लेखक: विनोद कुमार झा
गाँव पिपराही में जैसे ही खबर फैली कि शहर से बड़े बाबू रामनारायण जी अपने पूरे परिवार के साथ आ रहे हैं, वैसे ही घर में हलचल मच गई। रामनारायण जी सालों से शहर में नौकरी करते थे और गाँव में उनकी पुश्तैनी हवेली बंद पड़ी रहती थी। इस बार उन्होंने तय किया कि फाल्गुन के महीने में पूरा परिवार गाँव जाकर होली मनाएगा। बस फिर क्या था—रिश्तेदारों के चेहरे पर ऐसी चमक आई मानो लॉटरी लग गई हो।
रामनारायण जी के छोटे भाई शिवकुमार सबसे पहले पहुँचे। आते ही बोले, “भइया, आप तो शहर में बड़े आदमी हो गए हैं, अब गाँव का घर भी थोड़ा ठीक-ठाक करवा दीजिए।” उनके पीछे-पीछे चचेरे, ममेरे, फुफेरे भाई-बहन, भतीजे-भतीजियाँ सब आ धमके। कोई बच्चों को लेकर आया, कोई अपनी फरमाइशों की लंबी सूची लेकर। घर जो वर्षों से शांत था, अचानक मेले में बदल गया।
पहले दिन तो सबने मिलकर साफ-सफाई की, लेकिन दूसरे ही दिन से रिश्तेदारों की मौज शुरू हो गई। सुबह गरम-गरम जलेबी और कचौड़ी की फरमाइश, दोपहर में पापड़ और रायता, शाम को चाय के साथ पकौड़ी। रामनारायण जी मुस्कुरा कर सबकी इच्छाएँ पूरी करते रहे। उनकी पत्नी सावित्री देवी थोड़ी चिंतित थीं—रसोई का सामान तेजी से खत्म हो रहा था और खर्च भी बढ़ता जा रहा था। पर वह सोचतीं, “चलो, सालों बाद सब साथ तो हैं।”
इधर बच्चों की टोली पूरे गाँव में धमाचौकड़ी मचा रही थी। कभी आम के बाग में झूला, कभी तालाब किनारे पिकनिक। बड़े लोग चौपाल में बैठकर राजनीति और खेती की बातें करते। लेकिन बातों-बातों में हर कोई किसी न किसी लाभ की उम्मीद लगाए बैठा था। कोई नौकरी की सिफारिश चाहता था, कोई अपने बेटे की पढ़ाई का खर्च। रिश्तेदारी के नाम पर सबकी झोली खुली थी।
होली के दिन तो जैसे रंगों के साथ इच्छाओं की भी बरसात हो गई। ढोलक की थाप पर सब नाचे-गाए। रामनारायण जी ने खुले दिल से सबको नए कपड़े और बच्चों को उपहार दिए। उस दिन सच में रिश्तेदारों की मौज चरम पर थी। पर रात को जब सब थककर सो गए, तब सावित्री देवी ने धीरे से पूछा, “इतना खर्च… क्या ठीक है?”
रामनारायण जी ने गहरी साँस ली और बोले, “सावित्री, पैसा फिर आ जाएगा। पर यह हँसी-खुशी, यह अपनापन शायद फिर न मिले। अगर हमारी वजह से सबके चेहरे पर मुस्कान आई है, तो यही हमारी कमाई है।” लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं हुई। अगले दिन जब विदाई का समय आया, तो कई रिश्तेदार बिना धन्यवाद कहे ही अपने-अपने रास्ते निकल गए। कुछ ने तो जाते-जाते और मदद की उम्मीद भी जता दी। सावित्री देवी को थोड़ा खटका हुआ। पर तभी शिवकुमार वापस लौटे और बोले, “भइया, आपने जो किया, वह हम कभी नहीं भूलेंगे। रिश्तेदारी निभाना हर किसी के बस की बात नहीं।”
रामनारायण जी मुस्कुरा दिए। उन्हें समझ आ गया कि रिश्तों की असली कीमत मौज-मस्ती में नहीं, बल्कि सच्चे अपनत्व में है। कुछ लोग सिर्फ लाभ के लिए आते हैं, पर कुछ दिल से जुड़े होते हैं। गाँव की हवेली फिर शांत हो गई, पर इस बार उसमें यादों की गूंज थी।
रिश्तेदारों की मौज ने रामनारायण जी को एक सीख दे दी, रिश्ते निभाइए, पर समझदारी से। क्योंकि सच्चा सुख दूसरों को खुश देखकर मिलता है, पर अपने घर की नींव मजबूत रखना भी उतना ही जरूरी है।
