लेखक: विनोद कुमार झा
जीवन बाहर से जितना सरल दिखाई देता है, भीतर से उतना ही उलझा हुआ होता है। इंसान अक्सर मजबूत बनने की कोशिश में उन भावनाओं को अपने भीतर जगह देता जाता है, जो धीरे-धीरे उसकी स्वतंत्रता को ही बांधने लगती हैं। किसी का स्नेह, किसी का अपनापन, किसी की उम्मीद और किसी की भावनात्मक जरूरत शुरुआत में बहुत कोमल लगती है, लेकिन समय के साथ वही कोमलता ऐसी जकड़न में बदल जाती है, जिससे निकलना आसान नहीं रहता। यही वह स्थिति है जब व्यक्ति अपने ही बनाए रिश्तों, अपेक्षाओं और भावनाओं के बीच रास्ता तलाशता रह जाता है। उसे लगता है कि वह अपने जीवन का संचालन स्वयं कर रहा है, जबकि वास्तविकता यह होती है कि उसके निर्णय कहीं न कहीं किसी और की खुशी, नाराजगी, स्वीकृति या अस्वीकृति से संचालित होने लगे हैं।
कोमलता जीवन की सुंदरता है, लेकिन जब कोमलता अधिकार में बदल जाती है तो वही सुंदरता बोझ बनने लगती है। रिश्तों में प्रेम होना जरूरी है, मगर प्रेम और अधिकार के बीच की महीन रेखा को समझना उससे भी अधिक जरूरी है। जहां प्रेम व्यक्ति को उड़ने का साहस देता है, वहीं अधिकार उसे अपने घेरे में कैद करने लगता है। कई बार परिवार, समाज, दोस्ती या प्रेम के नाम पर हम एक-दूसरे के जीवन में इतनी गहरी दखलंदाजी करने लगते हैं कि सामने वाले की अपनी इच्छाएं, उसकी प्राथमिकताएं और उसका व्यक्तित्व धीरे-धीरे दबने लगता है। वह विरोध करना चाहता है, लेकिन संबंध टूटने के डर से चुप रहता है। वह अपनी बात कहना चाहता है, मगर किसी की भावनाओं को ठेस पहुंचने के भय से अपनी आवाज भीतर ही दबा लेता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि भावनात्मक जकड़न हमेशा कठोर शब्दों या हिंसक व्यवहार से पैदा नहीं होती। कई बार मीठी बातें, चिंता, अत्यधिक अपनापन और जरूरत से ज्यादा संरक्षण भी व्यक्ति को बांधने लगते हैं। कोई हर कदम पर यह पूछे कि कहां जा रहे हो, किससे मिल रहे हो, क्या कर रहे हो, किससे बात कर रहे हो तो शुरुआत में यह चिंता लग सकती है, लेकिन जब यही व्यवहार व्यक्ति की स्वतंत्रता पर पहरा बन जाए तो रिश्ते की प्रकृति बदल जाती है। प्रेम में विश्वास की जगह संदेह ले लेता है और संवाद की जगह नियंत्रण। तब रिश्ते बाहर से जितने मजबूत दिखाई देते हैं, भीतर से उतने ही खोखले होने लगते हैं।
हमारे समाज में भावनात्मक दबाव का एक बड़ा कारण यह भी है कि हमने त्याग को प्रेम और चुप्पी को संस्कार मान लिया है। बचपन से ही बहुत से लोगों को यह सिखाया जाता है कि परिवार की खुशी के लिए अपनी इच्छाओं को पीछे कर देना ही महानता है। निस्संदेह परिवार के लिए त्याग जीवन का महत्वपूर्ण हिस्सा है, लेकिन हर त्याग यदि एकतरफा हो जाए तो वह रिश्ते को संतुलित नहीं रहने देता। जब एक व्यक्ति लगातार देता रहे और दूसरा लगातार अपेक्षा करता रहे, तब संबंध धीरे-धीरे साझेदारी से निर्भरता में बदल जाता है। ऐसी निर्भरता में व्यक्ति अपने निर्णयों को लेकर अपराधबोध महसूस करने लगता है। उसे लगता है कि अपने लिए सोचना स्वार्थ है और दूसरों की इच्छाओं के अनुसार जीना ही उसका कर्तव्य।
जीवन की सबसे कठिन लड़ाई अक्सर बाहर की दुनिया से नहीं, बल्कि भीतर की उस आवाज से होती है जो बार-बार पूछती है क्या मैं सचमुच वही जीवन जी रहा हूं जिसे मैं जीना चाहता हूं? यह प्रश्न सरल नहीं है। वर्षों से चले आ रहे रिश्ते, जिम्मेदारियां, सामाजिक अपेक्षाएं और भावनात्मक जुड़ाव व्यक्ति को कई बार अपनी वास्तविक इच्छाओं से दूर कर देते हैं। वह दूसरों की नजर में सफल दिखाई देता है, लेकिन अकेले में खुद से नजरें नहीं मिला पाता। उसके पास घर होता है, परिवार होता है, परिचितों की लंबी सूची होती है, मगर उसके भीतर कहीं एक खाली कमरा बना रहता है, जहां उसकी अपनी इच्छाएं चुपचाप बैठी रहती हैं।
