आत्मनिर्भर भारत की निर्णायक छलांग

 

उत्तर प्रदेश के नोएडा–जेवर क्षेत्र में उत्तर भारत के पहले सेमीकंडक्टर संयंत्र का शिलान्यास केवल एक औद्योगिक परियोजना की शुरुआत नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी संप्रभुता की दिशा में निर्णायक कदम है। Narendra Modi द्वारा यमुना एक्सप्रेसवे औद्योगिक विकास प्राधिकरण (यीडा) के सेक्टर-28 में इस परियोजना की नींव रखना इस बात का संकेत है कि भारत अब वैश्विक चिप आपूर्ति श्रृंखला में केवल उपभोक्ता नहीं, बल्कि निर्माता की भूमिका निभाने को तैयार है।दुनिया ने पिछले कुछ वर्षों में सेमीकंडक्टर संकट का असर प्रत्यक्ष रूप से देखा है मोबाइल फोन से लेकर ऑटोमोबाइल उद्योग तक, उत्पादन बाधित हुआ। ऐसे समय में भारत का अपने सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम को सशक्त करना रणनीतिक आवश्यकता भी है और आर्थिक अवसर भी। प्रधानमंत्री का यह कहना कि “विकसित भारत की नींव आत्मनिर्भरता पर रखी जाएगी” केवल नारा नहीं, बल्कि नीति-निर्देशन है।

आज उत्तर प्रदेश देश में मोबाइल निर्माण का प्रमुख केंद्र बन चुका है। अब सेमीकंडक्टर संयंत्र के साथ यह राज्य उच्च तकनीक विनिर्माण की नई पहचान गढ़ने की ओर अग्रसर है। जेवर में विकसित हो रहा यह संयंत्र 3,706 करोड़ रुपये के निवेश के साथ 2028 तक उत्पादन शुरू करने का लक्ष्य रखता है। 20 हजार वेफर प्रतिमाह की क्षमता से मोबाइल, लैपटॉप और ऑटोमोबाइल क्षेत्र के लिए डिस्प्ले ड्राइवर चिप का निर्माण होगा। यह परियोजना केवल उत्पादन तक सीमित नहीं है; यह रोजगार, कौशल विकास और क्षेत्रीय औद्योगिक पारिस्थितिकी तंत्र को गति देगी। लगभग 3,500 प्रत्यक्ष रोजगार और उससे कई गुना अप्रत्यक्ष अवसर उत्पन्न होने की संभावना है।

एचसीएल और ताइवान की कंपनी Foxconn के संयुक्त उपक्रम द्वारा स्थापित यह इकाई वैश्विक तकनीकी अनुभव और भारतीय औद्योगिक क्षमता का संगम है। 60:40 की हिस्सेदारी मॉडल यह दर्शाता है कि भारत विदेशी निवेश का स्वागत करते हुए भी स्थानीय भागीदारी को प्राथमिकता दे रहा है। भारत ने भले सेमीकंडक्टर यात्रा देर से शुरू की हो, परंतु गति तीव्र है। चिप स्टार्टअप कार्यक्रम के तहत 85 हजार से अधिक ‘इंडस्ट्री रेडी’ प्रोफेशनल तैयार किए जा रहे हैं। ‘रेयर अर्थ कॉरिडोर’ की परिकल्पना और सेमीकंडक्टर नीति के माध्यम से सरकार दीर्घकालिक आपूर्ति शृंखला को सुरक्षित करने की दिशा में कार्य कर रही है।

नोएडा–जेवर क्षेत्र पहले से ही डेडिकेटेड फ्रेट कॉरिडोर और नोएडा अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे जैसी परियोजनाओं से सशक्त हो रहा है। इसके साथ ही दिल्ली–मेरठ नमो भारत परियोजना जैसी कनेक्टिविटी योजनाएं औद्योगिक निवेश को और आकर्षित करेंगी। जब आधारभूत संरचना, नीति समर्थन और वैश्विक साझेदारी एक साथ आती हैं, तो औद्योगिक क्रांति का मार्ग प्रशस्त होता है। हालांकि सेमीकंडक्टर निर्माण अत्यंत पूंजी-गहन और तकनीकी रूप से जटिल प्रक्रिया है। ऊर्जा आपूर्ति, जल संसाधन, उच्च प्रशिक्षित मानव संसाधन और वैश्विक प्रतिस्पर्धा जैसी चुनौतियां सामने होंगी। परियोजना की समयबद्धता और गुणवत्ता सुनिश्चित करना सरकार व उद्योग दोनों की साझा जिम्मेदारी होगी।

फिर भी, यदि यह संयंत्र नियोजित समय में उत्पादन शुरू कर देता है, तो यह भारत की जीडीपी में प्रतिवर्ष लगभग 45 हजार करोड़ रुपये का योगदान देने की क्षमता रखता है। इससे न केवल उत्तर प्रदेश, बल्कि पूरे उत्तर भारत के औद्योगिक मानचित्र में आमूलचूल परिवर्तन संभव है।

सेमीकंडक्टर संयंत्र का शिलान्यास आत्मनिर्भर भारत के विजन को ठोस आधार देने वाला कदम है। यह केवल एक फैक्ट्री नहीं, बल्कि भारत की तकनीकी आकांक्षाओं का प्रतीक है। यदि नीति, निवेश और नवाचार का यह संगम सतत बना रहता है, तो वह दिन दूर नहीं जब भारत वैश्विक चिप उद्योग में निर्णायक भूमिका निभाएगा और उत्तर प्रदेश सचमुच देश का टेक्नोलॉजी पावरहाउस कहलाएगा।

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