अस्पताल से महलों तक... सुख-दुःख के परिणाम के बीच चलता जीवन

 - जीवन के सुख-दुःख, अस्पताल की बेबसी और महलों की चमक के बीच मनुष्य की वास्तविकता

विनोद कुमार झा 

जीवन एक ऐसा सफर है, जिसकी राह कभी फूलों से सजी दिखाई देती है तो कभी कांटों से भरी। कभी इंसान अस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए एक-एक सांस को उम्मीद की तरह पकड़कर दिन-रात गुजारता है, तो कभी वही जीवन महलों की चकाचौंध, ऐश्वर्य और सुख-सुविधाओं के बीच बीतता है। यही जीवन का सबसे बड़ा सच है , यह किसी एक परिस्थिति में हमेशा के लिए ठहरता नहीं। सुख आता है तो दुःख भी दस्तक देता है और दुःख के अंधेरे के बाद सुख की किरण भी दिखाई देती है।

मनुष्य अक्सर अपनी वर्तमान परिस्थिति को ही संपूर्ण सत्य मान बैठता है। जब जीवन में सुख होता है तो उसे लगता है कि इससे बेहतर कुछ हो ही नहीं सकता और जब दुःख आता है तो लगता है कि शायद अब इससे बाहर निकलने का कोई रास्ता नहीं। लेकिन समय अपनी गति से चलता रहता है। वह न किसी के सुख पर रुकता है और न किसी के दुःख में ठहरता है।

कभी अस्पताल के किसी वार्ड में रात के सन्नाटे को देखिए। वहां जिंदगी का अर्थ बदल जाता है। चमकदार कपड़े, बड़ी गाड़ियां, ऊंचे पद और महंगे मकान सब पीछे छूट जाते हैं। वहां सबसे कीमती चीज होती है स्वास्थ्य और एक सांस। किसी बिस्तर पर पड़ा मरीज अपने जीवन के लिए संघर्ष कर रहा होता है। उसके आसपास खड़े परिजन डॉक्टर की हर बात को उम्मीद और आशंका के बीच सुनते हैं। घड़ी की सुइयां चलती रहती हैं, लेकिन उनके लिए समय जैसे थम जाता है।

वहीं दूसरी ओर किसी आलीशान महल में रोशनी जगमगा रही होती है। महंगे झूमर, आलीशान कमरे, शानदार भोजन और तमाम सुविधाओं के बीच लोग अपनी जिंदगी जी रहे होते हैं। लेकिन वहां भी जीवन की अपनी चुनौतियां होती हैं। धन सुविधा दे सकता है, पर हर चिंता का समाधान नहीं। महल की दीवारें बीमारी, अकेलेपन, चिंता और मृत्यु के भय को हमेशा बाहर नहीं रख सकतीं। यही विरोधाभास जीवन को समझने की सबसे बड़ी कुंजी है।

अस्पताल का बिस्तर सिखाता है जीवन का असली मूल्य

अस्पताल में बिताई गई एक रात इंसान को जिंदगी के कई ऐसे पाठ पढ़ा देती है, जिन्हें वर्षों की किताबें भी नहीं सिखा पातीं।वहां कोई व्यक्ति करोड़पति हो सकता है, कोई सामान्य परिवार से आया हुआ, कोई अधिकारी हो सकता है और कोई मजदूर। लेकिन बीमारी के सामने कई बार सबकी पहचान एक जैसी हो जाती है। सभी को इलाज चाहिए, सभी को डॉक्टर की जरूरत होती है और सभी अपने जीवन की सलामती की दुआ करते हैं।

अस्पताल की खिड़की से बाहर आती सुबह की पहली किरण किसी पुरस्कार से कम नहीं लगती। किसी मरीज के चेहरे पर लौटती मुस्कान परिवार के लिए दुनिया की सबसे बड़ी दौलत बन जाती है। वहां समझ आता है कि स्वस्थ शरीर कितना बड़ा वरदान है।

हम सामान्य दिनों में छोटी-छोटी बातों को लेकर परेशान होते हैं। किसी ने हमारी बात नहीं मानी, किसी ने आलोचना कर दी, नौकरी में मनचाही तरक्की नहीं मिली, व्यापार में अपेक्षित लाभ नहीं हुआ या किसी रिश्ते में मनमुटाव हो गया। लेकिन जब जीवन और मृत्यु के बीच खड़ा कोई व्यक्ति अस्पताल के बिस्तर पर होता है, तब उसे समझ आता है कि जिंदगी में वास्तव में महत्वपूर्ण क्या है। तब शिकायतें छोटी लगने लगती हैं और सांसें बड़ी।

