सुरेश जोरासिया
हर वर्ष 2 अप्रैल 2018 का वह दिन हमें अपने अधिकार के बारे में सदा याद दिलाते रहेंगे। जिस दिन संविधान और नागरिक अधिकारों की रक्षा में जन-आंदोलन में कईयों ने अपने प्राणों का बलिदान दिया था। भारतीय लोकतंत्र की आधारशिला हमारा संविधान है, जो समाज के हर वर्ग, विशेषकर वंचितों और शोषितों को सम्मान और सुरक्षा की गारंटी देता है। जब-जब इस संवैधानिक सुरक्षा चक्र पर आंच आई है, देश के सजग नागरिकों और वीरों ने सड़कों पर उतरकर इसकी रक्षा की है। 2 अप्रैल 2018 का दिन इतिहास के पन्नों में एक ऐसे ही संघर्ष और बलिदान के रूप में दर्ज है, जब 'भारत बंद' के दौरान देश के विभिन्न हिस्सों में लोगों ने अपने संवैधानिक अधिकारों को बचाने के लिए आहुति दी।
जन-आंदोलन
यह संघर्ष अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) के प्रावधानों में आए बदलावों के विरोध में शुरू हुआ था। इस अधिनियम को संविधान के अनुच्छेद 15 और 17 की भावनाओं को लागू करने वाला एक सशक्त कवच माना जाता है। जब सर्वोच्च न्यायालय के एक फैसले से इस कानून के नरम होने की आशंका पैदा हुई, तो देश के दलित और आदिवासी समाज को लगा कि उनके संवैधानिक अधिकारों का हनन हो रहा है। इसी 'संवैधानिक सुरक्षा कवच' को बचाने के लिए 2 अप्रैल 2018 को राष्ट्रव्यापी आंदोलन का आह्वान किया गया।
वीरों का संघर्ष और शहादत
इस आंदोलन के दौरान मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, राजस्थान और हरियाणा जैसे राज्यों में भारी विरोध प्रदर्शन हुए। हज़ारों लोग हाथों में संविधान की प्रतियां और नीले झंडे लेकर सड़कों पर निकल पड़े। दुर्भाग्यवश, कई जगहों पर यह प्रदर्शन हिंसक झड़पों में बदल गया। प्रशासन की कार्रवाई और आपसी संघर्ष में ग्वालियर, भिंड और मुरैना जैसे क्षेत्रों में कई युवाओं ने अपनी प्राणों प्राणों की आहुति दी गई । इन वीरों ने किसी व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के सामाजिक न्याय और संवैधानिक सुरक्षा को सुनिश्चित करने के लिए अपने प्राणों की आहुति दी।
बलिदान का प्रभाव
इन वीरों का बलिदान व्यर्थ नहीं गया। इस व्यापक जन-आक्रोश और शहादत के दबाव में सरकार को संसद में कानून लाकर सुप्रीम कोर्ट के फैसले को पलटना पड़ा और SC/ST एक्ट को उसके मूल स्वरूप में बहाल किया गया। यह घटना इस बात का प्रमाण है कि भारत का आम नागरिक अपने संविधान और उसके द्वारा प्रदत्त अधिकारों के प्रति कितना सजग है।
2 अप्रैल 2018 की घटना हमें याद दिलाती है कि लोकतंत्र केवल मतों का खेल नहीं है, बल्कि यह उन मूल्यों की रक्षा का संकल्प है जो बाबासाहेब अंबेडकर ने हमें दिए थे। उन वीरों का बलिदान हमें प्रेरित करता है कि हम संविधान की गरिमा को बनाए रखने के लिए सदैव तत्पर रहें। संविधान की रक्षा का अर्थ केवल कागज की रक्षा नहीं, बल्कि उस न्याय और समानता की रक्षा है जिसके लिए वीरों ने अपना लहू बहाया।
