- ‘ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्’ के दौर में सुख, उपभोग और आर्थिक विवेक का सवाल
विनोद कुमार झा
“ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” कर्ज लेकर भी घी पियो। भारतीय दार्शनिक विमर्श में चर्चित यह पंक्ति सामान्यतः चार्वाक या लोकायत दर्शन से जोड़कर देखी जाती है। इसके साथ प्रचलित पंक्ति है “यावज्जीवेत् सुखं जीवेत्”, अर्थात जब तक जीवन है, सुखपूर्वक जियो। अपने मूल दार्शनिक संदर्भ में यह विचार जीवन और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने वाली दृष्टि का हिस्सा है, लेकिन आधुनिक समाज में इसका अर्थ अक्सर बेहद सरल कर दिया गया है आज सुख चाहिए तो कल की चिंता क्यों करें?
विडंबना यह है कि आधुनिक उपभोक्तावादी अर्थव्यवस्था ने इसी सोच को एक नया औजार दे दिया है कर्ज।आज जेब में पैसा न हो तो भी खरीदारी संभव है। बैंक और वित्तीय संस्थाएं ऋण देने को तैयार हैं, क्रेडिट कार्ड तत्काल खर्च की सुविधा देता है और ईएमआई भविष्य की आय को वर्तमान की खरीदारी से जोड़ देती है। नतीजा यह कि व्यक्ति पहले वस्तु खरीदता है और बाद में वर्षों तक उसकी कीमत चुकाता है। यहीं से एक गंभीर सवाल जन्म लेता है क्या हम सुविधा खरीद रहे हैं या अपना भविष्य किस्तों में बेच रहे हैं?
जरूरत कितनी, दिखावा कितना?
कर्ज लेना अपने आप में कोई बुरी बात नहीं है। घर खरीदने के लिए गृह ऋण, उच्च शिक्षा के लिए शिक्षा ऋण, कारोबार बढ़ाने के लिए व्यावसायिक ऋण ये सभी आर्थिक विकास के सामान्य साधन हैं। समस्या तब पैदा होती है जब ऋण आवश्यकता की पूर्ति से आगे बढ़कर जीवनशैली और दिखावे का माध्यम बन जाता है।
एक व्यक्ति को कार की जरूरत है, लेकिन वह अपनी आर्थिक क्षमता से कहीं महंगी कार खरीद लेता है। घर में फोन ठीक काम कर रहा है, फिर भी नया मॉडल चाहिए। शादी सामान्य तरीके से हो सकती है, लेकिन सामाजिक प्रतिष्ठा के लिए लाखों रुपये खर्च करना जरूरी समझा जाता है। छुट्टी मनाना अच्छी बात है, लेकिन यदि उसकी कीमत लंबे समय तक कर्ज चुकाकर देनी पड़े तो उस आनंद पर भी प्रश्न उठता है।
आज उपभोग केवल आवश्यकता नहीं रहा। वह सामाजिक पहचान का हिस्सा बनता जा रहा है। हम क्या खरीदते हैं, उससे अधिक महत्वपूर्ण यह हो गया है कि दूसरे लोग हमें किस नजर से देखते हैं। सोशल मीडिया ने इस प्रतिस्पर्धा को और तेज किया है। किसी की नई कार, विदेश यात्रा, आलीशान घर या महंगा सामान देखकर अपनी जिंदगी साधारण लगने लगती है। फिर बाजार उस असंतोष को पहचानता है और समाधान के रूप में एक ही शब्द सामने आता है ईएमआई।
ईएमआई : सुविधा या भविष्य की गिरवी?