कोमल की जकड़न केवल किसी व्यक्ति विशेष की कहानी नहीं, बल्कि उस पूरे समाज का आईना है जहां संबंधों को बचाने के नाम पर व्यक्तित्व को कुचल देने की प्रवृत्ति अब भी दिखाई देती है। यहां किसी मां की ममता कभी-कभी बच्चे के फैसलों पर अधिकार बन जाती है, पिता की चिंता उसकी स्वतंत्रता पर पहरा बन जाती है, जीवनसाथी का प्रेम संदेह में बदल जाता है और मित्रता अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाती है। हर रिश्ता अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन कोई भी रिश्ता इतना बड़ा नहीं होना चाहिए कि उसमें जुड़े व्यक्ति की पहचान ही समाप्त हो जाए।
रिश्ते तभी सुंदर होते हैं जब उनमें सांस लेने की जगह हो। प्रेम यदि पंख देता है तो वह प्रेम है, और यदि पंख काटता है तो वह केवल लगाव या अधिकार है। किसी को अपने साथ रखना और किसी को अपने नियंत्रण में रखना इन दोनों में बहुत बड़ा अंतर है। साथ वही रिश्ता दे सकता है जिसमें दोनों व्यक्ति एक-दूसरे के अस्तित्व का सम्मान करें। जहां असहमति के लिए जगह हो, वहां संवाद पैदा होता है और जहां संवाद होता है, वहां रिश्ते जीवित रहते हैं। लेकिन जहां केवल आदेश हो, वहां धीरे-धीरे दूरी पैदा होती है, चाहे लोग एक ही छत के नीचे क्यों न रहते हों।
आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में मानसिक थकान का एक कारण यह भी है कि इंसान हर किसी को खुश रखने की कोशिश में खुद को भूलता जा रहा है। वह परिवार को खुश रखना चाहता है, समाज को संतुष्ट रखना चाहता है, मित्रों की अपेक्षाएं पूरी करना चाहता है और अपने संबंधों को बनाए रखना चाहता है। इस कोशिश में वह अपने भीतर जमा होती बेचैनी को नजरअंदाज करता रहता है। मगर दबाई गई भावनाएं हमेशा दबकर नहीं रहतीं। कभी वे चिड़चिड़ेपन के रूप में बाहर आती हैं, कभी मौन बन जाती हैं, कभी रिश्तों से दूरी पैदा करती हैं और कभी व्यक्ति को भीतर से इतना थका देती हैं कि उसे अपने ही जीवन से शिकायत होने लगती है।
जरूरत इस बात की है कि हम प्रेम को बंधन नहीं, भरोसा बनाएं। अपने प्रियजनों की चिंता करें, लेकिन उनके निर्णय लेने के अधिकार का सम्मान भी करें। किसी की जिंदगी में सलाह दें, लेकिन उसका रास्ता तय करने का अधिकार अपने हाथ में न लें। बच्चों को संस्कार दें, लेकिन उनके सपनों को अपनी अधूरी इच्छाओं का माध्यम न बनाएं। जीवनसाथी से प्रेम करें, लेकिन उसके व्यक्तिगत अस्तित्व और निजता को भी स्वीकार करें। मित्रता निभाएं, मगर मित्र के हर निर्णय पर अपना अधिकार समझना बंद करें।
किसी भी रिश्ते की वास्तविक परीक्षा उसके अच्छे दिनों में नहीं, बल्कि तब होती है जब सामने वाला हमारी इच्छा के विपरीत निर्णय लेता है। यदि तब भी हम उसके साथ खड़े रह सकते हैं, उसकी असहमति का सम्मान कर सकते हैं और उसे अपनी तरह जीने की स्वतंत्रता दे सकते हैं, तभी हमारा प्रेम सच्चा है। वरना कई बार जिसे हम प्रेम कहते हैं, वह वास्तव में खो देने का डर होता है। और यही डर धीरे-धीरे अधिकार में बदलकर उस रिश्ते को ही कमजोर कर देता है जिसे हम बचाना चाहते थे।
जीवन किसी एक व्यक्ति, किसी एक संबंध या किसी एक अपेक्षा का नाम नहीं है। जीवन अनेक रिश्तों, अनुभवों, संघर्षों और सपनों का संगम है। इसलिए किसी एक संबंध की कोमल जकड़न में अपने पूरे जीवन को उलझा देना उचित नहीं। रिश्ते हमारे जीवन का हिस्सा हैं, पूरा जीवन नहीं। हमें अपनों के साथ चलना है, लेकिन अपनी राह भी पहचाननी है। हमें प्रेम करना है, लेकिन स्वयं से प्रेम करना भी सीखना है। हमें दूसरों की भावनाओं का सम्मान करना है, लेकिन अपनी भावनाओं को भी महत्व देना है।
शायद जीवन की सबसे बड़ी समझ यही है कि किसी को बांधकर रखा नहीं जा सकता। जिसे साथ रहना है, वह विश्वास से रहेगा; जिसे जाना है, वह बंधन के बावजूद चला जाएगा। इसलिए रिश्तों में दीवारें खड़ी करने के बजाय खिड़कियां खोलनी चाहिए। प्रेम को इतना कोमल रहने दें कि उसमें अपनापन बना रहे और इतना स्वतंत्र भी रहने दें कि उसमें घुटन पैदा न हो। क्योंकि जब कोमलता जकड़न बन जाती है तो रिश्ते बच भी जाएं, जीवन कहीं न कहीं हार जाता है। और जब प्रेम स्वतंत्रता का हाथ थाम लेता है, तब वही जीवन अपनी पूरी खूबसूरती के साथ खिल उठता है।
( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
