छल जींस-टीशर्ट, मोबाइल आ अंग्रेजी बोलचाल। ओ अपन बाबूजी के देखिते कहलक, “बाबूजी, अहां ई पुरान धोती आ गमछा काहे पहिरैत छी? आब जमाना बदलि गेल अछि। शहर में लोग अहां के देखके हंसी उड़ाएत।”
रामनारायण मुस्कुरेलखिन। धीरे-धीरे चूल्हा पर लकड़ी सुलगबैत कहलक “बाबू, ई धोती आ गमछा हमरा पहचान छै। जइसे ई धुआं, जकरा में हम रोज रोटी पकाबैत छी, ओ हमर मेहनत के निशानी छै।”
सुरेश के बात बुझ में नहि एल। ओ सोचलक “बाबूजी पुरान सोच में अटकल छथि।” दोसर दिन, सुरेश बाबूजी के संग खेत गेल। खेत में काम करैत-करैत रामनारायण के माथ से पसीना टपकत रहल, मुदा ओ ललका गमछा से पोंछि फेर मुस्कुराबैत रहलथिन। सुरेश देखलक बाबूजी के हाथ में छाला पड़ल अछि, मुदा शिकायत के एको शब्द नहि।
सांझ के, घर पर चूल्हा जलल। धुआं धीरे-धीरे उठैत रहल। रामनारायण कहलक “देखह बाबू, ई धुआं खाली आंख में चुभैत नहि, ई हमर के पेट भरैत अछि। ई हमर के जीवन के सच्चाई छै।” सुरेश चुप्प भऽ गेल। ओकरा भीतर कुछ टूट रहल छल। शहर में ओ जे सीखल छल ओ सब इहाँ बेकार लगैत छल।
एक दिन गांव में पंचायत भेल। किछु लोग रामनारायण के खेत पर कब्जा करय चाहैत छल। सब लोग दबाव बनाबय लगल, मुदा रामनारायण अपन धोती के पल्ला कसिके आ गमछा माथ पर बांधि कहलक “हम गरीब जरूर छी, मुदा अपन हक छोड़ब नहि।”
ओकर आवाज में अइसन दृढ़ता छल जे पंचायत के लोग सेहो चुप्प भ गेल। आखिरकार न्याय रामनारायण के पक्ष में भेल। ओ राति सुरेश बहुत देर तक जागैत रहल। ओ सोचैत रहल “ई धोती, ई गमछा, आ ई धुआं ई सब कमजोरी नहि, बल्कि ताकत छै।”
अगिला दिन, सुरेश अपन बाबूजी के पास गेल आ कहलक “बाबूजी, हम गलती कयलियै। अहां जे सिखेलियै, ओ किताब में नहि भेटैत।”रामनारायण मुस्कुरा के कहलक “बाबू, जीवन के असली पढ़ाई ई माटि में होइत छै।”
कुछ दिन बाद, सुरेश शहर लौटल, मुदा एहि बेर ओ बदलि गेल छल। ओ अपन दोस्त सबके गांव के कहानी सुनाबय लागल धुआं के, जे संघर्ष के प्रतीक छै; धोती के, जे सादगी के प्रतीक छै; आ ललका गमछा के, जे मेहनत आ स्वाभिमान के पहचान छै।
समय बीतल। सुरेश पढ़-लिख के बड़ा अफसर बनल, मुदा ओ अपन जड़ि नहि भूलल। हर साल गांव आबैत, बाबूजी संग खेत में समय बिताबैत, आ ओही चूल्हा के धुआं में अपन बचपन खोजैत।
गांव में आजो लोग कहैत छै “रामनारायण झा के धोती आ ललका गमछा खाली कपड़ा नहि, बल्कि एक सोच छै जकरा में आत्मसम्मान, मेहनत आ सादगी बसल छै।”आ सच कहूँ त, ओ धुआं आजो उठैत अछि कखनो चूल्हा से, कखनो संघर्ष से मुदा हर बेर एक नया कहानी कहि जाइत अछि।
—समाप्त—
