रविदास जयंती विशेष : समता, करुणा और मानवीय गरिमा का पुनर्पाठ

विनोद कुमार झा

हर वर्ष माघ पूर्णिमा को मनाई जाने वाली संत शिरोमणि गुरु रविदास जयंती केवल एक धार्मिक या सांस्कृतिक उत्सव नहीं, बल्कि भारतीय लोकतांत्रिक चेतना के मूल्यों समता, बंधुत्व और मानवीय गरिमा—का स्मरण है। ऐसे समय में जब समाज अनेक स्तरों पर असहिष्णुता, भेदभाव और वैचारिक संकीर्णता से जूझ रहा है, संत रविदास की वाणी और दर्शन हमें आत्ममंथन का अवसर देते हैं।

संत रविदास 15वीं शताब्दी के महान समाज सुधारक, कवि और संत थे। उनका जन्म ऐसे समय में हुआ जब समाज जाति, छुआछूत और ऊँच-नीच की कठोर जकड़न में बंधा था। स्वयं जीवन भर सामाजिक भेदभाव का सामना करने के बावजूद उन्होंने कभी कटुता या विद्रोह का मार्ग नहीं अपनाया, बल्कि प्रेम, करुणा और समानता को ही सामाजिक परिवर्तन का माध्यम बनाया। उनकी वाणी में न आक्रोश था, न द्वेष—बल्कि मानव मात्र के लिए सम्मान और अपनत्व था।

गुरु रविदास का दर्शन कर्मकांड से अधिक मानवीय आचरण पर केंद्रित था। उनका प्रसिद्ध विचार

“मन चंगा तो कठौती में गंगा” आज भी यह सिखाता है कि पवित्रता किसी स्थान या जाति से नहीं, बल्कि मन की निर्मलता से आती है। उन्होंने उस दौर में यह साहसिक घोषणा की कि ईश्वर तक पहुँचने का कोई एकाधिकार नहीं है; हर मनुष्य, चाहे वह किसी भी वर्ग या जाति का हो, समान रूप से आध्यात्मिक गरिमा का अधिकारी है।

रविदास जी का कल्पित ‘बेगमपुरा’—एक ऐसा समाज जहाँ कोई दुखी नहीं, कोई भूखा नहीं, कोई कर के बोझ या सामाजिक भय से ग्रस्त नहीं—असल में एक न्यायपूर्ण और समतामूलक राष्ट्र की परिकल्पना है। यह अवधारणा आज के भारत के लिए विशेष रूप से प्रासंगिक है, जहाँ संवैधानिक रूप से समानता का अधिकार तो है, लेकिन सामाजिक यथार्थ में इसकी पूर्ण प्राप्ति अब भी एक चुनौती बनी हुई है।

यह उल्लेखनीय है कि संत रविदास की वाणी गुरु ग्रंथ साहिब में भी सम्मिलित है, जो उनकी सार्वकालिक और सर्वधार्मिक स्वीकार्यता को रेखांकित करती है। उनकी शिक्षाएँ केवल किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं रहीं, बल्कि उन्होंने उत्तर भारत ही नहीं, सम्पूर्ण भारतीय उपमहाद्वीप की सामाजिक चेतना को प्रभावित किया।

आज जब हम रविदास जयंती मना रहे हैं, तो प्रश्न केवल माल्यार्पण या औपचारिक आयोजनों तक सीमित नहीं होना चाहिए। वास्तविक श्रद्धांजलि तब होगी जब हम उनके विचारों को नीति, शिक्षा और सामाजिक व्यवहार में स्थान दें। जाति आधारित भेदभाव, सामाजिक बहिष्कार और अवसरों की असमानता के विरुद्ध संघर्ष में संत रविदास का दर्शन हमें नैतिक बल प्रदान करता है।

राष्ट्रीय परिप्रेक्ष्य में रविदास जयंती यह याद दिलाती है कि भारत की आत्मा विविधता में एकता और समानता में निहित है। संविधान में निहित समानता, स्वतंत्रता और बंधुत्व के मूल्य संत रविदास की वाणी में सदियों पहले ही अभिव्यक्त हो चुके थे। आज आवश्यकता है कि हम इन मूल्यों को केवल स्मरण न करें, बल्कि अपने सामाजिक और राजनीतिक आचरण में उतारें।

अंततः संत रविदास केवल अतीत के संत नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य के पथप्रदर्शक हैं। उनकी जयंती हमें यह संकल्प लेने का अवसर देती है कि हम एक ऐसे भारत की दिशा में आगे बढ़ें, जहाँ मनुष्य की पहचान उसकी जाति से नहीं, उसके कर्म, विचार और मानवीय संवेदना से हो। यही संत रविदास को सच्ची श्रद्धांजलि होगी।

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