लेखक: विनोद कुमार झा
भूमिका: यह कहानी परिवार, रिश्तों, ईर्ष्या और आत्मबोध की एक मार्मिक यात्रा है। इसमें दिखाया गया है कि धन-संपत्ति मनुष्य को सुविधाएं तो दे सकती है, लेकिन यदि उसके साथ विनम्रता और प्रेम न हो तो वह रिश्तों के बीच ऐसी दीवार खड़ी कर देती है, जिसे गिराने में वर्षों लग जाते हैं।
गंगा के किनारे बसे एक शांत गांव में रामस्वरूप के तीन बेटे रहते थे रघुनाथ, महेश और सुरेश। तीनों भाइयों का बचपन एक ही आंगन में बीता था। उन्होंने साथ खेला, साथ पढ़ाई की और एक-दूसरे के सुख-दुख में हमेशा सहभागी बने रहे। गांव के लोग उनकी एकता की मिसाल देते थे।
समय का चक्र घूमता रहा। पिता रामस्वरूप और माता सावित्री देवी बूढ़े हो गए। तीनों बेटों की शादियां हो गईं और परिवार धीरे-धीरे अपने-अपने रास्तों पर आगे बढ़ने लगा। सबसे बड़े भाई रघुनाथ गांव में रहकर खेती-बाड़ी संभालने लगे। मंझले भाई महेश नौकरी की तलाश में शहर चले गए और वहीं अपने परिवार के साथ बस गए। सबसे छोटे भाई सुरेश ने गांव में ही व्यापार शुरू किया। भाग्य ने उसका ऐसा साथ दिया कि कुछ ही वर्षों में वह गांव के सबसे संपन्न लोगों में गिना जाने लगा।
धन के साथ सुरेश के जीवन में सुख-सुविधाएं तो आईं, लेकिन उसके स्वभाव में धीरे-धीरे परिवर्तन भी आने लगा। पहले जो भाई अपने बड़े और मंझले भाइयों का सम्मान करता था, अब उसे अपनी संपत्ति और सफलता पर घमंड होने लगा। उसे लगने लगा कि उसके दोनों भाई उससे कमतर हैं।
एक दिन गांव की चौपाल में कुछ लोग सुरेश की सफलता की प्रशंसा कर रहे थे। सुरेश गर्व से भर उठा। उसी समय किसी ने कहा, "भाई, आपकी तरक्की देखकर बहुत अच्छा लगता है। आपके बड़े भाई भी बहुत मेहनती हैं।"
यह सुनकर सुरेश के चेहरे पर मुस्कान फीकी पड़ गई। उसने तिरस्कार भरे स्वर में कहा, "अरे, उनकी क्या बात करते हो? अगर उनमें समझ होती तो आज मेरी तरह सफल होते।"
उसकी यह बात सुनकर वहां बैठे कुछ लोग चुप हो गए। खबर धीरे-धीरे रघुनाथ तक पहुंची। उन्होंने कुछ नहीं कहा। बस मुस्कुराकर बोले, "छोटा है, समझ जाएगा।"
लेकिन सुरेश की कटुता यहीं नहीं रुकी। उसने गांव में अपने लिए एक भव्य मकान बनवाया। गृह प्रवेश के अवसर पर पूरे गांव को निमंत्रण दिया गया, लेकिन अपने दोनों भाइयों को बुलाने में उसने कोई रुचि नहीं दिखाई। लोगों ने पूछा भी कि भाइयों को निमंत्रण भेजा गया है या नहीं। सुरेश ने हंसते हुए कहा, "जिसे आना होगा, वह बिना बुलाए भी आ जाएगा।"
यह बात जब महेश तक शहर में पहुंची तो उनके मन को गहरी ठेस लगी। फिर भी उन्होंने अपने बड़े भाई से कहा, "भैया, आखिर वह हमारा छोटा भाई है। उसके व्यवहार से हमें अपने संस्कार नहीं बदलने चाहिए।" रघुनाथ ने सहमति में सिर हिलाया और कहा, "रिश्ते टूटते नहीं, लोग उन्हें छोड़ देते हैं। हम अपने रिश्ते नहीं छोड़ेंगे।"
वर्ष बीतते गए। सुरेश की संपत्ति बढ़ती गई। उसने कई जमीनें खरीद लीं, नया कारोबार शुरू कर दिया और समाज में उसकी प्रतिष्ठा भी बढ़ने लगी। लेकिन जैसे-जैसे उसकी तिजोरी भरती गई, वैसे-वैसे उसका मन रिश्तों से खाली होता गया।
उधर रघुनाथ अपनी खेती में संतुष्ट थे। महेश शहर में नौकरी करते हुए अपने बच्चों की पढ़ाई पर ध्यान दे रहे थे। दोनों भाइयों के बीच प्रेम और सम्मान पहले की तरह बना रहा।
एक वर्ष गांव में भयंकर बाढ़ आ गई। कई किसानों की फसलें नष्ट हो गईं। रघुनाथ का भी बड़ा नुकसान हुआ। गांव के लोग सहायता के लिए आगे आए। किसी ने सुझाव दिया कि सुरेश अपने बड़े भाई की मदद कर सकता है।
लेकिन सुरेश ने साफ शब्दों में कहा, "व्यापार भावनाओं से नहीं चलता। यदि मदद चाहिए तो कर्ज ले सकते हैं।" यह सुनकर गांव वाले भी हैरान रह गए। रघुनाथ ने फिर भी कोई शिकायत नहीं की। उन्होंने कहा, "ईश्वर ने चाहा तो सब ठीक हो जाएगा।" समय ने एक और करवट ली।
एक दिन अचानक सुरेश के व्यापार में भारी नुकसान हो गया। जिस साझेदार पर उसने आंख बंद करके विश्वास किया था, वह करोड़ों रुपये लेकर फरार हो गया। बैंक का कर्ज बढ़ गया। बाजार में उसकी साख गिरने लगी। जिन लोगों की भीड़ उसके घर के बाहर लगी रहती थी, वे धीरे-धीरे गायब होने लगे।
सुरेश ने पहली बार जीवन में असहायता का अनुभव किया।उसकी रातों की नींद उड़ गई। तनाव बढ़ता गया। परिवार भी चिंता में डूब गया। जिन मित्रों पर उसे गर्व था, उन्होंने भी दूरी बना ली।
ऐसे कठिन समय में एक दिन उसके दरवाजे पर दस्तक हुई।दरवाजा खोला तो सामने बड़े भाई रघुनाथ खड़े थे। सुरेश आश्चर्य से उन्हें देखता रह गया।
रघुनाथ ने मुस्कुराकर पूछा, "कैसे हो छोटे?"
