भींगे बदन से टपकते रंग...

 विनोद कुमार झा 

फाल्गुन की मस्ती जब हवाओं में घुलती है तो सिर्फ गुलाल ही नहीं उड़ता, मन के भीतर दबे भाव भी रंगों की तरह बाहर आ जाते हैं। गांव की कच्ची गलियों से लेकर शहर की पक्की सड़कों तक, हर ओर ढोल की थाप और हंसी की फुहारें सुनाई देती हैं। उसी रंग और उमंग के बीच जन्म लेती है यह कहानी जहाँ भींगे बदन से टपकते रंग सिर्फ पानी और गुलाल नहीं, बल्कि अनकहे प्रेम की बूंदें भी हैं।

नगर के पुराने मोहल्ले में इस बार होली कुछ खास थी। वर्षों बाद आरव अपने शहर लौटा था। महानगर की भागदौड़ में उलझा वह युवक जब अपने घर की छत पर खड़ा होकर नीचे रंगों में सराबोर लोगों को देख रहा था, तो उसकी नजर अचानक सामने वाली बालकनी पर ठहर गई। वहां खड़ी थी नंदिनी बचपन की साथी, अब एक संजीदा और आत्मविश्वासी युवती। दोनों की नजरें मिलीं, और वर्षों का फासला जैसे एक पल में सिमट गया।

होली का दिन था। मोहल्ले के चौक में रंगों का समंदर उमड़ पड़ा था। ढोलक की थाप पर बच्चे उछल रहे थे, महिलाएं फाग गा रही थीं, और बुजुर्ग मुस्कराकर इस उमंग को देख रहे थे। नंदिनी अपनी सहेलियों के साथ आई। सफेद सूती सलवार-कुर्ते पर पहला गुलाबी रंग किसी ने डाला, तो वह खिल उठी। तभी पीछे से किसी ने हल्के से उसके गाल पर रंग लगाया। वह पलटी आरव था।

“होली है…” उसने धीमे से कहा।

नंदिनी मुस्कराई, “इतने साल बाद याद आई होली?”

रंगों की शरारत के बीच संवादों की मिठास घुलने लगी। देखते ही देखते दोनों एक-दूसरे को रंगों से सराबोर कर चुके थे। पानी की बौछारों के बीच उनके कपड़े भीग गए, और भींगे बदन से टपकते रंग जैसे उनकी धड़कनों का हाल बयान कर रहे थे। लेकिन यह कोई उच्छृंखल दृश्य नहीं था; यह दो परिपक्व दिलों का मिलन था, जिसमें संकोच भी था और अपनापन भी।

गांव की औरतें फाग गा रही थीं “रंग बरसे भीगे चुनर वाली…” और उसी धुन में जैसे नंदिनी की चुनरी भी रंगों से भर उठी। आरव ने पहली बार उसे इतने करीब से देखा। उसकी आंखों में कोई बनावटीपन नहीं था, सिर्फ सहज अपनापन था। रंगों की परतों के पीछे छिपा वह सच्चा चेहरा, जिसे वह बचपन से जानता था, आज उसे नए अर्थ दे रहा था।

दोपहर ढलने लगी। लोग थककर अपने-अपने घर लौटने लगे। नंदिनी छत पर आई तो आरव पहले से वहां मौजूद था। हवा में अबीर की हल्की खुशबू तैर रही थी। दोनों कुछ देर चुप रहे। चुप्पी में भी एक संवाद था

“शहर वापस जाओगे?” नंदिनी ने पूछा। “अगर यहां रुकने की वजह मिल जाए तो शायद नहीं,” आरव ने उत्तर दिया।

नंदिनी ने नजरें झुका लीं। उसके भीगे बालों से टपकती रंगीन बूंदें छत की मुंडेर पर गिर रही थीं। वे बूंदें जैसे उनके बीच की दूरी को पाट रही थीं। आरव ने धीरे से कहा, “क्या हम फिर से शुरुआत कर सकते हैं? इस बार सिर्फ दोस्त नहीं…”

नंदिनी ने मुस्कराकर उसकी ओर देखा। “होली है, आरव। आज तो हर पुरानी शिकायत को धो देना चाहिए।” उस दिन रंग सिर्फ तन पर नहीं, मन पर भी चढ़े। भींगे बदन से टपकते रंग शाम तक सूख गए, पर जो रंग दिलों में चढ़ा, वह स्थायी हो गया। होली की वह दोपहर उनके जीवन का मोड़ बन गई।

कुछ महीनों बाद उसी मोहल्ले में फिर उत्सव था इस बार रंगों का नहीं, रिश्तों का। आरव ने शहर की नौकरी छोड़कर अपने नगर में काम शुरू किया। नंदिनी ने अपने सपनों को उसके साथ जोड़ लिया। दोनों ने मिलकर एक नई शुरुआत की।

होली हर साल आती है, रंग हर बार उड़ते हैं, पर कुछ रंग ऐसे होते हैं जो जीवन की दिशा बदल देते हैं। भींगे बदन से टपकते रंग कभी-कभी प्रेम की वह स्याही बन जाते हैं, जिससे जिंदगी की सबसे सुंदर कहानी लिखी जाती है। और उस साल की होली, नगर के इतिहास में सिर्फ एक त्योहार नहीं, दो दिलों के मिलन की साक्षी बन गई।

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