महलों की चमक और मन का अंधेरा

दुनिया की नजर में महल सुख का प्रतीक हो सकता है। लेकिन हर महल के भीतर सुख हो, यह जरूरी नहीं। कई बार बड़ी संपत्ति के बीच रहने वाला व्यक्ति भी भीतर से बेहद अकेला होता है। उसके पास सुविधाएं होती हैं, लेकिन अपनापन नहीं। उसके पास पैसा होता है, लेकिन चैन की नींद नहीं। उसके पास सुरक्षा होती है, लेकिन मन में असुरक्षा बनी रहती है।

इसके विपरीत किसी छोटे से घर में रहने वाला परिवार सीमित साधनों के बावजूद हंसी-खुशी जीवन गुजार सकता है। रोटी साधारण हो सकती है, मगर उसे बांटकर खाने वाले हाथों में प्रेम हो तो वह भोजन किसी दावत से कम नहीं लगता। इसलिए सुख का संबंध केवल संपत्ति से नहीं है। सुख मन की अवस्था भी है। महल में रहने वाला हर व्यक्ति सुखी हो, यह जरूरी नहीं और झोपड़ी में रहने वाला हर व्यक्ति दुखी हो, यह भी जरूरी नहीं।

सुख और दुःख जीवन के दो पहिए

जीवन को यदि रथ माना जाए तो सुख और दुःख उसके दो पहिए हैं। केवल सुख हो तो मनुष्य जीवन की कीमत भूल सकता है और केवल दुःख हो तो उसके भीतर निराशा घर कर सकती है।

दुःख इंसान को मजबूत बनाता है। वह उसे अपनी कमजोरियों से परिचित कराता है। वह बताता है कि कौन अपना है और कौन केवल परिस्थितियों का साथी। वहीं सुख मनुष्य को यह अवसर देता है कि वह अपनी खुशियों को दूसरों के साथ बांटे।सुख का वास्तविक अर्थ तभी समझ आता है जब इंसान दुःख से होकर गुजर चुका हो।

जिस व्यक्ति ने बीमारी के दिनों में अस्पताल की छत को घंटों निहारा हो, उसके लिए स्वस्थ होकर घर लौटना किसी उत्सव से कम नहीं होता। जिसने आर्थिक संकट देखा हो, उसके लिए सामान्य आय भी बड़ी उपलब्धि बन जाती है। जिसने अपनों को खोया हो, वह रिश्तों की कीमत दूसरों से अधिक समझता है। दुःख कई बार वह शिक्षक बन जाता है, जिसे जीवन ने बिना मांगे हमारे सामने खड़ा कर दिया होता है।

समय किसी का स्थायी नहीं होता

जीवन का सबसे बड़ा नियम है परिवर्तन। आज जो व्यक्ति शिखर पर है, कल परिस्थितियां उसे नीचे ला सकती हैं। आज जो व्यक्ति कठिनाइयों में घिरा है, कल वही सफलता के शिखर पर पहुंच सकता है।

इतिहास ऐसे उदाहरणों से भरा पड़ा है, जहां सामान्य परिस्थितियों से निकलकर लोगों ने असाधारण सफलता हासिल की और ऐसे भी उदाहरण हैं जहां अपार वैभव रखने वाले लोग परिस्थितियों के थपेड़ों से टूट गए। इसलिए सफलता के समय अहंकार और असफलता के समय निराशा दोनों से बचना जरूरी है। सुख में विनम्र रहना और दुःख में धैर्य रखना ही जीवन की वास्तविक समझ है।

अस्पताल की रात और महल की रात

एक तरफ अस्पताल की रात है, जहां किसी परिवार की आंखों में चिंता है। कोई अपने पिता के ठीक होने की प्रार्थना कर रहा है, कोई मां के लिए दुआ मांग रहा है, कोई बच्चे की सांसों को गिन रहा है। मोबाइल की स्क्रीन पर डॉक्टर के फोन का इंतजार हो रहा है।

दूसरी तरफ किसी महल की रात है, जहां संगीत बज रहा है, रोशनी चमक रही है और लोग उत्सव मना रहे हैं। दोनों जगह रात एक ही है। चांद भी वही है। आसमान भी वही है। समय भी वही है। लेकिन परिस्थितियां अलग हैं। यही जीवन का रहस्य है एक ही क्षण में दुनिया के किसी हिस्से में खुशी का उत्सव हो सकता है और किसी दूसरे घर में मातम का सन्नाटा। इसलिए अपने सुख पर इतराने और किसी दूसरे के दुःख को छोटा समझने का कोई औचित्य नहीं।

दुःख में साथ खड़ा होना ही मनुष्यता है

आज के दौर में मनुष्य के पास साधन बढ़े हैं, लेकिन एक-दूसरे के लिए समय कम हुआ है। हम सोशल मीडिया पर किसी की खुशी में ‘लाइक’ कर देते हैं, लेकिन उसके दुःख में उसके पास बैठने का समय नहीं निकाल पाते।

