विनोद कुमार झा
पश्चिम एशिया में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव ने एक बार फिर वैश्विक अर्थव्यवस्था की नाजुकता को उजागर कर दिया है। ईरान, अमेरिका और इजरायल के बीच जारी टकराव का सीधा असर अंतर्राष्ट्रीय ऊर्जा बाजार पर पड़ा है। विशेष रूप से होर्मुज जलडमरूमध्य में उत्पन्न बाधाओं ने कच्चे तेल की आपूर्ति को प्रभावित कर कीमतों में अप्रत्याशित उछाल ला दिया है। एक महीने के भीतर क्रूड ऑयल का 70 डॉलर प्रति बैरल से 122 डॉलर तक पहुंच जाना न केवल आर्थिक असंतुलन का संकेत है, बल्कि आने वाले समय की गंभीर चुनौतियों का भी पूर्वाभास कराता है।
राज्यसभा में फाइनेंस बिल पर चर्चा के दौरान निर्मला सीतारमण ने इस स्थिति की गंभीरता को रेखांकित करते हुए स्पष्ट किया कि निकट भविष्य में तेल की कीमतों में गिरावट की उम्मीद कम है। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि 30 मार्च तक कीमतें 100 डॉलर प्रति बैरल से नीचे नहीं आएंगी। इस पृष्ठभूमि में सरकार द्वारा पेट्रोल और डीजल पर उत्पाद शुल्क में कटौती का निर्णय आम जनता को तात्कालिक राहत देने का प्रयास है, लेकिन यह कदम दीर्घकालिक समाधान नहीं माना जा सकता।
दरअसल, होर्मुज जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का एक प्रमुख मार्ग है, जहां से दुनिया के कुल समुद्री तेल परिवहन का बड़ा हिस्सा गुजरता है। इस मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट का असर सीधे अंतरराष्ट्रीय बाजार पर पड़ता है। भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर हैं, इस प्रकार की अस्थिरता से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। बढ़ती तेल कीमतें परिवहन, उद्योग और रोजमर्रा की वस्तुओं की कीमतों को बढ़ाकर महंगाई को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा देती हैं।
इस आर्थिक दबाव के बीच देश का राजनीतिक वातावरण भी सक्रिय हो उठा है। ममता बनर्जी ने बढ़ती महंगाई, एलपीजी सिलेंडर की कीमतों और आपूर्ति में देरी को लेकर केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। उनका यह कहना कि आम लोग अब पारंपरिक ईंधन की ओर लौटने को मजबूर हो रहे हैं, एक गंभीर सामाजिक संकेत है। यह स्पष्ट करता है कि ऊर्जा संकट अब केवल आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक और राजनीतिक मुद्दा भी बन चुका है।
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी स्थिति कम जटिल नहीं है। डोनाल्ड ट्रंप द्वारा किए गए दावे और ईरान की कड़ी प्रतिक्रिया इस बात को दर्शाती है कि कूटनीतिक स्तर पर स्पष्टता का अभाव है। जहां एक ओर बातचीत और समझौते के संकेत दिए जा रहे हैं, वहीं दूसरी ओर तनाव और टकराव की स्थिति बनी हुई है।
ऐसे समय में भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि वह इस वैश्विक संकट के बीच अपनी ऊर्जा सुरक्षा और आर्थिक स्थिरता को कैसे बनाए रखे। तात्कालिक राहत के उपाय आवश्यक हैं, लेकिन दीर्घकालिक समाधान के लिए वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों को बढ़ावा देना, रणनीतिक भंडारण को मजबूत करना और संतुलित कूटनीतिक नीति अपनाना अनिवार्य होगा। यही दूरदर्शिता देश को इस संकट से उबारने में सहायक सिद्ध हो सकती है।
- संपादक
