विनोद कुमार झा
भारत की भक्ति परंपरा में जन्माष्टमी केवल भगवान श्रीकृष्ण के जन्मोत्सव का पर्व नहीं, बल्कि यह उनकी अनंत लीला, प्रेम और भक्ति के अनगिनत रंगों को याद करने का अवसर भी है। इन्हीं रंगों में एक सबसे अनूठा रंग है #मीरा का कृष्ण प्रेम#। संत कवयित्री मीरा बाई, जिन्होंने सांसारिक बंधनों को त्यागकर अपने जीवन को श्रीकृष्ण की भक्ति में समर्पित कर दिया, आज भी भक्तों के हृदय में भक्ति और प्रेम की जीवंत मिसाल के रूप में विराजमान हैं।
राजस्थान के मेड़ता में 16वीं शताब्दी में जन्मी मीरा बाई बचपन से ही कृष्ण के प्रति अनन्य आकर्षण रखती थीं। कहते हैं कि जब मीरा लगभग 4-5 वर्ष की थीं, तो उन्होंने एक बार अपनी मां से पूछा “मेरा दूल्हा कौन होगा?” इस पर उनकी मां ने हंसकर श्रीकृष्ण की मूर्ति की ओर इशारा करते हुए कहा , “ये तुम्हारे दूल्हे हैं।”
उस बाल-मन में यह उत्तर गहराई से उतर गया और मीरा ने कृष्ण को अपना जीवनसाथी, अपना सर्वस्व मान लिया। बचपन में ही वे अपने खिलौनों और खेलों में भी कृष्ण को शामिल करतीं, उनके संग बात करतीं और नृत्य करतीं।
यद्यपि मीरा का विवाह मेवाड़ के राजा भोजराज से हुआ, लेकिन उनका मन महलों के वैभव में कभी रमा नहीं। वे राजदरबार की मर्यादाओं से अधिक संतों और भजन-कीर्तन के वातावरण में आनंद पाती थीं।
मीरा ने हर परिस्थिति में यह स्पष्ट कर दिया कि उनकी आत्मा का रिश्ता केवल कृष्ण से है। उनका प्रसिद्ध पद –
“मेरे तो गिरिधर गोपाल, दूसरा न कोई”
उनके इस अडिग संकल्प का उद्घोष था।
मीरा की कृष्ण भक्ति सहज नहीं थी। दरबार में उनकी भक्ति को लेकर विरोध हुआ, षड्यंत्र रचे गए, यहां तक कि उन्हें विष का प्याला भी दिया गया। किंतु कथा है कि जब उन्होंने वह प्याला कृष्ण का नाम लेकर पिया, तो वह अमृत में बदल गया।
इन कठिनाइयों के बावजूद, मीरा का विश्वास कभी नहीं डगमगाया। उनके लिए प्रेम का अर्थ था अपने प्रिय के चरणों में पूर्ण आत्मसमर्पण, चाहे दुनिया कुछ भी कहे।
मीरा बाई ने भक्ति को केवल पूजा या अनुष्ठान तक सीमित नहीं रखा, बल्कि उसे जीवन की धड़कन बना दिया। उनके पदों और भजनों में प्रेम की वह गहराई है जो सांसारिक प्रेम से कहीं ऊपर है – यह विरह और मिलन, दोनों की अनुभूति कराता है।
उनके गीतों में कभी कृष्ण को श्याम-सुंदर के रूप में पुकारने का मधुर आग्रह है, तो कभी बांसुरी की तान पर मन का बेसुध हो जाना।
मीरा के जीवन ने यह सिद्ध किया कि जब प्रेम शुद्ध और निस्वार्थ होता है, तो वह भक्ति का रूप ले लेता है और भक्ति ही मोक्ष का मार्ग बन जाती है। मीरा का कृष्ण के प्रति प्रेम सांसारिक अपेक्षाओं से परे, केवल आत्मा और परमात्मा का मिलन था।
जन्माष्टमी के पावन अवसर पर, जब मंदिरों में श्रीकृष्ण की झांकी सजती है और रात्रि के बारह बजे नंद के लाल का जन्म होता है, तो मीरा का यह स्वर गूंज उठता है –
“पायो जी मैंने राम रतन धन पायो” यह उस अमूल्य आध्यात्मिक खजाने की घोषणा है जो केवल भक्ति में समर्पण से प्राप्त होता है।
जन्माष्टमी हमें केवल कृष्ण की बाल-लीलाओं और पराक्रम की याद नहीं दिलाती, बल्कि यह भी सिखाती है कि सच्चा प्रेम कैसा होता है – निस्वार्थ, अटल और शुद्ध। मीरा बाई का जीवन इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने दिखाया कि जब हृदय में ईश्वर के प्रति प्रेम का दीपक जलता है, तो वह हर अंधकार को मिटा देता है।
आज भी मीरा की भक्ति हमें यह प्रेरणा देती है कि हम अपने जीवन में प्रेम और समर्पण के उस पवित्र भाव को जगह दें, जो हमें आध्यात्मिक पूर्णता की ओर ले जाए।
