किसे सुनाऊं स्वागत गीत...

 विनोद कुमार झा 

किसे सुनाऊं स्वागत गीत, जब सुनने को कोई तैयार ही नहीं है। शब्द हमारे पास हैं, भावनाएं हमारे भीतर हैं, उम्मीदें जनता के मन में हैं, लेकिन सत्ता और व्यवस्था के गलियारों में सुनने की इच्छा जैसे धीरे-धीरे कम होती जा रही है। वहां सुनने से अधिक बोलने की होड़ दिखाई देती है। जो आवाजें प्रशंसा में उठती हैं, वे आसानी से सुनी जाती हैं, लेकिन जो आवाजें सवाल पूछती हैं, समस्याओं की ओर ध्यान दिलाती हैं और व्यवस्था को आईना दिखाती हैं, वे अक्सर शोर समझ ली जाती हैं। लोकतंत्र की खूबसूरती इसी में है कि उसमें केवल स्वागत गीत नहीं, बल्कि असहमति की आवाज भी सुनी जाए। मगर जब कानों को केवल 'हां में हां' मिलाने वाली आवाजों की आदत पड़ जाए तो सच बोलने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अकेला पड़ जाता है।

आज की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि जनता की वास्तविक समस्याओं और उपलब्धियों के बीच एक ऐसा पर्दा खड़ा होता जा रहा है, जिसे प्रचार की भाषा लगातार मोटा कर रही है। आसपास ऐसे लोगों की एक पूरी कतार दिखाई देती है, जो हर निर्णय में अच्छाई तलाश लेते हैं, हर घोषणा पर तालियां बजाते हैं और हर सवाल का उत्तर उपलब्धियों की लंबी सूची से देने लगते हैं। उन्हें व्यवस्था की कमियां दिखाई नहीं देतीं या शायद दिखाई देती भी हों तो उन्हें सामने रखने का साहस नहीं होता। उनका काम सवाल पूछना नहीं, बल्कि हर बात पर सहमति जताना बन जाता है। यही वह स्थिति है जहां 'हां में हां' मिलाने वाली संस्कृति जन्म लेती है और धीरे-धीरे वास्तविक जनआवाज पीछे छूटने लगती है।

किसी भी नेतृत्व या व्यवस्था की सबसे बड़ी परीक्षा यह नहीं है कि उसके आसपास कितने लोग उसकी प्रशंसा करते हैं। असली परीक्षा यह है कि उसके सामने कितने लोग बिना भय और संकोच के अपनी बात रख सकते हैं। जो व्यक्ति अपनी आलोचना सुन सकता है, वही अपनी कमियों को पहचान सकता है। जो केवल प्रशंसा सुनना चाहता है, वह धीरे-धीरे वास्तविकता से दूर होता चला जाता है। चमचों की टोली किसी भी व्यवस्था को सुखद अहसास जरूर दे सकती है, लेकिन वह जमीन की सच्चाई नहीं बता सकती। जनता की नब्ज उन गलियों, बाजारों, खेतों, बस्तियों और उन परिवारों में मिलती है, जिनके लिए योजनाएं बनाई जाती हैं और जिनके नाम पर उपलब्धियों के आंकड़े गिनाए जाते हैं।

हमारे सामने अक्सर पुरखों की गाथाएं रखी जाती हैं। बताया जाता है कि पहले क्या हुआ, किसने क्या किया, किस दौर में कौन-सी उपलब्धि हासिल हुई और किस विरासत को आगे बढ़ाया जा रहा है। इतिहास और पुरखों का सम्मान आवश्यक है, क्योंकि समाज अपनी जड़ों से ही शक्ति प्राप्त करता है। लेकिन सवाल यह है कि क्या केवल अतीत की उपलब्धियों का स्मरण वर्तमान की जिम्मेदारियों से मुक्त कर सकता है? पुरखों ने क्या किया, यह जानना जरूरी है, लेकिन आज हमने क्या किया और आने वाली पीढ़ी के लिए क्या छोड़ रहे हैं, यह उससे भी बड़ा सवाल है। इतिहास की रोशनी वर्तमान की कमियों को ढकने के लिए नहीं, बल्कि भविष्य का रास्ता दिखाने के लिए होनी चाहिए।

