विनोद कुमार झा
भाद्रपद शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी तिथि को मनाई जाने वाली अनंत चतुर्दशी सनातन परंपरा में भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की उपासना का महत्वपूर्ण पर्व है। इस दिन श्रद्धालु भगवान विष्णु के अनंत रूप का स्मरण करते हुए व्रत, पूजन और अनंत सूत्र धारण करते हैं। मान्यता है कि यह सूत्र केवल धागा नहीं, बल्कि मनुष्य और भगवान के बीच विश्वास, संकल्प और धर्म के बंधन का प्रतीक है। अनंत चतुर्दशी का संबंध गणेश उत्सव के समापन से भी जुड़ा है, इसलिए यह दिन आध्यात्मिक दृष्टि से विशेष महत्व रखता है।
अनंत की गांठ आखिर इतनी महत्वपूर्ण क्यों मानी जाती है? इस प्रश्न का उत्तर केवल पूजा की विधि में नहीं, बल्कि उस प्रतीक में छिपा है जिसे हमारे ऋषियों ने सदियों पहले समझाया था। अनंत का अर्थ है जिसका कोई अंत नहीं। भगवान विष्णु को अनंत इसलिए कहा गया है क्योंकि उनकी सत्ता को आरंभ और अंत की सीमाओं में बांधा नहीं जा सकता। अनंत शेष पर भगवान विष्णु का शयन इसी विराट अवधारणा का प्रतीक माना जाता है। अनंत चतुर्दशी पर बांधा जाने वाला सूत्र इसी अनंत सत्ता, संरक्षण और जीवन में धर्म के प्रति स्थिर रहने के संकल्प का प्रतीक बन जाता है।
परंपरा के अनुसार अनंत सूत्र में चौदह गांठें लगाई जाती हैं। इन गांठों को लेकर अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में अलग-अलग धार्मिक व्याख्याएं मिलती हैं। सामान्य रूप से इन्हें भगवान विष्णु के चौदह लोकों और सृष्टि की व्यापक व्यवस्था के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। सनातन दर्शन में चौदह लोकों की कल्पना, भू, भुवः, स्वः, महः, जनः, तपः, सत्य तथा अतल, वितल, सुतल, रसातल, तलातल, महातल और पाताल के रूप में की गई है। इस दृष्टि से अनंत सूत्र की चौदह गांठें मनुष्य को यह स्मरण कराती हैं कि जीवन केवल दिखाई देने वाली भौतिक दुनिया तक सीमित नहीं है, बल्कि अस्तित्व का एक विराट और गहरा आयाम है।
हालांकि अनंत सूत्र की चौदह गांठों की व्याख्या सभी परंपराओं में एक समान नहीं मिलती। कहीं इन्हें चौदह लोकों से जोड़ा जाता है तो कहीं भगवान विष्णु की व्यापक सृष्टि-व्यवस्था और जीवन के विभिन्न आयामों का प्रतीक माना जाता है। इसलिए गांठों को किसी एक अर्थ में सीमित करने के बजाय उनके मूल भाव अनंत सत्ता के प्रति श्रद्धा और अपने संकल्प के प्रति दृढ़ता को समझना अधिक महत्वपूर्ण है।
अनंत चतुर्दशी से जुड़ी एक प्रसिद्ध कथा भगवान कृष्ण द्वारा पांडवों को बताए गए अनंत व्रत से संबंधित है। कथा में कहा जाता है कि पांडवों को कठिन परिस्थितियों से गुजरना पड़ा। तब भगवान श्रीकृष्ण ने धर्मराज युधिष्ठिर को अनंत भगवान की उपासना और व्रत का महत्व बताया। इसी परंपरा में अनंत चतुर्दशी के दिन विधिपूर्वक भगवान विष्णु का पूजन कर अनंत सूत्र धारण करने की परंपरा विकसित हुई। कथा का मूल संदेश यह है कि विपरीत परिस्थितियों में भी मनुष्य को धर्म, विश्वास और संयम का मार्ग नहीं छोड़ना चाहिए।
एक अन्य प्रसिद्ध कथा सुमंत और शीला से जुड़ी है। मान्यता के अनुसार सुशीला ने अनंत भगवान का व्रत किया और अनंत सूत्र धारण किया, जिसके फलस्वरूप उसके जीवन में सुख-समृद्धि आई। उसके पति कौंडिन्य ने जब उस सूत्र को केवल साधारण धागा समझकर उतार दिया और उसका अनादर किया, तो उनके जीवन में परेशानियां आने लगीं। बाद में उन्हें अपनी भूल का एहसास हुआ और उन्होंने अनंत भगवान की आराधना की। कथा का प्रतीकात्मक संदेश स्पष्ट है जिस विश्वास और संकल्प को हमने स्वीकार किया है, उसका उपहास या अनादर जीवन को अस्थिर कर सकता है।
