ईरान–अमेरिका टकराव के बहाने बदलती विश्व राजनीति
विनोद कुमार झा
दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में सुलगते संघर्षों के बीच ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ता तनाव वैश्विक राजनीति का सबसे संवेदनशील अध्याय बन चुका है। यह टकराव केवल दो देशों की प्रतिद्वंद्विता नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया में प्रभाव, ऊर्जा संसाधनों और वैचारिक वर्चस्व की बहुस्तरीय लड़ाई है। ऐसे समय में जब Russia– Ukraine युद्ध और इजरायल–हमास संघर्ष पहले ही वैश्विक अस्थिरता को बढ़ा चुके हैं, ईरान–अमेरिका समीकरण विश्व शांति के लिए नई चुनौती प्रस्तुत करता है।
ईरान–अमेरिका संबंधों में कड़वाहट का इतिहास 1979 की इस्लामी क्रांति से जुड़ा है, जब तेहरान में अमेरिकी दूतावास संकट ने दोनों देशों के रिश्तों को गहरी खाई में धकेल दिया। इसके बाद दशकों तक प्रतिबंध, बयानबाजी और परोक्ष संघर्ष चलते रहे। 2015 में Joint Comprehensive Plan of Action (JCPOA) के तहत परमाणु समझौता हुआ, जिसमें ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम पर सीमाएं स्वीकार कीं और बदले में प्रतिबंधों में राहत मिली। परंतु 2018 में डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने इस समझौते से हटकर पुनः कठोर आर्थिक प्रतिबंध लागू कर दिए। इसके बाद तनाव का नया दौर शुरू हुआ, जिसने खाड़ी क्षेत्र को अस्थिर कर दिया।
छाया युद्ध और प्रत्यक्ष टकराव : जनवरी 2020 में Qasem Soleimani की अमेरिकी ड्रोन हमले में हत्या ने दोनों देशों को सीधे टकराव के मुहाने पर ला खड़ा किया। जवाब में ईरान ने इराक स्थित अमेरिकी ठिकानों पर मिसाइल हमले किए। हालांकि पूर्ण युद्ध टल गया, लेकिन इसके बाद से “छाया युद्ध” की रणनीति तेज हो गई। ईरान पर आरोप है कि वह पश्चिम एशिया में अपने सहयोगी समूहों जैसे लेबनान में हिज्बुल्लाह और यमन में हूती विद्रोहियों के माध्यम से अमेरिकी हितों को चुनौती देता है। दूसरी ओर अमेरिका, खाड़ी देशों और इज़राइल के साथ सामरिक साझेदारी को मजबूत कर ईरान पर दबाव बनाए हुए है।
इराक और सीरिया की धरती पर दोनों देशों के हित कई बार अप्रत्यक्ष रूप से टकरा चुके हैं। लाल सागर और फारस की खाड़ी में जहाजों पर हमलों तथा ड्रोन गतिविधियों ने समुद्री व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को भी प्रभावित किया है।
वैश्विक चिंता का केंद्र : ईरान का परमाणु कार्यक्रम इस पूरे विवाद का मूल बिंदु है। पश्चिमी देशों को आशंका है कि ईरान परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने की दिशा में बढ़ रहा है, जबकि तेहरान का दावा है कि उसका कार्यक्रम केवल ऊर्जा और वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए है। यदि यह विवाद और गहराता है, तो परमाणु हथियारों की होड़ तेज हो सकती है। खाड़ी क्षेत्र के अन्य देश भी अपनी सुरक्षा रणनीति पर पुनर्विचार कर सकते हैं। यह स्थिति केवल क्षेत्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक संतुलन को प्रभावित करने वाली है।
ऊर्जा, अर्थव्यवस्था और कूटनीति : पश्चिम एशिया दुनिया के सबसे बड़े तेल उत्पादक क्षेत्रों में से एक है। ईरान–अमेरिका तनाव के कारण तेल की कीमतों में अस्थिरता आती है, जिसका असर भारत जैसे ऊर्जा आयातक देशों पर सीधा पड़ता है।भारत के लिए यह स्थिति विशेष रूप से संवेदनशील है, क्योंकि एक ओर उसके अमेरिका से रणनीतिक संबंध मजबूत हो रहे हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ ऐतिहासिक और आर्थिक संबंध भी महत्वपूर्ण हैं विशेषकर चाबहार बंदरगाह परियोजना के संदर्भ में।
क्या यह तीसरे विश्व युद्ध की प्रस्तावना?
विश्लेषकों का मानना है कि प्रत्यक्ष युद्ध की संभावना सीमित है, क्योंकि दोनों पक्ष जानते हैं कि व्यापक संघर्ष का परिणाम विनाशकारी होगा। फिर भी “सीमित युद्ध”, साइबर हमले, आर्थिक प्रतिबंध और प्रॉक्सी संघर्षों का सिलसिला जारी रह सकता है। आज की विश्व व्यवस्था बहुध्रुवीय हो चुकी है। चीन और रूस जैसे देश भी इस समीकरण में अपनी भूमिका निभा रहे हैं। ऐसे में यदि किसी क्षेत्रीय संघर्ष में बड़ी शक्तियां खुलकर आमने-सामने आ गईं, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर जा सकती है।
तानाशाही प्रवृत्तियों का उभार : लगातार युद्ध और सुरक्षा संकट का माहौल अक्सर सरकारों को कठोर कदम उठाने का अवसर देता है। “राष्ट्रीय सुरक्षा” के नाम पर नागरिक स्वतंत्रताओं में कटौती, मीडिया पर नियंत्रण और असहमति पर अंकुश जैसी प्रवृत्तियां कई देशों में देखी जा रही हैं। युद्ध का भय केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहता; वह लोकतांत्रिक मूल्यों को भी प्रभावित करता है। यदि वैश्विक राजनीति संवाद की जगह शक्ति प्रदर्शन पर आधारित होगी, तो तानाशाही प्रवृत्तियों का विस्तार स्वाभाविक है।
ईरान और अमेरिका दोनों के लिए कूटनीतिक रास्ता ही दीर्घकालिक समाधान है। परमाणु समझौते को पुनर्जीवित करना, क्षेत्रीय सुरक्षा ढांचे को मजबूत करना और आर्थिक प्रतिबंधों के दुष्प्रभावों को कम करना आवश्यक कदम हो सकते हैं। United Nations और अन्य बहुपक्षीय मंचों को अधिक सक्रिय और प्रभावी भूमिका निभानी होगी। दुनिया को यह समझना होगा कि आधुनिक युद्ध का कोई विजेता नहीं होता सिर्फ मानवता हारती है।
ईरान–अमेरिका टकराव केवल दो राष्ट्रों की शक्ति-परीक्षा नहीं, बल्कि बदलती विश्व व्यवस्था का प्रतीक है। यदि समय रहते संवाद और संतुलन की राह नहीं अपनाई गई, तो यह तनाव वैश्विक संकट का रूप ले सकता है। तीसरे विश्व युद्ध की आशंका चाहे अतिशयोक्ति लगे, पर रुक-रुककर सुलगती आग यह संकेत अवश्य देती है कि दुनिया एक संवेदनशील मोड़ पर खड़ी है। अब यह निर्णय विश्व नेतृत्व को करना है क्या भविष्य हथियारों की गूंज में लिखा जाएगा या कूटनीति की स्याही से?
