गणेश चतुर्थी विशेष : भाद्रपद मास का विघ्नहर्ता महोत्सव और इसकी पौराणिक कथा

लेखक विनोद कुमार झा

हिंदू धर्म में गणेशजी को विघ्नहर्ता और मंगलकर्ता माना जाता है। वे न केवल बाधाओं को दूर करते हैं, बल्कि बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि के भी अधिष्ठाता देवता हैं। भाद्रपद मास की शुक्ल पक्ष की चतुर्थी को मनाया जाने वाला गणेश चतुर्थी का पर्व भारत के प्रमुख धार्मिक और सांस्कृतिक पर्वों में से एक है। इसे विघ्नहर्ता के जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है। इस दिन श्रद्धालु भगवान गणेश की पूजा-अर्चना करते हैं, घरों में प्रतिमा स्थापित करते हैं और दस दिनों तक यह उत्सव चलता है। गणेशजी को बुद्धि, ज्ञान और समृद्धि का देवता माना जाता है। इस लेख में हम न केवल गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा को विस्तार से समझेंगे, बल्कि इसके ऐतिहासिक, धार्मिक और सामाजिक महत्व को भी जानेंगे।

गणेश चतुर्थी की पौराणिक कथा : गणेशजी के जन्म से जुड़ी कई कथाएँ पौराणिक ग्रंथों में मिलती हैं। मुख्य कथा के अनुसार, यह प्रसंग कैलाश पर्वत का है। माता पार्वती रोजाना स्नान के लिए जाया करती थीं। एक दिन उन्होंने स्नान करने से पहले अपने शरीर के उबटन (लेप) को इकट्ठा कर उससे एक सुंदर बालक की प्रतिमा बनाई। फिर उसमें प्राण प्रतिष्ठित करके उसे जीवित कर दिया। यही बालक गणेश कहलाया।

पार्वती ने गणेश को आदेश दिया कि जब तक मैं स्नान कर रही हूँ, कोई भी अंदर न आए। उसी समय भगवान शिव आए और भीतर जाने लगे। गणेश ने माता का आदेश मानते हुए उन्हें रोक दिया। शिव ने कहा "मैं तुम्हारा पिता हूँ, मुझे मत रोक।" लेकिन गणेश अपनी माँ के आदेश पर अडिग रहे। इस पर शिव को क्रोध आ गया।

शिव ने अपने गणों को आदेश दिया कि इस बालक को रास्ते से हटाओ। गणों ने कई बार प्रयास किया, परंतु गणेश ने उन्हें हराया। वे अद्भुत पराक्रमी बालक थे। यह देखकर शिव स्वयं युद्ध के लिए उतरे। भयंकर युद्ध हुआ और अंततः शिव ने अपने त्रिशूल से गणेश का मस्तक काट डाला।

जब माता पार्वती बाहर आईं और गणेश को मृत देखा तो वे क्रोधित हो उठीं। उन्होंने महाकाली का रूप धारण कर लिया और समस्त जगत को विनाश की धमकी दी। ब्रह्मा, विष्णु और देवता शिव के पास पहुँचे और कहा—"त्रैलोक्य विनाश की स्थिति है, माता को शांत कीजिए।"

तब शिव ने पार्वती से कहा कि वे गणेश को पुनर्जीवित करेंगे। उन्होंने अपने गणों से कहा कि उत्तर दिशा की ओर जाकर किसी जीव का मस्तक लाओ, जो सोया हो और जिसकी माँ उसकी ओर पीठ किए हो। वे एक हाथी का मस्तक लेकर आए। शिव ने उसे गणेश के धड़ पर जोड़ दिया और प्राण फूँक दिए।

इसके बाद देवताओं ने गणेश को वरदान दिए, वे प्रथम पूज्य होंगे। किसी भी शुभ कार्य की शुरुआत उनके नाम से होगी।वे विघ्नहर्ता और बुद्धि के देवता होंगे। यही कारण है कि गणेश चतुर्थी का दिन उनके जन्मोत्सव के रूप में मनाया जाता है।

