जीवन भी धूंए की तरह है जलना, उठना, फैलना और अंत में मिट जाना।
सफलता, पैसा, पद सब धुएँ की तरह हैं।
रिश्ते, प्रेम और जड़ें ही असली आग हैं जो जीवन को अर्थ देती हैं
विनोद कुमार झा
सांझ का समय था। गंगा की एक छोटी सहायक नदी के किनारे बसे गाँव “सोनपुर” के आकाश में धुआँ लहराता हुआ ऊपर उठ रहा था। कहीं चूल्हे जल रहे थे, कहीं गुड़ की भट्टियाँ सुलग रही थीं, तो कहीं किसान अपने खेतों में पराली जला रहे थे। यह धुआँ केवल जलती लकड़ियों का नहीं था, बल्कि सदियों से जिए जा रहे ग्रामीण जीवन का प्रतीक था मेहनत, संघर्ष, भूख, संतोष और उम्मीद का मिला-जुला रूप।
अरुण उस नदी के किनारे पुराने पीपल के नीचे बैठा था। उसकी आँखों में बचपन की यादें तैर रही थीं। हवा में मिट्टी की सौंधी खुशबू थी, और दूर कहीं से बांसुरी की धीमी-सी धुन सुनाई पड़ रही थी। नदी का पानी शांत था, लेकिन भीतर कहीं गहराई में बहता हुआ जीवन-संगीत सुनाई देता था।
अरुण के पिता रामचरण एक साधारण किसान थे ईमानदार, मेहनती और जमीन से जुड़े हुए इंसान। उनकी पीठ पर धूप की कालिमा थी, हाथों में दरारें थीं, मगर दिल में करुणा का सागर था। माँ सुमित्रा चूल्हे पर रोटियाँ सेंकते हुए अक्सर कहती,
“बेटा, जीवन भी इसी धुएँ जैसा है कभी आँखों में चुभेगा, कभी हवा में खो जाएगा, पर रुकना मत।”
अरुण का बचपन खेतों में बीता। वह मिट्टी में खेलता, बैलों के पीछे दौड़ता और माँ की गोद में सिर रखकर सो जाता। गाँव में न बिजली की चमक थी, न शहरों जैसी चकाचौंध—फिर भी वहाँ एक ऐसा अपनापन था जो दुनिया की किसी भी दौलत से बड़ा था।
समय बीतता गया। अरुण बड़ा हुआ। उसकी आँखों में सपने थे शहर जाने के, पढ़ने के, कुछ बड़ा बनने के। गाँव के स्कूल में पढ़ते हुए वह अक्सर आकाश में उड़ते पक्षियों को देखता और सोचता, “काश मैं भी ऐसे उड़ पाता।”
पिता ने अपनी जमीन का एक हिस्सा गिरवी रखकर अरुण को शहर भेजा। वह पहला दिन था जब अरुण ने सोनपुर छोड़ा। माँ ने उसे माथे पर टीका लगाया, पिता ने कंधे पर हाथ रखा और कहा, “बेटा, जहाँ भी जाओ, अपनी मिट्टी मत भूलना।” शहर पहुँचते ही अरुण की आँखें चौंधिया गईं। ऊँची इमारतें, दौड़ती गाड़ियाँ, तेज रोशनी, शोर सब कुछ अलग था। वहाँ हर कोई जल्दी में था, किसी के पास रुकने का वक्त नहीं था।
कॉलेज के दिनों में अरुण ने खूब मेहनत की। दिन में पढ़ाई और रात में छोटे-मोटे काम करता। धीरे-धीरे वह अपने पैरों पर खड़ा हुआ। नौकरी मिली, पैसा आने लगा, नाम होने लगा। पर इसके साथ ही भीतर कहीं एक खालीपन भी बढ़ने लगा।
अरुण अब एक बड़ी कंपनी में मैनेजर बन चुका था। उसका फ्लैट था, गाड़ी थी, बैंक बैलेंस था—पर रिश्तों की गर्माहट कहीं खो गई थी। वह अब गाँव कम जाता था। माँ की आवाज़ फोन पर सुनकर भी वह जल्दी से कह देता,“माँ, अभी मीटिंग है, बाद में बात करूँगा।”