अनंत की गांठ को यदि आध्यात्मिक दृष्टि से समझें तो प्रत्येक गांठ एक संकल्प जैसी दिखाई देती है। गांठ बांधने का अर्थ है किसी बात को दृढ़ता से पकड़ लेना। मनुष्य का जीवन भी ऐसे ही संकल्पों से बनता है। कभी परिवार के प्रति जिम्मेदारी की गांठ होती है, कभी सत्य के प्रति प्रतिबद्धता की, कभी सेवा की, कभी संयम की और कभी अपने कर्म के प्रति निष्ठा की। जब मनुष्य इन मूल्यों से बंधा रहता है तो जीवन में परिस्थितियां चाहे जैसी हों, उसके भीतर स्थिरता बनी रहती है।
इसीलिए अनंत सूत्र को केवल कलाई पर बांधा जाने वाला धागा समझना इस परंपरा के गहरे अर्थ को छोटा कर देना होगा। यह धागा मनुष्य को उसके कर्तव्य और मर्यादा की याद दिलाने वाला प्रतीक है। सूत्र शरीर पर बंधता है, लेकिन उसका वास्तविक उद्देश्य मन को बांधना है अधर्म से दूर रहने के लिए, अहंकार को नियंत्रित करने के लिए और अपने संकल्प से विचलित न होने के लिए।
परंपरा में पुरुषों द्वारा दाहिनी कलाई और महिलाओं द्वारा बाईं कलाई में अनंत सूत्र धारण करने की मान्यता कई क्षेत्रों में प्रचलित है। पूजन के दौरान भगवान विष्णु की प्रतिमा या चित्र के सामने अनंत सूत्र रखकर विधिपूर्वक पूजा की जाती है। भगवान विष्णु को पीले पुष्प, अक्षत, रोली, चंदन, धूप-दीप, नैवेद्य आदि अर्पित किए जाते हैं। इसके बाद अनंत भगवान का स्मरण करते हुए सूत्र धारण किया जाता है। कई परिवारों में इस दिन चौदह प्रकार के फल या अन्य पूजन सामग्री अर्पित करने की भी परंपरा मिलती है।
अनंत चतुर्दशी का एक और विशेष पक्ष गणेश विसर्जन है। गणेश चतुर्थी से शुरू हुआ गणेशोत्सव अनंत चतुर्दशी के दिन पूर्ण होता है। भक्त भगवान गणेश की प्रतिमा का विसर्जन करते हुए उनसे अगले वर्ष पुनः आने की प्रार्थना करते हैं। इस प्रकार एक ही दिन में दो अलग-अलग आध्यात्मिक भाव दिखाई देते हैं एक ओर भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप की आराधना और दूसरी ओर गणपति को भावपूर्ण विदाई। यह भारतीय संस्कृति की उस परंपरा को दर्शाता है जिसमें उत्सव के साथ विरह और विदाई को भी आध्यात्मिक अनुभव का हिस्सा माना गया है।
अनंत चतुर्दशी हमें यह भी सिखाती है कि संसार में बहुत कुछ परिवर्तनशील है। धन आता-जाता है, संबंधों में परिस्थितियां बदलती हैं, सफलता और असफलता जीवन का हिस्सा हैं, लेकिन मनुष्य के जीवन में कुछ मूल्य ऐसे होने चाहिए जिनसे वह कभी अलग न हो। सत्य, करुणा, सेवा, संयम, कर्तव्य और ईश्वर के प्रति श्रद्धा ऐसी ही गांठें हैं। इन्हें जितना मजबूत किया जाए, जीवन उतना ही संतुलित और सार्थक बनता है।
अनंत की गांठ का सबसे सुंदर रहस्य शायद यही है कि गांठ बाहर नहीं, भीतर बांधी जानी चाहिए। हाथ में बंधा धागा समय के साथ पुराना हो सकता है, टूट सकता है या उतारा जा सकता है, लेकिन यदि उसके साथ लिया गया संकल्प हृदय में जीवित रहे तो वही अनंत सूत्र बन जाता है। पूजा समाप्त होने के बाद भी यदि मनुष्य अपने व्यवहार में सत्य रखता है, परिवार के प्रति जिम्मेदारी निभाता है, जरूरतमंद की सहायता करता है और अपने कर्म के प्रति ईमानदार रहता है, तभी अनंत व्रत की वास्तविक भावना जीवन में उतरती है।
इस दिन भगवान विष्णु के “ॐ अनंताय नमः” मंत्र का जाप करने की भी परंपरा है। श्रद्धालु अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान का ध्यान करते हुए इस मंत्र का जाप कर सकते हैं। भगवान विष्णु के अनंत स्वरूप का ध्यान करते हुए मन में यह भावना रखी जाती है कि जीवन की सीमित परिस्थितियों के बीच भी ईश्वर की सत्ता और धर्म का मार्ग अनंत है।
अनंत चतुर्दशी केवल एक धार्मिक तिथि नहीं, बल्कि संकल्प, विश्वास और निरंतरता का पर्व है। कलाई में बंधी चौदह गांठें हमें यह याद दिलाती हैं कि जीवन में कितने ही उतार-चढ़ाव क्यों न आएं, हमें अपने मूल्यों से नहीं टूटना चाहिए। अनंत सूत्र की असली शक्ति धागे में नहीं, उस भावना में है जिसके साथ उसे बांधा जाता है। इसलिए इस अनंत चतुर्दशी पर यदि कोई एक गांठ बांधनी हो तो वह अपने भीतर सत्य, सेवा, संयम और सद्कर्म से कभी न टूटने की गांठ होनी चाहिए। यही अनंत की परंपरा का सबसे गहरा संदेश है।
