विनोद कुमार झा
मां… यह केवल एक शब्द नहीं, बल्कि त्याग, स्नेह, करुणा और अटूट विश्वास का वह विराट स्वरूप है, जिसके बिना जीवन की कल्पना अधूरी लगती है। संसार में यदि किसी रिश्ते को सबसे अधिक निस्वार्थ माना गया है, तो वह मां का रिश्ता है। एक मां अपने बच्चे के लिए स्वयं को पूरी तरह समर्पित कर देती है। उसकी खुशियों में मुस्कुराती है और उसके दुखों में भीतर ही भीतर टूट जाती है। शायद यही कारण है कि हर वर्ष मई महीने के दूसरे रविवार को पूरी दुनिया “मदर्स डे” के रूप में उस ममता को नमन करती है, जिसने मानव सभ्यता को संस्कार और संवेदनाओं की डोर में बांध रखा है।
आज का समय तेज़ रफ्तार जिंदगी का समय है। आधुनिकता, व्यस्तता और प्रतिस्पर्धा के इस दौर में परिवारों का स्वरूप बदल रहा है। संयुक्त परिवार अब तेजी से एकल परिवारों में बदल चुके हैं। ऐसे समय में मां की भूमिका और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। वह केवल बच्चों की देखभाल करने वाली महिला नहीं रह गई है, बल्कि वह परिवार की भावनात्मक धुरी बन चुकी है। घर और नौकरी के बीच संतुलन बनाते हुए भी वह अपने बच्चों के सपनों को अपने सपनों से ऊपर रखती है।
भारतीय संस्कृति में मां को देवी का स्वरूप माना गया है। हमारे शास्त्रों में कहा गया है “मातृ देवो भवः” अर्थात मां देवता के समान है। भगवान राम से लेकर भगवान कृष्ण तक की कथाओं में मातृत्व की महिमा स्पष्ट दिखाई देती है। यशोदा का वात्सल्य, कौशल्या का स्नेह और कुंती का संघर्ष आज भी समाज को प्रेरणा देता है। यही कारण है कि भारतीय समाज में मां केवल परिवार की सदस्य नहीं, बल्कि संस्कारों की पहली गुरु मानी जाती है।
मदर्स डे केवल उपहार देने या सोशल मीडिया पर तस्वीरें साझा करने का अवसर नहीं होना चाहिए। यह दिन आत्ममंथन का भी दिन है। हमें यह सोचना चाहिए कि जिस मां ने अपने जीवन का हर क्षण हमारे लिए समर्पित किया, क्या हम उसके लिए कुछ पल भी निकाल पा रहे हैं? वृद्धाश्रमों में बढ़ती बुजुर्ग माताओं की संख्या आधुनिक समाज के लिए एक गंभीर चेतावनी है। तकनीक ने लोगों को जोड़ने का दावा किया, लेकिन भावनात्मक दूरी भी बढ़ा दी। ऐसे में जरूरत है कि हम मां के प्रति अपने दायित्वों को समझें और उन्हें सम्मान के साथ अपनाएं।
एक मां बच्चे को केवल जन्म नहीं देती, बल्कि उसे जीवन जीने की कला भी सिखाती है। वह अपने आंचल में संस्कारों की वह गर्माहट देती है, जो कठिन परिस्थितियों में भी मनुष्य को टूटने नहीं देती। बच्चे का पहला विद्यालय मां की गोद होती है और पहला शिक्षक उसकी मां। उसकी लोरी में प्रेम होता है, उसकी डांट में चिंता और उसकी चुप्पी में हजारों दुआएं छिपी होती हैं।
समाज में महिलाओं की बदलती भूमिका के बीच मातृत्व को समझना और उसका सम्मान करना आज पहले से अधिक आवश्यक हो गया है। एक ओर महिलाएं अंतरिक्ष से लेकर प्रशासन तक हर क्षेत्र में अपनी पहचान बना रही हैं, वहीं दूसरी ओर वे मां के रूप में परिवार की नींव को भी मजबूती दे रही हैं। इसलिए मदर्स डे केवल भावनाओं का उत्सव नहीं, बल्कि नारी शक्ति के सम्मान का भी प्रतीक है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम केवल एक दिन नहीं, बल्कि हर दिन मां के प्रति अपने प्रेम और सम्मान को व्यक्त करें। उनके त्याग को समझें, उनकी भावनाओं का आदर करें और उन्हें यह एहसास दिलाएं कि वे परिवार की सबसे अनमोल धरोहर हैं। क्योंकि सच यही है कि मां का प्रेम जीवन का वह अमृत है, जिसकी कोई तुलना नहीं हो सकती।
मदर्स डे पर हर मां को नमन उस ममता को प्रणाम, जो बिना किसी अपेक्षा के जीवन भर अपने बच्चों के लिए दीपक की तरह जलती रहती है।