ईएमआई आधुनिक वित्तीय व्यवस्था की बड़ी सुविधा है। इससे ऐसी चीजें खरीदना संभव होता है जिनके लिए एकमुश्त भुगतान करना कठिन हो सकता है। लेकिन सुविधा तभी तक सुविधा है, जब तक वह व्यक्ति की आर्थिक क्षमता के भीतर रहे। जब आय का बड़ा हिस्सा पहले ही घर, कार, व्यक्तिगत ऋण और क्रेडिट कार्ड की किस्तों में बंट चुका हो, तब व्यक्ति की आर्थिक स्वतंत्रता धीरे-धीरे कम होने लगती है।
महीने की तनख्वाह आती है और उसका बड़ा हिस्सा पहले से तय भुगतान में चला जाता है। फिर बचता है रोजमर्रा का खर्च। अचानक बीमारी आ जाए, नौकरी चली जाए, कारोबार में मंदी आ जाए या परिवार में कोई बड़ी आवश्यकता सामने आ जाए तो वही ईएमआई भारी बोझ बन जाती है। इसलिए असली सवाल यह नहीं कि बैंक कितना ऋण देने को तैयार है।
सवाल यह है कि व्यक्ति अपनी आय में से कितना ऋण सुरक्षित रूप से चुका सकता है। बैंक की ऋण-सीमा और व्यक्ति की वास्तविक भुगतान क्षमता एक ही चीज नहीं है।
आज का बाजार केवल वस्तुएं नहीं बेचता, वह इच्छाएं भी पैदा करता है। विज्ञापन हमें बताते हैं कि बेहतर जीवन कैसा दिखता है। सोशल मीडिया उसकी तस्वीर दिखाता है। आसान कर्ज उसे हासिल करने का रास्ता उपलब्ध कराता है।
यह एक पूरा चक्र है जिससे इच्छा पैदा होती है, तुलना बढ़ती है, खरीदारी होती है, पैसा कम पड़ता है, कर्ज लिया जाता है और फिर भविष्य की आय उस खरीदारी की कीमत चुकाती है। कुछ समय बाद वही वस्तु सामान्य लगने लगती है और नई इच्छा जन्म लेती है।
इस तरह मनुष्य अपनी आय बढ़ाने के साथ-साथ अपनी इच्छाओं का स्तर भी बढ़ाता जाता है। आय बढ़ती है, लेकिन आर्थिक संतोष नहीं बढ़ता।यही आधुनिक उपभोक्तावाद का सबसे बड़ा विरोधाभास है।
क्या वर्तमान में जीना गलत है?
बिल्कुल नहीं। जीवन केवल भविष्य की तैयारी का नाम भी नहीं है। यदि कोई व्यक्ति सारी जिंदगी केवल बचत करता रहे और वर्तमान को जीना ही भूल जाए तो वह भी संतुलित जीवन नहीं कहा जा सकता। परिवार के साथ समय बिताना, यात्रा करना, अच्छा भोजन करना, अपने शौक पूरे करना और सुविधाजनक जीवन जीना जरूरी है।
लेकिन वर्तमान को जीने और भविष्य को सुरक्षित रखने के बीच संतुलन आवश्यक है। आज की खुशी ऐसी नहीं होनी चाहिए जिसकी कीमत कल की मजबूरी बन जाए। एक परिवार यदि एक दिन के भव्य समारोह के लिए वर्षों का कर्ज लेता है तो उसे यह जरूर सोचना चाहिए कि उस एक दिन की चमक कितने लंबे आर्थिक दबाव में बदल जाएगी।
दिखावे की खुशी क्षणिक हो सकती है, लेकिन कर्ज की किस्त लंबे समय तक चलती है। असली समृद्धि की परिभाषा बदलनी होगी, हमने समृद्धि को बहुत हद तक वस्तुओं से जोड़ दिया है।
बड़ी कार है तो समृद्धि, महंगा फोन है तो समृद्धि, आलीशान घर है तो समृद्धि। विदेश यात्रा है तो समृद्धि। लेकिन क्या वास्तव में यही आर्थिक मजबूती है? शायद नहीं। वास्तविक आर्थिक मजबूती उस व्यक्ति की है जिसके पास आपातकाल के लिए बचत है, जिसके ऊपर अनावश्यक कर्ज नहीं है, जो बच्चों की शिक्षा की योजना बना सकता है, जो अचानक आए आर्थिक संकट में पूरी तरह दूसरों पर निर्भर नहीं होता और जिसे हर महीने की आय आने से पहले ही अगली कई किस्तों की चिंता नहीं सताती।
आर्थिक स्वतंत्रता का अर्थ केवल अधिक कमाना नहीं, बल्कि अपनी कमाई पर नियंत्रण बनाए रखना भी है। कर्ज की संस्कृति का सवाल केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं है। सरकारें भी विकास और सामाजिक योजनाओं के लिए ऋण लेती हैं। सार्वजनिक ऋण आधुनिक अर्थव्यवस्था का सामान्य हिस्सा है।लेकिन वहां भी वही प्रश्न महत्वपूर्ण है कर्ज का इस्तेमाल किस लिए किया जा रहा है?
