इंकलाबियों के लिए मरना स्वाभिमान : भगत सिंह

विनोद कुमार झा 

भारत के स्वतंत्रता संग्राम का इतिहास केवल आंदोलनों, सभाओं, प्रस्तावों और राजनीतिक संघर्षों का इतिहास नहीं है। यह उन अनगिनत युवाओं के साहस, त्याग और संकल्प की भी कहानी है, जिन्होंने अपने जीवन की सबसे खूबसूरत उम्र देश की आजादी के नाम कर दी। इन्हीं नामों में एक ऐसा नाम है, जिसे भारतीय जनमानस ने केवल एक क्रांतिकारी के रूप में नहीं, बल्कि विचार, साहस और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में स्वीकार किया शहीद-ए-आजम भगत सिंह। 28 सितंबर 1907 को जन्मे भगत सिंह ने बेहद कम उम्र में जिस वैचारिक परिपक्वता और राजनीतिक चेतना का परिचय दिया, वह उन्हें अपने समय के दूसरे युवाओं से अलग करती है। आज भी उनका जीवन यह सवाल खड़ा करता है कि आखिर वह कौन-सी शक्ति थी, जिसने एक युवा को हंसते-हंसते फांसी के फंदे तक जाने का साहस दिया। 

भगत सिंह के लिए क्रांति का अर्थ केवल हथियार उठाना या सत्ता के विरुद्ध हिंसक कार्रवाई करना नहीं था। उनके लेखन और जेल की नोटबुक से स्पष्ट होता है कि वह इतिहास, दर्शन, राजनीति, अर्थशास्त्र और समाज व्यवस्था का गंभीर अध्ययन करते थे। जेल में रहते हुए उन्होंने रूस की क्रांति, समाजवाद, पूंजीवाद, साम्राज्यवाद और दुनिया के अनेक राजनीतिक विचारकों को पढ़ा। उनकी जेल-नोटबुक में रूसो, वोल्तेयर, मार्क्स, एंगेल्स, लेनिन, ट्रॉट्स्की, बर्ट्रेंड रसेल और अन्य लेखकों के विचारों के उल्लेख मिलते हैं। भारत सरकार के आजादी का अमृत महोत्सव पोर्टल के अनुसार, उनका लेखन इस बात का प्रमाण है कि उनकी क्रांतिकारी चेतना केवल भावनात्मक प्रतिक्रिया नहीं थी, बल्कि अध्ययन और विचार से भी निर्मित हुई थी। 

यही कारण है कि भगत सिंह की जिंदगी को केवल उनकी फांसी की घटना तक सीमित कर देना उनके व्यक्तित्व को छोटा कर देना होगा। उनका वास्तविक परिचय उनके विचारों में भी छिपा है। उन्होंने युवाओं से केवल नारे लगाने के बजाय अध्ययन करने, संगठन बनाने, किसानों और मजदूरों के बीच काम करने तथा समाज की वास्तविक समस्याओं को समझने का आह्वान किया था। उनके विचार में क्रांति का मतलब केवल सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि ऐसी सामाजिक व्यवस्था का निर्माण भी था जिसमें शोषण और असमानता के लिए जगह न हो। जेल से लिखे उनके संदेशों में यह दृष्टि साफ दिखाई देती है कि परिवर्तन के लिए अनुशासन, धैर्य, वैचारिक स्पष्टता और जनता का समर्थन आवश्यक है। 

भगत सिंह के जीवन में एक महत्वपूर्ण मोड़ लाला लाजपत राय पर हुए लाठीचार्ज और उनकी मृत्यु के बाद आया। साइमन कमीशन के विरोध में हुए प्रदर्शन के दौरान लाला लाजपत राय पर पुलिस की कार्रवाई हुई और बाद में उनकी मृत्यु हो गई। भगत सिंह और उनके साथियों ने इसके लिए जिम्मेदार माने गए पुलिस अधिकारी जेम्स ए. स्कॉट को निशाना बनाने की योजना बनाई, लेकिन पहचान की भूल के कारण सहायक पुलिस अधीक्षक जॉन पी. सॉन्डर्स की हत्या हो गई। यह घटना आगे चलकर लाहौर षड्यंत्र मामले का प्रमुख हिस्सा बनी। 

