मेरठ की रैली से उठे राजनीतिक सवाल

 


मेरठ में नमो भारत के विस्तारित कॉरिडोर और मेट्रो सेवा के उद्घाटन के अवसर पर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी का भाषण केवल विकास परियोजनाओं तक सीमित नहीं रहा। युवा कांग्रेस कार्यकर्ताओं के अर्द्धनग्न प्रदर्शन को लेकर उन्होंने कांग्रेस पर तीखा और व्यक्तिगत हमला बोला। उनके शब्द असाधारण रूप से कठोर थे यहां तक कि उन्होंने कहा कि “पहले से ही नंगे हो, फिर कपड़े उतारने की जरूरत क्यों पड़ी?” यह बयान स्वाभाविक रूप से राजनीतिक बहस के केंद्र में आ गया है।

लोकतंत्र में विरोध का अधिकार मूलभूत है। राजनीतिक दलों और उनके कार्यकर्ताओं द्वारा प्रदर्शन करना असामान्य नहीं है। यदि किसी कार्यक्रम या नीति के विरोध में युवा कांग्रेस ने अर्द्धनग्न प्रदर्शन का रास्ता चुना, तो उस पर असहमति हो सकती है इसे अशोभनीय या मर्यादा के विरुद्ध कहा जा सकता है। लेकिन प्रश्न यह भी है कि क्या उसके जवाब में देश के प्रधानमंत्री द्वारा प्रयुक्त भाषा राजनीतिक संवाद की गरिमा के अनुरूप थी? प्रधानमंत्री का तर्क था कि एआई समिट या विकास परियोजनाएं किसी दल विशेष का कार्यक्रम नहीं, बल्कि देश का कार्यक्रम हैं। इस दृष्टिकोण से देखें तो राष्ट्रीय मंचों पर राजनीतिक विरोध का स्वरूप निश्चित ही संयमित होना चाहिए। जब अंतरराष्ट्रीय या राष्ट्रीय महत्व के आयोजन होते हैं, तब विपक्ष और सत्तापक्ष दोनों की जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि देश की छवि को प्राथमिकता दें।

मेरठ में जिस कार्यक्रम का आयोजन था, वह बुनियादी ढांचे के विस्तार से जुड़ा था नमो भारत कॉरिडोर और मेट्रो सेवा का शुभारंभ। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने प्रधानमंत्री को “नए और आधुनिक भारत का शिल्पी” बताया। विकास की इन परियोजनाओं का राजनीतिक महत्व भी कम नहीं है; चुनावी परिदृश्य में बुनियादी ढांचे का विस्तार सत्तापक्ष के लिए उपलब्धि का प्रतीक बनता है। किन्तु दुर्भाग्य यह रहा कि उद्घाटन की सकारात्मक खबर से अधिक चर्चा प्रधानमंत्री के तीखे हमलों की हो रही है। इससे यह संकेत मिलता है कि आज की राजनीति में विकास की उपलब्धियां भी अक्सर आरोप-प्रत्यारोप की भेंट चढ़ जाती हैं।

प्रधानमंत्री ने अपने भाषण में कहा कि कांग्रेस के सहयोगी दलों जैसे तृणमूल कांग्रेस, द्रविड़ मुनेत्र कषगम और बहुजन समाज पार्टी ने भी इस प्रदर्शन की आलोचना की। यदि यह तथ्यात्मक रूप से सही है, तो यह कांग्रेस के लिए एक राजनीतिक संकेत हो सकता है कि आक्रामक और प्रतीकात्मक विरोध की रणनीति सहयोगियों को असहज कर रही है।हालांकि, यह भी ध्यान रखना होगा कि विपक्षी राजनीति में मतभेद और विविधता स्वाभाविक हैं। किसी एक घटना पर आलोचना का अर्थ स्थायी दूरी नहीं होता। फिर भी, राष्ट्रीय मंचों पर विपक्ष की रणनीति पर पुनर्विचार की आवश्यकता अवश्य दिखाई देती है।

इस पूरे प्रकरण का सबसे गंभीर पहलू राजनीतिक भाषा का स्तर है। चाहे सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, जब संवाद व्यक्तिगत और अपमानजनक शब्दों तक पहुंच जाता है, तो लोकतंत्र की गुणवत्ता प्रभावित होती है। जनता विकास, रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा जैसे ठोस मुद्दों पर स्पष्ट बहस चाहती है। कटाक्ष और व्यंग्य राजनीतिक हथियार हो सकते हैं, परंतु जब वे गरिमा की सीमा लांघते हैं, तो लोकतांत्रिक संस्कृति कमजोर पड़ती है।

प्रधानमंत्री ने यह भी कहा कि “प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना है तो जनता का दिल जीतना होगा।” यह वाक्य अपने आप में लोकतंत्र का सार प्रस्तुत करता है। अंततः सत्ता का मार्ग जनादेश से ही होकर जाता है न कि प्रदर्शन की तीव्रता या भाषण की आक्रामकता से। मेरठ की रैली ने दो संदेश दिए हैं। पहला, विकास परियोजनाएं राजनीतिक विमर्श का महत्वपूर्ण आधार बनी रहेंगी। दूसरा, राजनीतिक टकराव की भाषा और शैली आने वाले समय में और तीखी हो सकती है। आवश्यक यह है कि विरोध और समर्थन दोनों की अभिव्यक्ति लोकतांत्रिक मर्यादा के भीतर हो। राष्ट्रीय मंचों पर असहमति व्यक्त करने का अधिकार सुरक्षित रहे, परंतु उसकी शैली देश की गरिमा के अनुरूप हो। साथ ही, सत्तापक्ष को भी यह स्मरण रखना होगा कि शब्दों की शक्ति केवल समर्थकों को उत्साहित नहीं करती, बल्कि लोकतांत्रिक संस्कारों को भी आकार देती है।

Post a Comment

Previous Post Next Post