विनोद कुमार झा
देश की तरक्की के दावे आज हर मंच पर सुनाई देते हैं। दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत, तेज आर्थिक विकास, बढ़ते निवेश, मजबूत होते बुनियादी ढांचे और वैश्विक मंचों पर बढ़ते प्रभाव की चर्चा भी खूब होती है। आंकड़ों और उपलब्धियों की चमक से ऐसा लगता है कि देश तेजी से समृद्धि की ओर बढ़ रहा है। लेकिन इसी चमक के बीच जब आम आदमी अपनी रसोई का हिसाब लगाता है, बच्चों की फीस भरता है, घर का किराया देता है, दवाइयां खरीदता है और महीने के अंत में अपनी जेब टटोलता है, तो तस्वीर कुछ और ही दिखाई देती है।
यही वह विरोधाभास है जिसे कहावत के रूप में कहा जा सकता है, ‘चिराग तले अंधेरा।’
एक ओर विकास का उजाला दिखाने के लिए बड़े-बड़े दावे हैं, दूसरी ओर उसी उजाले के नीचे खड़ा वह आम नागरिक है, जिसकी आय और खर्च के बीच की दूरी लगातार बढ़ती जा रही है। बाजार में वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं, सेवाएं महंगी हो रही हैं और रोजमर्रा की जरूरतें आम परिवार के बजट पर लगातार दबाव बना रही हैं। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि आखिर विकास का लाभ किस तक पहुंच रहा है और उसकी वास्तविक कीमत कौन चुका रहा है?
किसी भी देश की आर्थिक प्रगति का वास्तविक मूल्यांकन केवल बड़े आर्थिक आंकड़ों से नहीं किया जा सकता। विकास की असली कसौटी यह है कि सामान्य परिवार का जीवन कितना आसान हुआ, उसकी क्रय शक्ति कितनी बढ़ी, रोजगार के अवसर कितने बढ़े और उसकी मूलभूत जरूरतें कितनी सुलभ हुईं।
यदि किसी परिवार की आय बढ़ती है, लेकिन उसी अनुपात में भोजन, शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास, परिवहन और बिजली-पानी जैसी आवश्यकताओं का खर्च उससे कहीं अधिक तेजी से बढ़ जाए, तो कागज पर आय बढ़ने के बावजूद परिवार वास्तव में आर्थिक दबाव में ही रहता है। यही आज की सबसे बड़ी चुनौती है।
दुनिया के मंच पर आर्थिक ताकत का ढोल बजाना आसान है, लेकिन उस ताकत को आम आदमी की रसोई तक पहुंचाना कठिन है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की प्रतिष्ठा निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन देश की प्रतिष्ठा तब और मजबूत होगी जब एक साधारण मजदूर, किसान, कर्मचारी, छोटा दुकानदार और मध्यमवर्गीय परिवार भी यह महसूस करे कि उसकी जिंदगी वास्तव में बेहतर हुई है।
महंगाई केवल आंकड़ा नहीं, परिवार की कहानी है
महंगाई को अक्सर प्रतिशत के आंकड़ों में समझाया जाता है। लेकिन आम आदमी के लिए महंगाई किसी आर्थिक रिपोर्ट का आंकड़ा नहीं, बल्कि उसकी थाली में कम होती सब्जी, बाजार से लौटते समय बढ़ा हुआ बिल और महीने के आखिरी सप्ताह में खत्म होती बचत है।
पहले जिस रकम में परिवार का महीने भर का राशन आ जाता था, अब उसी रकम में कम सामान आता है। रसोई का बजट बढ़ता है तो मनोरंजन का खर्च कम करना पड़ता है। बच्चों की पढ़ाई महंगी होती है तो कपड़ों की खरीद टलती है। दवाइयों का खर्च बढ़ता है तो दूसरी जरूरतों पर कैंची चलती है। यानी महंगाई केवल जेब नहीं काटती, वह परिवार की प्राथमिकताओं को बदल देती है।