नई परियोजनाओं की घोषणा भी विकास की यात्रा का महत्वपूर्ण हिस्सा है। कागज पर बनी योजना जब जमीन पर उतरती है, तब उसका वास्तविक अर्थ सामने आता है। लेकिन समस्या तब पैदा होती है जब परियोजना कागजों में ही पूरी हो जाती है और उसके उद्घाटन, शिलान्यास, घोषणा और प्रचार के माध्यम से उसकी सफलता का उत्सव मनाया जाने लगता है। किसी योजना का मूल्य उसके दस्तावेज में नहीं, बल्कि उसके परिणाम में होता है। जनता को यह जानने का अधिकार है कि योजना कब शुरू हुई, कितना धन स्वीकृत हुआ, कितना खर्च हुआ, काम कितनी दूर पहुंचा और उसका लाभ वास्तव में कितने लोगों तक पहुंचा। आंकड़े महत्वपूर्ण हैं, लेकिन आंकड़ों के पीछे छिपी मानवीय कहानी उससे भी अधिक महत्वपूर्ण है।

कार्यशैली और कार्यकाल की गुणवत्ता का मूल्यांकन भी केवल उपलब्धियों के दावों से नहीं किया जा सकता। किसी भी कार्यकाल का मूल्यांकन उसके निर्णयों, उनके क्रियान्वयन, पारदर्शिता, जवाबदेही और जनता पर पड़े वास्तविक प्रभाव से होना चाहिए। सड़क बनी तो उसकी गुणवत्ता कैसी है? अस्पताल बना तो उसमें चिकित्सक और दवाएं उपलब्ध हैं या नहीं? विद्यालय की इमारत खड़ी हुई तो उसमें शिक्षा का स्तर कैसा है? रोजगार की योजना बनी तो रोजगार कितने लोगों तक पहुंचा? जलापूर्ति की घोषणा हुई तो कितने घरों में पानी पहुंचा? विकास की असली तस्वीर ऐसे ही सवालों से बनती है।

कभी-कभी ऐसा लगता है कि उपलब्धियों की भाषा इतनी चमकदार बना दी जाती है कि समस्याओं की आवाज उसमें सुनाई ही नहीं देती। सड़क पर गड्ढा है तो फाइल में सड़क निर्माण पूरा है। किसी कार्यालय में काम के लिए नागरिक भटक रहा है तो रिपोर्ट में सेवा वितरण बेहतर बताया जा रहा है। किसी किसान की चिंता अपनी जगह है और कागज पर कृषि विकास की तस्वीर अपनी जगह। किसी युवा की नौकरी की तलाश वास्तविक है और दूसरी ओर रोजगार के आंकड़ों की प्रस्तुति अलग कहानी कहती है। इन दोनों तस्वीरों के बीच का अंतर ही वह जगह है, जहां पत्रकारिता, जनप्रतिनिधित्व और प्रशासन की असली परीक्षा होती है।

स्वागत गीत गाना बुरा नहीं है। उपलब्धियों का स्वागत होना चाहिए, अच्छे काम की प्रशंसा भी होनी चाहिए और सकारात्मक कार्यों को प्रोत्साहन मिलना चाहिए। लेकिन यदि स्वागत गीत ही व्यवस्था की एकमात्र भाषा बन जाए तो लोकतंत्र का संतुलन बिगड़ सकता है। जहां तालियों के बीच सवालों की आवाज दब जाए, वहां विकास के दावों की स्वतंत्र जांच और अधिक जरूरी हो जाती है। आलोचना को दुश्मनी समझना किसी भी संस्था या नेतृत्व के लिए नुकसानदेह हो सकता है। आलोचना वह आईना है, जिसमें चेहरा कभी सुंदर तो कभी धुंधला दिखाई देता है, लेकिन आईना तोड़ देने से चेहरा नहीं बदलता।

आज जरूरत ऐसी संस्कृति की है जिसमें प्रश्न पूछने वाले को विरोधी नहीं माना जाए। पत्रकार सवाल पूछे तो उसे असुविधा का कारण न समझा जाए, नागरिक शिकायत करे तो उसे नकारात्मक न कहा जाए और विपक्ष अपनी बात रखे तो उसे केवल राजनीति के चश्मे से न देखा जाए। लोकतंत्र में अलग-अलग आवाजों का होना कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी स्वाभाविक शक्ति है। असहमति का अर्थ अव्यवस्था नहीं होता। कई बार असहमति ही उस गलती की ओर ध्यान दिलाती है, जिसे प्रशंसा के शोर में कोई देख नहीं पाता।

