पंच मंच पर, बाहर प्रपंच पर

 विनोद कुमार झा 

समाज की व्यवस्था को समझने के लिए कभी-कभी बहुत बड़े सिद्धांतों की जरूरत नहीं होती, बस अपने आसपास के दृश्य को थोड़ी देर ठहरकर देखने की जरूरत होती है। कहीं मंच पर न्याय, समानता, भाईचारे और विकास की बातें होती हैं तो मंच से बाहर वही समाज जाति, वर्ग, धर्म, क्षेत्र, भाषा, आर्थिक हैसियत और राजनीतिक पहचान के खांचों में बंटता दिखाई देता है। मंच पर शब्दों की चमक होती है और बाहर जीवन की सच्चाई। यही विरोधाभास आज के सामाजिक और राजनीतिक जीवन की सबसे बड़ी विडंबनाओं में से एक है। इसी विडंबना को यदि एक पंक्ति में समेटना हो तो कहा जा सकता है ‘पंच मंच पर, बाहर प्रपंच पर।’ पंच यानी न्याय का प्रतीक, वह व्यवस्था जो निष्पक्ष होकर सही और गलत का निर्णय करे; लेकिन जब न्याय की भाषा मंच तक सीमित रह जाए और व्यवहार में स्वार्थ, पक्षपात तथा अवसरवाद हावी हो जाए तो मंच और मैदान के बीच एक गहरी खाई पैदा हो जाती है।

लोकतंत्र की खूबसूरती इसी बात में है कि यहां हर नागरिक को समान अधिकार प्राप्त हैं। संविधान ने किसी व्यक्ति की सामाजिक पृष्ठभूमि, आर्थिक स्थिति, जाति, धर्म या भाषा के आधार पर उसके अधिकारों में भेद नहीं किया। सामाजिक न्याय का मूल उद्देश्य भी यही है कि समाज में मौजूद असमानताओं को पहचानकर उन लोगों को अवसर और सम्मान मिले जो ऐतिहासिक, आर्थिक या सामाजिक कारणों से पीछे रह गए हैं। लेकिन सामाजिक न्याय केवल भाषण का विषय नहीं हो सकता। उसका वास्तविक अर्थ तभी सामने आता है जब कमजोर व्यक्ति को न्याय पाने के लिए किसी प्रभावशाली व्यक्ति की सिफारिश की जरूरत न पड़े, गरीब की आवाज उसकी जेब देखकर न तौली जाए, किसी महिला की बात उसकी सामाजिक स्थिति देखकर न सुनी जाए और किसी युवा की प्रतिभा उसके परिचय-पत्र से नहीं बल्कि उसकी योग्यता से पहचानी जाए। यदि मंच पर समानता की घोषणा हो और बाहर अवसरों का बंटवारा पहचान देखकर हो, तो सवाल केवल राजनीति से नहीं, पूरे सामाजिक चरित्र से जुड़ जाता है।

राजनीति समाज का आईना कही जाती है, लेकिन राजनीति केवल नेताओं से नहीं बनती। समाज जिस तरह सोचता है, जिस तरह अपने हित चुनता है और जिस तरह दूसरे के अधिकारों को देखता है, उसी का प्रतिबिंब राजनीतिक व्यवहार में दिखाई देता है। चुनाव के समय हर नागरिक महत्वपूर्ण हो जाता है। उसके दरवाजे पर पहुंचकर उसकी समस्याएं सुनी जाती हैं, उसके वोट की कीमत समझाई जाती है और उसके अधिकारों की बात की जाती है। लेकिन चुनाव समाप्त होते ही यदि वही नागरिक व्यवस्था के किसी दफ्तर में अपनी छोटी-सी समस्या लेकर भटकता रहे और उसे सुनने वाला कोई न मिले, तो लोकतंत्र का वास्तविक अर्थ कमजोर पड़ता है। राजनीति का उद्देश्य केवल सत्ता हासिल करना नहीं बल्कि सत्ता को समाज के प्रति जवाबदेह बनाना है। सत्ता यदि जनता से संवाद करती है, समस्याओं का समाधान करती है और संस्थाओं को मजबूत करती है तो लोकतंत्र गहरा होता है; लेकिन यदि जनता को केवल संख्या, वोट बैंक या भीड़ के रूप में देखा जाए तो लोकतांत्रिक व्यवस्था का मानवीय पक्ष कमजोर पड़ने लगता है।

‘पंच मंच पर’ का अर्थ यह भी हो सकता है कि समाज के सामने न्याय की एक आदर्श तस्वीर रखी जाती है। मंच पर सभी बराबर हैं, सभी के लिए समान अवसर हैं और हर किसी को सम्मान देने की बातें होती हैं। मगर ‘बाहर प्रपंच’ तब शुरू होता है जब वही आदर्श वास्तविक जीवन में सुविधा के अनुसार बदलने लगते हैं। अपने व्यक्ति के लिए नियम अलग और दूसरे के लिए अलग, अपने समर्थक के लिए संवेदना और विरोधी के लिए कठोरता, अपने समुदाय की गलती पर मौन और दूसरे की गलती पर शोर यह प्रवृत्ति केवल राजनीति में नहीं, सामाजिक जीवन में भी दिखाई देती है। जब हम न्याय को सिद्धांत की बजाय अपने हित के अनुसार परिभाषित करने लगते हैं, तब प्रपंच केवल बाहर नहीं रहता, वह हमारे भीतर भी प्रवेश कर जाता है।