सबसे ज्यादा असर उन परिवारों पर पड़ता है जिनकी आमदनी सीमित है। उच्च आय वर्ग के लिए किसी वस्तु की कीमत में मामूली वृद्धि शायद बहुत बड़ी समस्या न हो, लेकिन कम आय वाले परिवार के लिए वही वृद्धि पूरे महीने के बजट को बिगाड़ सकती है।
मध्यम वर्ग : न गरीब की कतार में, न अमीरी की राहत में
महंगाई का सबसे जटिल असर मध्यम वर्ग पर दिखाई देता है। यह वर्ग अक्सर सरकारी योजनाओं की प्रत्यक्ष सहायता से बाहर रह जाता है और दूसरी ओर उसकी आय इतनी अधिक नहीं होती कि बढ़ते खर्च को आसानी से वहन कर सके।
नौकरीपेशा व्यक्ति की तनख्वाह बढ़ती है, लेकिन साथ ही मकान का किराया, बच्चों की फीस, परिवहन, बिजली, मोबाइल, बीमा, चिकित्सा और रोजमर्रा के सामान का खर्च भी बढ़ता जाता है। कई परिवारों में एक समय था जब वे भविष्य के लिए बचत कर पाते थे। आज वही परिवार बचत से अधिक इस बात की चिंता करते हैं कि अचानक आने वाला कोई बड़ा खर्च कैसे पूरा होगा। यह स्थिति आर्थिक सुरक्षा के लिए गंभीर संकेत है।
किसान की हालत भी सवालों के घेरे में
महंगाई की चर्चा में अक्सर उपभोक्ता का पक्ष सामने आता है, लेकिन किसान की स्थिति भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। खेत में बीज, खाद, कीटनाशक, डीजल, बिजली, मशीनरी और मजदूरी की लागत बढ़ती है। किसान की उपज बाजार तक पहुंचती है तो उसके सामने अलग चुनौतियां होती हैं।
विडंबना यह है कि उपभोक्ता को कई बार खाद्य वस्तुएं महंगी मिलती हैं, लेकिन किसान को उसका पर्याप्त लाभ नहीं मिलता। यदि खेत से बाजार तक पहुंचने के बीच कीमतों में बड़ा अंतर है, तो सवाल केवल महंगाई का नहीं, बल्कि वितरण व्यवस्था, बिचौलिया तंत्र, भंडारण, परिवहन और बाजार की संरचना का भी है।
किसान को लागत का उचित मूल्य मिले और उपभोक्ता को उचित कीमत पर वस्तु उपलब्ध हो, इस संतुलन को कायम करना किसी भी सरकार के लिए बड़ी चुनौती है।
बेरोजगारी और महंगाई का दोहरा दबाव
महंगाई तब और गंभीर हो जाती है जब रोजगार के अवसर पर्याप्त न हों। जिस व्यक्ति की आय स्थिर है, उसके लिए कीमतों में वृद्धि चिंता का विषय है; लेकिन जिसके पास नियमित रोजगार ही नहीं है, उसके लिए महंगाई जीवन की बुनियादी जरूरतों पर संकट बन सकती है। युवा डिग्रियां लेकर निकल रहे हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों बीत जाते हैं। निजी क्षेत्र में रोजगार है तो नौकरी की स्थिरता का प्रश्न सामने है। स्वरोजगार के लिए पूंजी और बाजार की चुनौती है।
ऐसे में युवाओं के सामने केवल नौकरी पाने का सवाल नहीं है, बल्कि ऐसी आय पाने का सवाल है जिससे वे सम्मानपूर्वक अपना जीवन चला सकें। महंगाई और बेरोजगारी जब साथ बढ़ते हैं तो उनका असर केवल अर्थव्यवस्था पर नहीं, समाज की मानसिकता पर भी पड़ता है।
दिखावे का उजाला कब तक?