सबसे खतरनाक स्थिति तब पैदा होती है जब व्यवस्था अपने आसपास केवल वही लोग रखना चाहती है, जो हर बात पर सहमत हों। 'हां जी' की आवाज कुछ समय तक सुखद लग सकती है, लेकिन लगातार वही आवाज सुनने से वास्तविक दुनिया की ध्वनि दूर होती जाती है। जनता की चुप्पी को सहमति मान लेना भी एक बड़ी भूल है। बहुत से लोग शिकायत इसलिए नहीं करते कि उन्हें लगता है उनकी सुनवाई नहीं होगी। कुछ लोग इसलिए चुप रहते हैं कि उनकी आवाज को राजनीतिक या व्यक्तिगत विरोध का नाम दे दिया जाएगा। और कुछ लोग इसलिए खामोश रहते हैं कि उन्होंने कई बार अपनी बात कहकर देख लिया, लेकिन व्यवस्था तक उनकी आवाज पहुंची ही नहीं।

किसी भी कार्यकाल की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल बड़ी-बड़ी परियोजनाएं नहीं हो सकतीं। असली उपलब्धि यह भी है कि आम आदमी को अपने कार्यालय, अपने प्रतिनिधि और अपनी व्यवस्था पर भरोसा हो। उसे लगे कि उसकी समस्या सुनी जाएगी। उसे लगे कि गलती होगी तो सुधारी जाएगी। उसे यह भरोसा हो कि शिकायत करने पर उसके साथ भेदभाव नहीं होगा। उसे यह विश्वास हो कि योजनाएं केवल भाषणों और दस्तावेजों तक सीमित नहीं रहेंगी, बल्कि उसके जीवन को भी बदलेंगी।

पुरखों की गाथा सुनाना हमारी परंपरा है, लेकिन आने वाली पीढ़ी के लिए नई गाथा लिखना हमारी जिम्मेदारी है। इतिहास के पन्नों में अपना नाम दर्ज कराने की इच्छा स्वाभाविक हो सकती है, मगर इतिहास केवल प्रचार से नहीं बनता। समय तय करता है कि कौन-सा काम वास्तव में समाज के लिए उपयोगी था और कौन-सा केवल कागज और भाषण तक सीमित रहा। इसलिए जरूरी है कि आज की योजनाओं का हिसाब आज ही जनता के सामने रखा जाए। जनता को बताया जाए कि कौन-सा काम पूरा हुआ, कौन-सा अधूरा है और किस काम में देरी क्यों हो रही है।

वास्तविक नेतृत्व वही है जो स्वागत गीत के साथ शिकायत की धुन भी सुन सके। जो तालियों के बीच उठते सवालों को पहचान सके। जो अपने आसपास केवल प्रशंसकों की भीड़ नहीं, बल्कि सच बोलने वाले लोगों को भी जगह दे। क्योंकि प्रशंसा हमें संतुष्टि दे सकती है, लेकिन आलोचना हमें सुधार का अवसर देती है। सत्ता हो, संस्था हो या कोई संगठन—हर जगह ऐसे लोगों की जरूरत होती है जो समय रहते बता सकें कि रास्ते में कहां गड्ढा है।

और आखिर में सवाल फिर वही खड़ा होता है—किसे सुनाऊं स्वागत गीत? उन्हें, जो पहले से ही अपनी प्रशंसा सुनने के लिए तैयार बैठे हैं, या उन लोगों को जिनके सवाल अभी तक अनसुने हैं? शायद स्वागत गीत की सबसे सुंदर धुन वही होगी, जिसमें उपलब्धि की खुशी के साथ जनता की पीड़ा की आवाज भी शामिल हो। जिसमें पुरखों के सम्मान के साथ वर्तमान की जिम्मेदारी हो। जिसमें नई परियोजनाओं की घोषणा के साथ उनकी जमीन पर पड़ताल हो। जिसमें कार्यकाल की उपलब्धियों के साथ कमियों को स्वीकार करने का साहस हो।

जनता को केवल यह बताने से बात पूरी नहीं होती कि कितना काम हुआ। जनता यह भी जानना चाहती है कि उसके जीवन में कितना बदलाव आया। यही लोकतंत्र का वास्तविक संवाद है। इसलिए स्वागत गीत गाइए, उपलब्धियों का उत्सव मनाइए, लेकिन उसके बाद कुछ क्षण रुककर जनता की आवाज भी सुनिए। शायद उसी आवाज में वह सच्चाई छिपी हो, जो किसी रिपोर्ट, विज्ञापन या भाषण में नहीं मिल सकती। क्योंकि लोकतंत्र में सबसे मधुर गीत वह नहीं, जिसे केवल सत्ता सुनना चाहे; सबसे जरूरी गीत वह है, जिसे जनता अपने अनुभवों से गाती है।

( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)

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