सामाजिक न्याय की सबसे बड़ी परीक्षा उस समय होती है जब न्याय का लाभ किसी ऐसे व्यक्ति को मिलना हो जिसे हम पसंद नहीं करते। अपने व्यक्ति के लिए न्याय मांगना आसान है, लेकिन विरोधी के लिए भी वही न्याय स्वीकार करना लोकतांत्रिक संस्कार की पहचान है। यदि हम अपने पक्ष के व्यक्ति की गलती को ‘परिस्थिति’ कहकर समझाते हैं और दूसरे पक्ष की छोटी गलती को ‘अपराध’ घोषित करने लगते हैं, तो हमारी न्याय की समझ कमजोर है। समाज में वास्तविक न्याय तभी मजबूत होगा जब व्यक्ति, संस्था और राजनीतिक दल अपने हित से ऊपर व्यवस्था के सिद्धांतों को रखने का साहस दिखाएं।

राजनीतिक दल लोकतंत्र के महत्वपूर्ण स्तंभ हैं। उन्हें जनता के विभिन्न वर्गों की आकांक्षाओं को प्रतिनिधित्व देने का अवसर मिलता है। उनके घोषणापत्र में रोजगार, शिक्षा, स्वास्थ्य, महिला सुरक्षा, किसान, मजदूर, युवा, गरीब और वंचित वर्गों के अधिकारों की बातें होती हैं। इन मुद्दों का राजनीतिक विमर्श में आना लोकतंत्र के लिए आवश्यक है। लेकिन किसी भी घोषणा की असली कसौटी उसका क्रियान्वयन है। जनता को यह देखने का अधिकार है कि जो वादा किया गया, वह कितना पूरा हुआ; जिस नीति की घोषणा हुई, उसका लाभ किस तक पहुंचा; और जिस व्यवस्था में सुधार का दावा किया गया, उसमें वास्तव में कितना परिवर्तन आया। सवाल पूछना राजनीति विरोध नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक जिम्मेदारी है। इसी तरह जवाब देना भी किसी पर एहसान नहीं, सार्वजनिक जीवन की जिम्मेदारी है।

आज समाज के सामने एक बड़ी चुनौती यह भी है कि राजनीतिक बहस कई बार वास्तविक समस्याओं से हटकर आरोप-प्रत्यारोप में बदल जाती है। बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य, महंगाई, पर्यावरण, न्याय तक पहुंच, ग्रामीण विकास और शहरी सुविधाओं जैसे विषयों पर गंभीर चर्चा की आवश्यकता होती है, लेकिन बहस अक्सर इस बात पर केंद्रित हो जाती है कि किसने क्या कहा और किसने किसका विरोध किया। राजनीति में मतभेद स्वाभाविक हैं, मगर मतभेद को मनभेद में बदल देना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए नुकसानदेह हो सकता है। जनता को नारे से अधिक नीति की जानकारी चाहिए, आरोप से अधिक तथ्य चाहिए और वादों से अधिक उनके परिणाम जानने का अधिकार है।

सामाजिक न्याय का एक महत्वपूर्ण पक्ष यह भी है कि न्याय केवल अदालतों या सरकारों की जिम्मेदारी नहीं है। परिवार, विद्यालय, बाजार, मीडिया, सामाजिक संस्थाएं और आम नागरिक भी न्यायपूर्ण समाज बनाने में भूमिका निभाते हैं। यदि घर में बेटा और बेटी के अधिकारों में फर्क किया जाता है, यदि विद्यालय में आर्थिक रूप से कमजोर बच्चे को कमतर समझा जाता है, यदि नौकरी में योग्यता से अधिक पहचान को महत्व दिया जाता है या यदि समाज किसी व्यक्ति को उसकी सामाजिक पृष्ठभूमि के आधार पर आंकता है, तो संविधान की समानता की भावना कागज पर तो मौजूद रहती है लेकिन व्यवहार में कमजोर पड़ जाती है।

मीडिया और सार्वजनिक संवाद की भूमिका भी यहां महत्वपूर्ण हो जाती है। लोकतंत्र में सवाल पूछने वाली आवाजों का होना आवश्यक है। सत्ता किसी भी दल या विचारधारा की हो, पत्रकारिता और नागरिक समाज का दायित्व है कि वह जनता के प्रश्न सामने रखे। लेकिन सार्वजनिक संवाद का उद्देश्य केवल सनसनी पैदा करना नहीं होना चाहिए। तथ्य और विचार के बीच अंतर बनाए रखना, आरोपों की पुष्टि करना और किसी व्यक्ति या समूह के बारे में धारणा बनाने से पहले उसके पक्ष को समझना भी उतना ही जरूरी है। जब सूचना के स्थान पर अफवाह और तथ्य के स्थान पर प्रचार हावी होने लगे तो ‘प्रपंच’ को बढ़ावा मिलता है।