आज विकास के नाम पर चमकती तस्वीरें दिखाना आसान है। चौड़ी सड़कें, बड़े एक्सप्रेसवे, ऊंची इमारतें, आधुनिक परिवहन व्यवस्था और बड़े निवेश निश्चित रूप से विकास की निशानियां हैं। इनसे देश की क्षमता बढ़ती है और रोजगार के अवसर भी पैदा हो सकते हैं। लेकिन विकास का दूसरा चेहरा भी देखना जरूरी है।
- क्या छोटे शहरों के युवाओं को पर्याप्त रोजगार मिला?
- क्या छोटे दुकानदार का कारोबार सुरक्षित है?
- क्या किसान की आय और लागत के बीच संतुलन है?
- क्या मध्यम वर्ग बचत कर पा रहा है?
- क्या गरीब परिवार बेहतर शिक्षा और स्वास्थ्य का खर्च उठा पा रहा है?
यदि इन सवालों के जवाब संतोषजनक नहीं हैं तो केवल चमकदार परियोजनाओं को विकास का अंतिम प्रमाण मान लेना अधूरा मूल्यांकन होगा। विकास का उजाला तभी सार्थक है, जब उसकी रोशनी घर-घर तक पहुंचे।
आंकड़ों से आगे बढ़कर देखना होगा आदमी को
अर्थव्यवस्था में आंकड़ों का अपना महत्व है। सकल घरेलू उत्पाद बढ़ना, विदेशी निवेश आना, निर्यात बढ़ना, शेयर बाजार में तेजी और बुनियादी ढांचे का विस्तार—ये सभी सकारात्मक संकेत हो सकते हैं। लेकिन आर्थिक विकास का अंतिम उद्देश्य आंकड़ों को सुंदर बनाना नहीं, बल्कि नागरिकों के जीवन को बेहतर बनाना है। किसी देश की अर्थव्यवस्था कितनी बड़ी है, यह महत्वपूर्ण है; लेकिन उससे भी महत्वपूर्ण है कि उस अर्थव्यवस्था में आम नागरिक की हिस्सेदारी कितनी है।
यदि आर्थिक वृद्धि का लाभ समाज के एक सीमित हिस्से तक अधिक तेजी से पहुंचता है और बड़ी आबादी की वास्तविक आय अपेक्षाकृत धीमी गति से बढ़ती है, तो आर्थिक असमानता बढ़ने का खतरा रहता है। इसलिए विकास के साथ वितरण और अवसर की समानता पर भी उतना ही ध्यान देना आवश्यक है।
उपभोक्ता की मजबूरी, बाजार की मनमानी
महंगाई का एक पहलू बाजार व्यवहार से भी जुड़ा है। कई बार वस्तुओं के दाम बढ़ने के पीछे वास्तविक लागत होती है, लेकिन कई बार मांग-आपूर्ति की स्थिति, जमाखोरी, कालाबाजारी, कृत्रिम कमी और अनुचित मुनाफाखोरी भी कीमतों को प्रभावित कर सकती है।
आम उपभोक्ता के पास हर बार यह पता लगाने का साधन नहीं होता कि कीमत क्यों बढ़ी है। वह दुकानदार के बताए दाम पर सामान खरीदने को मजबूर होता है। यही कारण है कि बाजार की निगरानी और उपभोक्ता संरक्षण की व्यवस्था मजबूत होना जरूरी है।
क्या केवल सरकार जिम्मेदार है?