शहर की हवा ने उसे बदल दिया था। वह अब धुएँ से भरे आसमान को देखकर परेशान हो जाता, जबकि बचपन में वही धुआँ उसे अपनापन देता था। उसके दोस्त महंगे क्लबों में मिलते, पर कोई भी उसके दिल को नहीं समझ पाता।
एक दिन वह ऑफिस की बालकनी में खड़ा होकर आसमान की ओर देख रहा था। ऊँची चिमनियों से निकलता धुआँ उसे अपने जीवन जैसा लगा ऊपर उठता हुआ, फैलता हुआ, पर अंततः कहीं खो जाता हुआ। एक शाम अचानक फोन आया “अरुण, तुम्हारे पिता बहुत बीमार हैं… जल्दी आ जाओ।”
अरुण का दिल धक से रह गया। वह तुरंत गाँव के लिए निकला। रास्ते भर उसे बचपन की यादें सताती रहीं—माँ की रोटियाँ, पिता का हल चलाना, नदी किनारे खेलना। गाँव पहुँचते ही उसने देखा घर वही था, चूल्हा वही था, पर माहौल बदला हुआ था। माँ चूल्हे के पास बैठी थी, आँखों में आँसू लिए। पिता खाट पर लेटे थे, साँसें धीमी चल रही थीं।
अरुण ने पिता का हाथ पकड़ा। पिता ने मुश्किल से आँखें खोलीं और हल्की-सी मुस्कान दी।
“बेटा… तू आ गया…”और फिर उनकी साँसें धुएँ की तरह ऊपर उठकर आकाश में विलीन हो गईं। उस रात अरुण सो नहीं पाया। वह नदी किनारे जाकर बैठ गया। चूल्हे से उठता धुआँ दूर आसमान में खो रहा था। उसे लगा मानो उसके पिता भी उसी धुएँ के साथ ऊपर चले गए हों।
उसे एहसास हुआ कि जीवन कितना क्षणभंगुर है। सफलता, पैसा, पद—सब धुएँ की तरह हैं। असली जीवन तो रिश्तों में है, मिट्टी में है, प्रेम में है।
उसे माँ की बातें याद आईं “धुआँ आँखों में चुभता है, पर आग के बिना रोटी नहीं बनती।”अरुण समझ गया कि संघर्ष के बिना जीवन अधूरा है। सुबह होते ही अरुण ने माँ से कहा,“माँ, मैं शहर लौटूँगा, पर गाँव को कभी नहीं छोड़ूँगा।”
उसने तय किया कि वह गाँव में एक स्कूल बनवाएगा, किसानों की मदद करेगा और अपने पिता की स्मृति में एक पुस्तकालय खोलेगा। उसने देखा नदी के ऊपर धुआँ अब भी उठ रहा था, पर अब वह उसे बोझ नहीं लगा, बल्कि प्रेरणा लगा। वर्ष बीत गए। अरुण अब दो जगहों का आदमी बन चुका था आधा शहर का, आधा गाँव का। वह हर महीने सोनपुर आता, माँ के साथ बैठकर चूल्हे पर बनी रोटियाँ खाता और बच्चों को पढ़ाता।
गाँव में उसने “रामचरण स्मृति विद्यालय” खोला। बच्चे खुश थे, किसान सशक्त हो रहे थे, और सोनपुर बदल रहा था पर उसकी आत्मा वही रही। अरुण अक्सर नदी किनारे बैठकर आसमान में उड़ते धुएँ को देखता और मन ही मन कहता, “उठो, बहो, उड़ो… मगर अपनी मिट्टी मत भूलो।” और धुआँ मानो मुस्कुराते हुए उसे आशीर्वाद देता, “यही जीवन है, अरुण… जलो, तपो, चमको और फिर मिट्टी में मिल जाओ।”
यह कहानी केवल अरुण की नहीं, बल्कि हर उस इंसान की है जो गाँव से शहर जाता है, सफलता पाता है, पर अंत में अपनी जड़ों की ओर लौटता है। धुआँ हमें सिखाता है, उठना जरूरी है, फैलना जरूरी है पर जड़ों से कटना नहीं।
