घर से बड़ा ससुराल...

 लेखक: विनोद कुमार झा 

गांव की पगडंडी पर बिछी धूप जैसे किसी नई शुरुआत का संकेत दे रही थी। आम के पेड़ों से छनकर आती हवा में एक अजीब-सी मिठास थी। आज राधिका की विदाई थी। जिस आंगन में उसने बचपन से खेला, जहां हर कोने में उसकी हंसी गूंजी थी, वह घर आज उसे पराया कर रहा था। मां की आंखें नम थीं, पिता का गला भरा हुआ था, और राधिका के मन में ढेरों सवाल थे क्या सचमुच ससुराल अपना हो पाएगा? क्या वहां उसे वही अपनापन मिलेगा?

राधिका की शादी पास के कस्बे में रहने वाले विनय से हुई थी। विनय एक सरल स्वभाव का युवक था, जो अपने माता-पिता का बहुत आदर करता था। शादी के बाद जब राधिका पहली बार ससुराल पहुंची, तो मन में संकोच था। उसे डर था कि कहीं कोई गलती न हो जाए, कहीं वह सबकी उम्मीदों पर खरी न उतर पाए।

ससुराल का घर बड़ा था—सिर्फ आकार में ही नहीं, दिलों में भी। सास, सावित्री देवी, ने उसे दरवाजे पर ही गले लगा लिया। “बेटी, ये घर अब तुम्हारा है,” उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा। उन शब्दों में ऐसी सच्चाई थी कि राधिका की आंखों की नमी हल्की हो गई। ससुर, रामनाथ जी, ने भी पिता की तरह आशीर्वाद दिया। देवर और ननद ने हंसी-ठिठोली से माहौल हल्का कर दिया।

शुरुआत के कुछ दिन राधिका चुपचाप सबको देखती-सुनती रही। वह हर काम सीखने की कोशिश करती, हर रिश्ते को समझने की कोशिश करती। कभी-कभी उसे अपने मायके की याद आती और वह रात में चुपके से आंसू बहा लेती। लेकिन धीरे-धीरे उसने महसूस किया कि यहां भी उसके आंसुओं को समझने वाले लोग हैं।

एक दिन सास की तबीयत अचानक बिगड़ गई। घर में हलचल मच गई। राधिका ने बिना घबराए पूरे घर की जिम्मेदारी संभाल ली। डॉक्टर को बुलाया, दवा दी, खाना बनाया, सबका ध्यान रखा। उस दिन पहली बार रामनाथ जी की आंखों में गर्व झलक रहा था। उन्होंने कहा, “बेटी, आज तूने इस घर को संभाल लिया।” समय बीतता गया। राधिका ने ससुराल को सिर्फ कर्तव्य नहीं, अपनापन समझा। उसने अपने व्यवहार से सबका दिल जीत लिया। त्योहारों पर वह पूरे घर को सजा देती, रिश्तेदारों का आदर करती, और हर छोटे-बड़े काम में आगे रहती। धीरे-धीरे उसे महसूस हुआ कि ससुराल का यह घर केवल एक नया ठिकाना नहीं, बल्कि एक नया परिवार है।

कुछ महीनों बाद राधिका अपने मायके गई। मां ने पूछा, “बेटी, ससुराल में ठीक है न?” राधिका मुस्कुरा उठी। उसने कहा, “मां, वहां मुझे बेटी से ज्यादा बहू नहीं, घर की बड़ी बेटी जैसा मान मिला है। मुझे लगा था कि अपना घर पीछे छूट जाएगा, लेकिन वहां जाकर समझ में आया कि दिल से अपनाया जाए तो ससुराल भी घर से बड़ा हो सकता है।”

मां ने उसकी बात सुनकर राहत की सांस ली। उन्हें अपनी परवरिश पर गर्व हुआ। राधिका अब पहले से ज्यादा आत्मविश्वासी थी। उसने समझ लिया था कि घर ईंट-पत्थरों से नहीं बनता, रिश्तों के प्रेम और विश्वास से बनता है।

वर्षों बाद जब राधिका खुद सास बनी, तो उसने अपनी बहू को वही अपनापन दिया जो उसे मिला था। उसने हमेशा यही सिखाया कि ससुराल को अपनाने के लिए दिल बड़ा होना चाहिए। और जब दिल बड़ा हो, तो ससुराल सचमुच घर से बड़ा बन जाता है।

कहानी का सार यही है कि रिश्तों में अपनापन, सम्मान और विश्वास हो तो हर घर अपना बन जाता है। ससुराल पराया नहीं होता, बस उसे अपनाने की जरूरत होती है। जब दोनों तरफ से प्रेम हो, तो ससुराल सच में घर से भी बड़ा बन जाता है।

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