महंगाई के लिए पूरी जिम्मेदारी किसी एक पक्ष पर डाल देना आसान है, लेकिन समस्या इससे कहीं अधिक जटिल है। अंतरराष्ट्रीय बाजार, कच्चे तेल की कीमतें, मौसम, उत्पादन, आपूर्ति श्रृंखला, वैश्विक संकट, मुद्रा विनिमय दर और घरेलू मांग—कई कारक कीमतों को प्रभावित करते हैं।
फिर भी सरकार की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण रहती है, क्योंकि नीति निर्माण, बाजार नियमन, कर व्यवस्था, खाद्य सुरक्षा, रोजगार नीति और सामाजिक सुरक्षा जैसे क्षेत्रों में सरकार के निर्णय सीधे आम नागरिक के जीवन को प्रभावित करते हैं।सरकार से अपेक्षा केवल यह नहीं होनी चाहिए कि वह महंगाई के आंकड़े नियंत्रित करे, बल्कि यह भी कि नागरिक की वास्तविक क्रय शक्ति बढ़े।
राहत घोषणाओं से आगे स्थायी समाधान
महंगाई के समय तत्काल राहत जरूरी होती है। लेकिन लंबे समय के समाधान के लिए उत्पादन बढ़ाना, कृषि को मजबूत करना, भंडारण और परिवहन व्यवस्था सुधारना, रोजगार के अवसर बढ़ाना, छोटे उद्योगों को प्रोत्साहित करना और बाजार में प्रतिस्पर्धा बनाए रखना भी आवश्यक है।
सिर्फ किसी एक वस्तु की कीमत घटा देने से समस्या समाप्त नहीं होगी। आम आदमी को ऐसी अर्थव्यवस्था चाहिए जिसमें उसकी आय नियमित रूप से बढ़े और जरूरी वस्तुओं की कीमतें उसकी आय की तुलना में अनियंत्रित गति से न बढ़ें।
असली विकास का पैमाना क्या हो?
किसी भी सरकार और व्यवस्था के लिए सबसे कठिन परीक्षा चुनावी भाषण या विज्ञापन नहीं, बल्कि आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी है। यदि माता-पिता बच्चों की अच्छी शिक्षा दिला पा रहे हैं, परिवार बिना कर्ज के जरूरी इलाज करा पा रहा है, युवा रोजगार या सम्मानजनक स्वरोजगार हासिल कर पा रहा है, किसान खेती को लाभकारी मान रहा है और मध्यम वर्ग भविष्य के लिए बचत कर पा रहा है, तभी विकास को जमीन पर महसूस किया जा सकता है। वरना बड़े-बड़े दावों और चमकदार प्रस्तुतियों के बीच एक बड़ा वर्ग खुद को उसी अंधेरे में खड़ा पाता रहेगा।
चिराग तले अंधेरा दूर करना होगा
देश की उपलब्धियों पर गर्व होना चाहिए। दुनिया में भारत की बढ़ती भूमिका निश्चित रूप से स्वागत योग्य है। लेकिन राष्ट्रीय गौरव और जनसरोकार एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। बल्कि सच्ची राष्ट्रीय प्रगति वही है जिसमें दुनिया भारत की आर्थिक ताकत की चर्चा करे और भारत का आम नागरिक भी अपने घर में उस ताकत का असर महसूस करे। दुनिया में बजते ढोल तभी सार्थक हैं, जब घर की रसोई में सुकून हो।
विकास की रोशनी तभी पूरी होगी, जब उसकी किरण सबसे कमजोर व्यक्ति तक पहुंचे। महंगाई की मार झेल रहे परिवार को केवल आंकड़ों का उजाला नहीं चाहिए, उसे अपनी जिंदगी में वास्तविक राहत चाहिए। आज आवश्यकता इस बात की है कि दिखावे के उजाले से आगे बढ़कर उस अंधेरे को देखा जाए जो चिराग के ठीक नीचे है।
क्योंकि किसी भी देश की असली तरक्की उसके बड़े-बड़े दावों में नहीं, बल्कि उस आम आदमी की मुस्कान में दिखाई देती है जो महीने का हिसाब लगाकर भी अगले महीने के लिए उम्मीद बचाकर रख सके। और यही वह कसौटी है जिस पर विकास, अर्थव्यवस्था और शासन तीनों की वास्तविक परीक्षा होती है।
-(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक)
