बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश केवल भाषणों और कागजों तक सीमित न रहे, इसके लिए जरूरी है आत्ममंथन और आचरण में बदलाव
विनोद कुमार झा
हर वर्ष दशहरा आते ही देशभर में बुराई पर अच्छाई की जीत का संदेश गूंजने लगता है। जगह-जगह रावण के पुतले जलाए जाते हैं, आतिशबाजी होती है, मंचों से मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्रीराम के आदर्शों का गुणगान किया जाता है और लोगों को सत्य, धर्म तथा न्याय के मार्ग पर चलने की सीख दी जाती है। इस परंपरा के पीछे गहरा संदेश छिपा है कि अन्याय, अहंकार, अत्याचार और अधर्म चाहे कितने ही शक्तिशाली क्यों न हों, उनका अंत निश्चित है। लेकिन सवाल यह है कि क्या रावण दहन के साथ समाज में व्याप्त बुराइयों का भी अंत हो जाता है? क्या पुतले के साथ हमारे भीतर का अहंकार, छल, कपट, लालच और स्वार्थ भी जलकर राख हो जाता है? यदि ऐसा नहीं होता, तो फिर हर वर्ष एक ही संदेश को दोहराने के बावजूद समाज में वही बुराइयां क्यों दिखाई देती हैं?
दशहरा केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि स्वयं को परखने और अपनी कमियों को पहचानने का अवसर भी है। रावण का पुतला जलाना प्रतीकात्मक है, जबकि अपने भीतर मौजूद बुराइयों को समाप्त करना वास्तविक चुनौती है। दूसरों की गलतियां गिनाना आसान है, लेकिन अपनी गलतियों को स्वीकार करना कठिन। दूसरों को सत्य का रास्ता दिखाना सरल है, लेकिन स्वयं सत्य पर चलना साहस मांगता है। उपदेश देने वाले बहुत मिल जाते हैं, मगर उन उपदेशों को अपने जीवन में उतारने वाले कितने हैं, इसका जवाब व्यक्ति के व्यवहार और समय के साथ सामने आता है। यही वह अंतर है, जहां आदर्श और वास्तविकता के बीच की दूरी स्पष्ट दिखाई देने लगती है।
रावण का पुतला जलता है, लेकिन अहंकार जिंदा रहता है : रावण को केवल दस सिरों वाले एक पौराणिक पात्र के रूप में देखना उसके प्रतीकात्मक संदेश को सीमित कर देना है। उसके दस सिरों को समाज में मौजूद अनेक बुराइयों के प्रतीक के रूप में भी समझा जा सकता है। अहंकार, क्रोध, लोभ, मोह, अन्याय, छल, कपट, ईर्ष्या और सत्ता का दुरुपयोग जैसी प्रवृत्तियां आज भी किसी न किसी रूप में हमारे बीच मौजूद हैं। हर वर्ष रावण का पुतला जलाकर हम इन बुराइयों के अंत की कामना करते हैं, लेकिन जब वही बुराइयां हमारे व्यवहार में दिखाई देती हैं, तब उत्सव का मूल उद्देश्य अधूरा रह जाता है।
यदि कोई व्यक्ति रावण दहन के बाद भी अपने अहंकार में दूसरों का अपमान करता है, अपने स्वार्थ के लिए किसी का अधिकार छीनता है या अपनी गलती स्वीकार करने के बजाय दूसरों को दोषी ठहराता है, तो उसे अपने भीतर झांकने की आवश्यकता है। इसी तरह यदि समाज अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाने के बजाय सुविधानुसार मौन धारण कर लेता है, तो केवल प्रतीकात्मक आयोजन से बदलाव की उम्मीद करना कठिन है। असली विजय तब होगी, जब हम अपनी गलतियों को पहचानकर उन्हें सुधारने का प्रयास करेंगे।
राजनीति में आदर्शों की कसौटी पर कौन खरा?
दशहरा और रावण दहन का संदेश राजनीतिक जीवन के संदर्भ में भी आत्ममंथन का अवसर देता है। राजनीतिक दलों के नेता अक्सर अपने भाषणों में सत्य, सेवा, सुशासन, नैतिकता और जनकल्याण की बातें करते हैं। विरोधियों की कमियों को उजागर करना और उन्हें गलत साबित करना राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है। लेकिन सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि जो आदर्श दूसरों के लिए निर्धारित किए जाते हैं, उन पर स्वयं कितना अमल किया जाता है?