8 अप्रैल 1929 को भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त ने केंद्रीय विधान सभा में बम फेंके। इस घटना का उद्देश्य ऐसा विस्फोट करना नहीं था जिसमें बड़े पैमाने पर जानें जाएं। भारत सरकार के डिजिटल जिला भंडार के अनुसार, दोनों ने गिरफ्तारी स्वीकार की और अपने मुकदमे को औपनिवेशिक शासन की नीतियों के विरुद्ध अपने विचार सार्वजनिक करने के माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया। भगत सिंह जानते थे कि गिरफ्तारी उनके लिए गंभीर परिणाम लेकर आ सकती है, फिर भी उन्होंने भागने के बजाय अदालत और जेल को अपने विचारों के प्रचार का मंच बनाया। 

यहीं से भगत सिंह की वह छवि सामने आती है जिसमें मृत्यु भय का पर्याय नहीं, बल्कि सिद्धांतों पर अडिग रहने की अंतिम परीक्षा बन जाती है। लेकिन उनके जीवन को समझते समय यह भी जरूरी है कि ‘मरना स्वाभिमान है’ को मृत्यु का महिमामंडन समझने के बजाय उस ऐतिहासिक संदर्भ में देखा जाए जिसमें भगत सिंह और उनके साथी औपनिवेशिक शासन के विरुद्ध संघर्ष कर रहे थे। स्वयं भगत सिंह ने अपने साथी राजगुरु को लिखे पत्र में यह विचार रखा था कि क्रांतिकारी का जीवन केवल मृत्यु स्वीकार करने का नाम नहीं है; लंबी जेल, कठिन परिस्थितियां और लगातार संघर्ष भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं। उन्होंने निराशा या आत्महत्या की सोच के बजाय परिस्थितियों का सामना करने की बात कही थी। 

इसलिए भगत सिंह का स्वाभिमान केवल फांसी के तख्ते पर दिखाई देने वाला स्वाभिमान नहीं था। वह जेल की कोठरी में किताब मांगने के अधिकार के लिए संघर्ष करने में भी था। राजनीतिक बंदियों के साथ सम्मानजनक व्यवहार की मांग को लेकर उन्होंने और उनके साथियों ने भूख हड़ताल की। उनकी मांगों में किताबें और लेखन सामग्री उपलब्ध कराने तथा राजनीतिक कैदियों को समाचारपत्र देने जैसी बातें भी शामिल थीं। इससे पता चलता है कि उनके लिए स्वतंत्रता केवल देश की राजनीतिक आजादी नहीं थी, बल्कि मनुष्य की गरिमा और विचार की स्वतंत्रता भी थी। 

भगत सिंह के व्यक्तित्व की सबसे बड़ी विशेषता शायद यही थी कि उन्होंने अपने समय की लोकप्रिय भावनाओं को केवल दोहराया नहीं, बल्कि उन पर विचार भी किया। वह पढ़ते थे, लिखते थे, सवाल करते थे और अपने निष्कर्षों पर बहस करने से पीछे नहीं हटते थे। उनकी प्रसिद्ध रचना ‘मैं नास्तिक क्यों हूँ’ हो या युवाओं के नाम उनका संदेश हर जगह एक ऐसा युवा दिखाई देता है जो अंधानुकरण के बजाय तर्क और विचार को महत्व देता है। उनके लिए क्रांति का अर्थ चेतना जगाना था। इसलिए उनका नाम आज भी केवल एक ऐतिहासिक घटना के साथ नहीं, बल्कि युवा ऊर्जा और वैचारिक साहस के साथ जुड़ा हुआ है। 

23 मार्च 1931 को भगत सिंह, सुखदेव और राजगुरु को लाहौर जेल में फांसी दी गई। इस घटना ने पूरे देश में गहरा प्रभाव डाला और तीनों क्रांतिकारी युवाओं की स्मृति स्वतंत्रता आंदोलन के व्यापक प्रतीकों में शामिल हो गई। भारत सरकार के डिजिटल जिला भंडार में भी 23 मार्च को इन तीनों की शहादत से जुड़ा शहीद दिवस बताया गया है। भगत सिंह की शहादत के बाद उनकी तस्वीर, उनका नाम और उनके विचार देश के युवाओं के बीच तेजी से लोकप्रिय हुए। 