यदि ऋण का उपयोग सड़क, रेल, सिंचाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, तकनीक और उत्पादन क्षमता बढ़ाने वाली परियोजनाओं में होता है, तो वह भविष्य की अर्थव्यवस्था को मजबूत कर सकता है। लेकिन यदि वर्तमान की लोकप्रियता के लिए ऐसा खर्च बढ़ता जाए जिसका दीर्घकालिक आर्थिक लाभ सीमित हो, तो उसका बोझ आने वाली पीढ़ियों पर पड़ सकता है। इसलिए वित्तीय अनुशासन व्यक्ति और सरकार दोनों के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है।
“ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” को केवल “कर्ज लेकर मौज करो” के रूप में समझना शायद इस विचार को बहुत सीमित कर देना है। चार्वाक परंपरा का व्यापक विमर्श जीवन और प्रत्यक्ष अनुभव को महत्व देने से जुड़ा था। बाद की दार्शनिक परंपराओं ने चार्वाक विचारों की आलोचना भी की और उनका वर्णन भी किया। लेकिन आज यह पंक्ति हमारे सामने एक उपयोगी बहस जरूर खड़ी करती है।
क्या हम भविष्य की चिंता में वर्तमान को पूरी तरह खो दें? या फिर वर्तमान के सुख के लिए भविष्य को ही संकट में डाल दें?दोनों अतियां खतरनाक हैं। जरूरत है उस तीसरे रास्ते की, जहां वर्तमान में जीवन भी हो और भविष्य के लिए सुरक्षा भी।
घी पिएं, लेकिन घर गिरवी रखकर नहीं : आज की दुनिया में “घृत” को केवल भोजन के रूप में नहीं, बल्कि सुख-सुविधा और जीवन की गुणवत्ता के प्रतीक के रूप में देखा जा सकता है। अच्छा जीवन जीना गलत नहीं है। गलत तब है जब उस जीवन की कीमत आर्थिक स्वतंत्रता से चुकानी पड़े।
नई कार खरीदिए, यदि उसकी किस्त आपकी आय को असंतुलित नहीं करती। घर लीजिए, यदि उसका ऋण आपकी क्षमता के भीतर है। यात्रा कीजिए, लेकिन उसके लिए ऐसा कर्ज न लें जिसे चुकाते-चुकाते अगली कई यात्राओं की खुशी खत्म हो जाए।
अपने बच्चों पर खर्च कीजिए, लेकिन उन्हें यह भी सिखाइए कि हर इच्छा तुरंत पूरी करना आवश्यक नहीं। और सबसे बढ़कर दिखावे को जरूरत मत बनने दीजिए। समाज में प्रतिष्ठा के लिए लिया गया कर्ज अक्सर सबसे महंगा कर्ज होता है, क्योंकि उसकी कीमत केवल बैंक को नहीं, मन की शांति को भी चुकानी पड़ती है।
आज की दुनिया हमें लगातार यह समझाने की कोशिश करती है कि खुशी किसी अगली खरीदारी के बाद मिलेगी। नया फोन, नई कार, नया घर, नई यात्रा और फिर एक और नई इच्छा।लेकिन जीवन का सुख वस्तुओं की संख्या से नहीं मापा जा सकता। कई बार कम कर्ज, अधिक समय और मानसिक शांति किसी महंगी वस्तु से कहीं अधिक मूल्यवान होती है। इसलिए “ऋणं कृत्वा घृतं पिबेत्” को आज के समय में एक चेतावनी की तरह भी पढ़ा जा सकता है। वर्तमान को मत भूलिए, लेकिन भविष्य को भी मत बेचिए।
कर्ज लीजिए तो सोच-समझकर। खर्च कीजिए तो अपनी आय देखकर। सुख भोगिए तो अपनी क्षमता के भीतर। और सबसे जरूरी दूसरों की जिंदगी देखकर अपनी आर्थिक प्राथमिकताएं तय मत कीजिए। क्योंकि जिस समाज में आदमी अपनी हैसियत दिखाने के लिए कर्ज लेता है, वहां चमक बढ़ सकती है, लेकिन आर्थिक सुरक्षा जरूरी नहीं कि बढ़े। अंततः सवाल यह नहीं कि हमने कितना घी पिया।
सवाल यह है कि उस घी की कीमत हमने अपनी कमाई से चुकाई या अपने भविष्य से। आज के समय का शायद यही नया सूत्र होना चाहिए। “आज भी जिएं, कल के लिए भी बचाएं; सुख भी कमाएं और आर्थिक स्वतंत्रता भी बचाएं।” क्योंकि सच्चा सुख वह नहीं जो कुछ घंटों के लिए जीवन को चमका दे और वर्षों तक किस्तों का बोझ बना रहे। सच्चा सुख वह है जिसमें आज की मुस्कान और कल की सुरक्षा दोनों साथ चलें।
(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