आज सोशल मीडिया ने हर व्यक्ति को अपनी बात कहने का मंच दिया है। यह लोकतंत्र के लिए बड़ा अवसर है, लेकिन इसके साथ जिम्मेदारी भी जुड़ी है। किसी संदेश को आगे बढ़ाने से पहले यह देखना जरूरी है कि वह तथ्य है, राय है या अधूरी जानकारी। राजनीतिक मतभेद को व्यक्तिगत दुश्मनी में बदलना, असहमति रखने वाले व्यक्ति को अपमानित करना और किसी समुदाय के प्रति अविश्वास फैलाना सामाजिक न्याय की भावना के विपरीत है। लोकतंत्र में असहमति दुश्मनी नहीं होती। बल्कि स्वस्थ लोकतंत्र की पहचान ही यह है कि अलग-अलग विचार रखने वाले लोग एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान करते हुए बहस कर सकें।

‘पंच मंच पर, बाहर प्रपंच पर’ इसलिए केवल राजनीतिक व्यवस्था पर टिप्पणी नहीं, बल्कि समाज के आत्ममंथन का विषय है। हमें यह देखना होगा कि क्या हमारे मंच और हमारे व्यवहार में समानता है? क्या हम जिस न्याय की मांग अपने लिए करते हैं, वही न्याय दूसरों को देने के लिए तैयार हैं? क्या हम राजनीतिक दलों से जवाबदेही मांगते समय स्वयं भी सामाजिक जिम्मेदारी निभाते हैं? क्या हम किसी नेता के भाषण से प्रभावित होने से पहले उसके काम और नीतियों को समझने की कोशिश करते हैं? क्या हम अपने राजनीतिक मत से अलग विचार रखने वाले नागरिक के अधिकार का भी उतना ही सम्मान करते हैं? इन सवालों के जवाब ही लोकतंत्र की वास्तविक गुणवत्ता तय करते हैं।

समाज को प्रपंच से बचाने के लिए सबसे पहले भाषा नहीं, नीयत बदलनी होगी। मंच पर बोले गए शब्दों और जमीन पर किए गए काम के बीच दूरी कम करनी होगी। न्याय को किसी दल, जाति, धर्म, वर्ग या व्यक्ति की संपत्ति नहीं बनने देना होगा। सत्ता में बैठे लोगों से सवाल पूछने होंगे तो विपक्ष में बैठे लोगों से भी उनके विचार और कार्यों पर सवाल करना होगा। किसी व्यक्ति का समर्थन करना नागरिक अधिकार है, लेकिन समर्थन का अर्थ यह नहीं कि उसकी हर बात सही मान ली जाए। इसी तरह विरोध का अर्थ भी यह नहीं कि दूसरे पक्ष की हर बात गलत मान ली जाए। लोकतंत्र व्यक्ति पूजा या व्यक्ति विरोध से नहीं, संस्थाओं, संविधान, कानून और नागरिक विवेक के सम्मान से मजबूत होता है।

अतः ‘पंच मंच पर, बाहर प्रपंच पर’ हमें उस अंतर की याद दिलाता है जो कहे गए शब्द और किए गए कर्म के बीच पैदा हो जाता है। मंच पर न्याय की बात करना आसान है, लेकिन न्यायपूर्ण व्यवहार करना कठिन। मंच पर समानता का नारा लगाना आसान है, लेकिन अवसर मिलने पर किसी कमजोर व्यक्ति को बराबरी का स्थान देना कठिन। राजनीति में जनसेवा की बात करना आसान है, लेकिन जनता की वास्तविक समस्या के सामने खड़े होकर उसका समाधान करना कठिन। इसलिए समाज को केवल मंच के पंच पर भरोसा नहीं करना चाहिए, बल्कि मंच के बाहर होने वाले व्यवहार को भी देखना चाहिए। लोकतंत्र की असली परीक्षा भाषण समाप्त होने के बाद शुरू होती है। जब माइक बंद हो जाता है, भीड़ लौट जाती है और कैमरे हट जाते हैं, तब जो व्यवहार बचता है वही किसी व्यवस्था, संस्था और समाज की वास्तविक पहचान बनाता है। यदि मंच पर न्याय और बाहर भी न्याय हो, तो लोकतंत्र केवल व्यवस्था नहीं, जीवन-पद्धति बन जाता है; लेकिन यदि मंच पर पंच और बाहर प्रपंच चलता रहे, तो सबसे बड़ी जरूरत किसी और को बदलने की नहीं, बल्कि समाज को अपने भीतर झांकने की होती है।

- ( लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)

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