लेकिन भगत सिंह को याद करने का सबसे सार्थक तरीका केवल उनकी तस्वीर पर माला चढ़ाना या उनके नाम के नारे लगाना नहीं है। उनकी विरासत का एक महत्वपूर्ण हिस्सा यह सवाल पूछना है कि समाज में अन्याय क्यों है, असमानता क्यों है, शोषण क्यों है और युवा अपने समय की समस्याओं के प्रति कितने जागरूक हैं। उन्होंने अपने अंतिम वर्षों में भी पढ़ने, विचार करने और युवाओं को संगठित करने पर जोर दिया। उनका जीवन बताता है कि क्रांति पहले मनुष्य के भीतर जन्म लेती है और फिर समाज में परिवर्तन की आकांक्षा बनती है।

आज जब भगत सिंह का नाम किसी भी चर्चा में आता है तो ‘इंकलाब जिंदाबाद’ का नारा स्वतः स्मरण हो जाता है। लेकिन इस नारे की वास्तविक शक्ति उसके शब्दों से ज्यादा उस विचार में है जिसके लिए इसे इस्तेमाल किया गया था। भगत सिंह और उनके साथियों के लिए इंकलाब केवल शासन बदलने की पुकार नहीं था; यह उस व्यवस्था को बदलने की आकांक्षा भी था जिसमें मनुष्य का शोषण होता है। इसलिए उनके विचारों को वर्तमान समय में समझने का अर्थ किसी एक राजनीतिक विचारधारा का समर्थन करना नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक युवा की बेचैनी को समझना है जो अपने देश और समाज को अधिक न्यायपूर्ण देखना चाहता था।

भगत सिंह की शहादत हमें यह भी याद दिलाती है कि स्वाभिमान और साहस का अर्थ केवल मृत्यु को स्वीकार करना नहीं है। कई बार स्वाभिमान का सबसे कठिन रूप जीवित रहकर अपने सिद्धांतों पर टिके रहना होता है। जेल, यातना, अपमान, असहमति और कठिन परिस्थितियों के बीच विचारों को बचाए रखना भी संघर्ष है। भगत सिंह के जीवन में ये दोनों पक्ष दिखाई देते हैं एक ओर मृत्यु के सामने निर्भीक खड़ा युवा और दूसरी ओर किताबों में डूबा वह चिंतक, जो समाज और राजनीति के भविष्य पर लगातार विचार कर रहा था। 

इसीलिए भगत सिंह को केवल ‘फांसी पर चढ़ने वाले वीर’ के रूप में याद करना अधूरा होगा। वह लेखक थे, पत्रकार थे, पाठक थे, संगठनकर्ता थे और सबसे बढ़कर सवाल पूछने वाले युवा थे। उनकी उम्र छोटी थी, लेकिन उनके सवाल बड़े थे। उन्होंने अपने जीवन से यह संदेश दिया कि किसी भी राष्ट्र की वास्तविक ताकत उसके युवाओं की संख्या में नहीं, बल्कि उनकी चेतना, जिम्मेदारी और विचार की स्वतंत्रता में होती है।

आज उनकी जयंती पर जब देश उन्हें याद करता है, तब सबसे बड़ा प्रश्न यही होना चाहिए कि क्या हम उनके नाम को केवल नारों तक सीमित रखेंगे या उनके अध्ययन, तर्क, सामाजिक न्याय और मानवीय गरिमा से जुड़े विचारों को भी समझने का प्रयास करेंगे। भगत सिंह का जीवन हमें बताता है कि स्वाभिमान वह शक्ति है जो भय के सामने मनुष्य को झुकने नहीं देती, लेकिन सच्ची क्रांतिकारी चेतना यह भी सिखाती है कि साहस के साथ विवेक, त्याग के साथ विचार और संघर्ष के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी जरूरी है। यही वह विरासत है जिसके कारण 23 वर्ष की उम्र में शहीद हुए भगत सिंह का नाम एक सदी के करीब समय बीत जाने के बाद भी भारतीय इतिहास और जनस्मृति में जीवित है।

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