सुरेश की आंखें झुक गईं। वर्षों का अहंकार मानो पल भर में टूट गया। रघुनाथ भीतर आए और बोले, "सुना है कुछ परेशानी चल रही है। सोचा, अपने भाई से मिल आऊं।" सुरेश की आंखें नम हो गईं। वह कुछ कह नहीं पाया।
उसी शाम शहर से महेश भी आ पहुंचे। उन्होंने आते ही छोटे भाई को गले लगा लिया। महेश बोले, "मुश्किल समय में अपने ही काम आते हैं। इसलिए हम दोनों आ गए।"
सुरेश फूट-फूटकर रो पड़ा। उसने कांपती आवाज में कहा, "भैया, मैंने आप दोनों के साथ बहुत गलत किया। मैंने धन के घमंड में रिश्तों को छोटा समझ लिया। मुझे माफ कर दीजिए।"
रघुनाथ ने उसके कंधे पर हाथ रखते हुए कहा, "गलती इंसान से होती है। लेकिन जो अपनी गलती स्वीकार कर ले, वह पहले से बेहतर इंसान बन जाता है।" महेश ने कहा, "धन की चमक कभी-कभी आंखों पर परदा डाल देती है। अच्छा हुआ कि यह परदा हट गया।"
उस दिन तीनों भाई वर्षों बाद एक साथ बैठे। बचपन की बातें हुईं, माता-पिता की यादें ताजा हुईं और रिश्तों की गर्माहट फिर लौट आई।
आने वाले महीनों में दोनों भाइयों ने सुरेश का हर संभव सहयोग किया। रघुनाथ ने अपनी बचत से मदद की। महेश ने अपने परिचितों के माध्यम से व्यापार को दोबारा खड़ा करने में सहयोग दिया।
धीरे-धीरे सुरेश की स्थिति सुधरने लगी। लेकिन इस बार उसके जीवन की सबसे बड़ी कमाई धन नहीं, बल्कि अपने भाइयों का प्रेम था।
एक दिन गांव में एक पारिवारिक समारोह आयोजित हुआ। वहां पूरे गांव के सामने सुरेश खड़ा हुआ और बोला "मैंने जीवन में बहुत धन कमाया, लेकिन रिश्तों की कीमत समझने में देर कर दी। मैंने अपने भाइयों से नफरत की, उन्हें छोटा समझा, उनका अपमान किया। फिर भी जब संकट आया तो सबसे पहले यही लोग मेरे साथ खड़े हुए। आज मैं समझ गया हूं कि धन से बड़ा कोई खजाना है तो वह परिवार का प्रेम है।" सभा में सन्नाटा छा गया। कई लोगों की आंखें नम हो गईं।
रघुनाथ ने आगे बढ़कर छोटे भाई को गले लगा लिया। महेश भी उनके साथ आ मिले। वर्षों से रिश्तों पर पड़ी नफरत की चादर उस क्षण पूरी तरह हट चुकी थी।
सूरज अस्त होने को था। आकाश सुनहरी रोशनी से भर गया था। ऐसा लग रहा था मानो प्रकृति भी इस मिलन की साक्षी बनकर मुस्कुरा रही हो।
उस दिन गांव के लोगों ने एक महत्वपूर्ण सीख पाई—धन, वैभव और सफलता जीवन को आसान बना सकते हैं, लेकिन रिश्तों की जगह कभी नहीं ले सकते। नफरत की चादर चाहे कितनी ही मोटी क्यों न हो, सच्चे प्रेम और अपनत्व की गर्मी उसे एक दिन अवश्य हटा देती है।
शिक्षा: परिवार का प्रेम और भाईचारा संसार की सबसे बड़ी संपत्ति है। धन का अहंकार क्षणिक होता है, लेकिन रिश्तों की नींव प्रेम, सम्मान और त्याग पर टिकी होती है। जो व्यक्ति रिश्तों को संजोकर रखता है, वही वास्तव में जीवन का सबसे धनी इंसान होता है।