एक अन्य पौराणिक कथाएँ : कई ग्रंथों में उल्लेख है कि गणेशजी का जन्म पार्वती और शिव की तपस्या के फलस्वरूप हुआ। एक अन्य कथा के अनुसार, गणेशजी ने चतुर्थी तिथि को चंद्रमा को शाप दिया था क्योंकि उसने उनका उपहास किया था। इसीलिए चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन वर्जित माना जाता है।

गणेश और चंद्रमा का शाप : कहते हैं, एक बार गणेशजी ने मोदक का भोग लगाया और रात्रि में अपने वाहन मूषक पर सवार होकर लौट रहे थे। तभी उनका वाहन ठोकर खाकर गिरा और गणेशजी भी गिर पड़े। चंद्रमा ने यह दृश्य देखकर हँसी उड़ाई। गणेशजी ने क्रोधित होकर उसे शाप दिया कि जो भी तुम्हें देखेगा, उसे कलंक लगेगा। बाद में देवताओं के निवेदन पर उन्होंने शाप को आंशिक किया और कहा कि केवल गणेश चतुर्थी की रात को चंद्र दर्शन करने वाले को दोष लगेगा।

गणेश चतुर्थी का धार्मिक महत्व : गणेशजी को प्रथम पूज्य माना जाता है। किसी भी शुभ कार्य, विवाह, गृह प्रवेश, यात्रा या धार्मिक अनुष्ठान से पहले गणेशजी की पूजा अनिवार्य है। उन्हें विघ्नहर्ता कहा जाता है क्योंकि वे सभी बाधाओं को दूर करते हैं।

गणेश के 108 नाम : गणेशजी के 108 नाम हैं, जिनमें प्रमुख हैं—विनायक, गणपति, गजानन, लम्बोदर, सिद्धिविनायक, वक्रतुंड, एकदंत, मंगलमूर्ति।

पूजा विधि और व्रत का महत्व : गणेश चतुर्थी के दिन लोग प्रातः स्नान करके गणेशजी की स्थापना करते हैं। पूजन विधि में कलश स्थापना, पंचामृत स्नान, दूर्वा, मोदक, सिंदूर और लड्डू का भोग लगाया जाता है। गणेशजी को लाल फूल प्रिय हैं।

व्रत नियम: चतुर्थी तिथि पर उपवास रखा जाता है। गणेशजी को 21 दूर्वा, 21 मोदक का भोग लगाना शुभ माना जाता है।चंद्र दर्शन न करने का नियम है।

उत्सव का स्वरूप और क्षेत्रीय महत्व :गणेश चतुर्थी का उत्सव दस दिनों तक चलता है। पहले दिन प्रतिमा स्थापना होती है और दसवें दिन अनंत चतुर्दशी को गणेश विसर्जन किया जाता है।

महाराष्ट्र – मुंबई का लालबागचा राजा, सिद्धिविनायक मंदिर विश्व प्रसिद्ध है।

कर्नाटक – गणेश हब्बा के नाम से बड़े उत्साह से मनाया जाता है।

गोवा – यहाँ पर्यावरण-अनुकूल गणेश प्रतिमाएँ बनाई जाती हैं।

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना – हैदराबाद में विशाल गणेश प्रतिमाएँ स्थापित की जाती हैं।

उत्तर भारत – दिल्ली, यूपी, बिहार में घरों में गणपति स्थापना होती है।

इतिहास और सांस्कृतिक पहलू : लोकमान्य बाल गंगाधर तिलक ने स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान सार्वजनिक गणेश उत्सव की परंपरा शुरू की। इसका उद्देश्य ब्रिटिश शासन के विरुद्ध जनता को एकजुट करना था।

आज के समय में गणेश चतुर्थी का महत्व : आज यह पर्व न केवल धार्मिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक उत्सव बन गया है। इसमें कला, शिल्प, संगीत, नाटक, लोककला का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

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