लोकतंत्र में सत्ता पक्ष हो या विपक्ष, सभी की जवाबदेही जनता के प्रति है। जनता को केवल भाषणों, नारों और वादों के आधार पर नहीं, बल्कि कामकाज, निर्णयों और आचरण के आधार पर मूल्यांकन करना चाहिए। यदि कोई दल भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाता है, तो उसके अपने आचरण में पारदर्शिता भी दिखाई देनी चाहिए। यदि कोई नेता नैतिकता की बात करता है, तो उसके व्यवहार में भी नैतिकता झलकनी चाहिए। यदि कोई राजनीतिक संगठन जनसेवा को अपना उद्देश्य बताता है, तो उसकी प्राथमिकताओं में जनता के वास्तविक मुद्दे दिखाई देने चाहिए।
यह कसौटी किसी एक दल या व्यक्ति तक सीमित नहीं है। लोकतंत्र में सभी राजनीतिक दलों और जनप्रतिनिधियों को समान रूप से अपने दावों और कार्यों के बीच सामंजस्य स्थापित करना चाहिए। दूसरों पर आरोप लगाने से पहले स्वयं के आचरण की समीक्षा करना ही सच्चे नेतृत्व की पहचान है। राजनीतिक विरोध अपनी जगह है, लेकिन नैतिकता और जवाबदेही के प्रश्न पर किसी को भी छूट नहीं मिलनी चाहिए।
समाज को उपदेश नहीं, उदाहरण चाहिए : समाज में बदलाव केवल भाषणों और नारों से नहीं आता। उसकी शुरुआत घर, परिवार, कार्यस्थल और सार्वजनिक जीवन में किए जाने वाले छोटे-छोटे व्यवहारों से होती है। जब माता-पिता बच्चों को ईमानदारी का पाठ पढ़ाते हुए स्वयं ईमानदारी का पालन करते हैं, जब शिक्षक अपने आचरण से विद्यार्थियों को अनुशासन सिखाते हैं और जब अधिकारी तथा जनप्रतिनिधि अपने दायित्वों का निष्पक्षता से निर्वहन करते हैं, तभी आदर्श व्यवहार में बदलते हैं।
इसके विपरीत, यदि हमारी कथनी और करनी में अंतर है, तो हमारे शब्द अपना प्रभाव खो देते हैं। किसी को सत्य बोलने की सलाह देने से पहले स्वयं सच बोलना, दूसरों से नियमों के पालन की अपेक्षा करने से पहले स्वयं उनका सम्मान करना और अधिकारों की मांग करते समय दूसरों के अधिकारों का भी ध्यान रखना आवश्यक है। समाज में वास्तविक परिवर्तन तभी आएगा, जब हम दूसरों को सुधारने की शुरुआत करने से पहले स्वयं को सुधारने का प्रयास करेंगे।
अति का अंत निश्चित, लेकिन उससे पहले आत्ममंथन जरूरी : इतिहास और धार्मिक परंपराएं हमें बार-बार यह संदेश देती हैं कि अहंकार, अन्याय और अत्याचार का रास्ता अंततः विनाश की ओर ले जाता है। रावण की पराजय का प्रसंग भी इसी बात की याद दिलाता है कि ज्ञान, शक्ति और वैभव होने के बावजूद यदि व्यक्ति मर्यादा तथा विवेक का त्याग कर देता है, तो उसका पतन निश्चित हो जाता है। शक्ति का वास्तविक महत्व दूसरों को दबाने में नहीं, बल्कि न्याय और लोककल्याण के लिए उसका उपयोग करने में है।
हालांकि, यह भी समझना जरूरी है कि हर विवाद या असहमति को बुराई और अच्छाई के सरल विभाजन में नहीं बांटा जा सकता। वास्तविक जीवन में न्यायपूर्ण निर्णय के लिए तथ्यों, विवेक और निष्पक्षता की आवश्यकता होती है। इसलिए रावण दहन का संदेश केवल किसी दूसरे को दोषी ठहराने का माध्यम नहीं बनना चाहिए, बल्कि अपने विचारों और कार्यों की समीक्षा करने की प्रेरणा बनना चाहिए।
समाज तभी आगे बढ़ता है, जब व्यक्ति अपनी जिम्मेदारी समझता है, संस्थाएं जवाबदेह बनती हैं और सत्ता में बैठे लोग अपने अधिकारों के साथ कर्तव्यों का भी पालन करते हैं। अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाना जितना जरूरी है, उतना ही जरूरी अपने व्यवहार में न्याय को स्थान देना भी है।
इस दशहरे पर संकल्प अपने भीतर के रावण को हराने का हो : दशहरा हमें एक महत्वपूर्ण प्रश्न के सामने खड़ा करता है क्या हम केवल रावण का पुतला जलाकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेंगे, या अपने भीतर की बुराइयों को पहचानकर उन्हें समाप्त करने का संकल्प भी लेंगे? क्या बुराई पर अच्छाई की जीत केवल मंचों से बोला जाने वाला वाक्य बनी रहेगी, या हमारे व्यवहार में भी दिखाई देगी? क्या नैतिकता केवल दूसरों को समझाने का विषय रहेगी, या हम स्वयं भी उसके अनुरूप जीवन जीने का प्रयास करेंगे?
इन प्रश्नों के उत्तर किसी एक व्यक्ति, संगठन या राजनीतिक दल के पास नहीं हैं। इसका उत्तर हम सभी को अपने आचरण से देना होगा। हर व्यक्ति अपने हिस्से की ईमानदारी निभाए, हर जनप्रतिनिधि अपनी जवाबदेही स्वीकार करे और हर संस्था अपने दायित्वों का निष्पक्षता से निर्वहन करे, तो समाज में सकारात्मक बदलाव की राह मजबूत हो सकती है।
याद रखना चाहिए कि रावण का पुतला हर वर्ष जल सकता है, लेकिन भीतर की बुराइयों का अंत तभी होगा, जब हम उन्हें पालना छोड़ देंगे। दूसरों को उपदेश देना आसान है, मगर उस उपदेश पर स्वयं खरा उतरना ही असली परीक्षा है। समय अंततः शब्दों से अधिक कर्मों का मूल्यांकन करता है।
अति का अंत निश्चित है, लेकिन उससे पहले अहंकार को विवेक, अन्याय को न्याय और स्वार्थ को सेवा से पराजित करना होगा। यही दशहरे का वास्तविक संदेश है और यही बुराई पर अच्छाई की सच्ची जीत।