जब कोई अस्पताल में भर्ती होता है तो उसे दवाइयों के साथ अपनेपन की भी जरूरत होती है। कई बार किसी का हाथ पकड़ लेना, दो शब्द हिम्मत के कह देना और यह विश्वास दिलाना कि ‘तुम अकेले नहीं हो’, दवा से भी बड़ी ताकत बन जाता है। मनुष्य की पहचान उसके पास कितनी संपत्ति है, इससे नहीं होती। उसकी पहचान इस बात से होती है कि उसने किसी दूसरे के दुःख में कितना साथ दिया।

महल में बैठकर दूसरों की तकलीफ पर चर्चा करना आसान है, लेकिन अस्पताल के बिस्तर के पास बैठकर किसी की आंखों में उम्मीद जगाना ही सच्ची इंसानियत है।

जिंदगी का सबसे बड़ा धन संतोष

मनुष्य की इच्छाओं का कोई अंत नहीं। आज घर है तो बड़ा घर चाहिए। बड़ा घर मिल गया तो और बड़ी गाड़ी चाहिए। गाड़ी मिल गई तो अधिक संपत्ति चाहिए। संपत्ति मिल गई तो प्रतिष्ठा चाहिए। प्रतिष्ठा मिल गई तो सत्ता और प्रभाव चाहिए।

इस दौड़ में कई बार इंसान यह भूल जाता है कि जीवन सीमित है। जिस बिस्तर पर आज वह आराम से सो रहा है, कल उसी पर किसी अस्पताल में उसे जिंदगी की कीमत समझनी पड़ सकती है। इसलिए जीवन में महत्वाकांक्षा जरूरी है, लेकिन संतोष उससे भी ज्यादा जरूरी है। संतोष का अर्थ यह नहीं कि इंसान आगे बढ़ना छोड़ दे। इसका अर्थ है कि आगे बढ़ते हुए वह वर्तमान की खुशियों को न भूले।

परिवार के साथ बैठना, माता-पिता का हाल पूछना, बच्चों के साथ समय बिताना, मित्र की परेशानी सुनना और जरूरतमंद की मदद करना ये ऐसी खुशियां हैं जिन्हें खरीदने के लिए किसी बाजार में कोई कीमत तय नहीं होती।

जीवन हमें रोज एक नया अवसर देता है

हर सुबह अपने साथ एक नया अवसर लेकर आती है। यदि कल असफलता मिली तो आज फिर प्रयास किया जा सकता है। यदि कल किसी से संबंध खराब हुआ तो आज उसे सुधारा जा सकता है। यदि कल किसी की मदद नहीं कर पाए तो आज किसी जरूरतमंद के काम आ सकते हैं।

जीवन की खूबसूरती इसी में है कि जब तक सांस है, तब तक संभावना है। अस्पताल का मरीज भी स्वस्थ होकर घर लौटने की उम्मीद रखता है। संघर्ष करता हुआ व्यक्ति भी सफलता का सपना देखता है। किसान सूखे खेत में बारिश की उम्मीद करता है। मां अपने बच्चे के भविष्य की चिंता के बावजूद उसके उज्ज्वल जीवन का सपना देखती है। उम्मीद ही वह रोशनी है जो सबसे घने अंधेरे में भी रास्ता दिखाती है।

 जीवन को जीना सीखिए, केवल काटना नहीं

अस्पताल से महलों तक, झोपड़ी से ऊंची इमारतों तक, बीमारी से स्वास्थ्य तक और दुःख से सुख तक मनुष्य का जीवन लगातार बदलता रहता है।

कभी हमारे पास बहुत कुछ होता है और कभी बहुत कम। कभी लोग हमारे आसपास होते हैं और कभी भीड़ में भी अकेलापन महसूस होता है। कभी आंखों में खुशी के आंसू होते हैं तो कभी दुःख के लेकिन इन सभी परिस्थितियों के बीच एक चीज हमारे हाथ में रहती है हमारा दृष्टिकोण। इसलिए सुख मिले तो विनम्र रहिए और दुःख मिले तो धैर्य रखिए। सफलता मिले तो दूसरों को साथ लेकर चलिए और असफलता मिले तो खुद को टूटने मत दीजिए। किसी को अस्पताल में देखिए तो उसके दुःख को समझिए और किसी को महल में देखिए तो उसकी जिंदगी को केवल उसकी संपत्ति से मत आंकिए।

 जिंदगी का अंतिम हिसाब महलों की ऊंचाई, बैंक खातों की संख्या या संपत्ति के विस्तार से नहीं होता। अंत में यही मायने रखता है कि हमने कितनी जिंदगी जी, कितने दिलों में जगह बनाई और कितने लोगों के कठिन समय में उनके साथ खड़े रहे।

जीवन सुख और दुःख के परिणामों के बीच चलने वाली एक लंबी यात्रा है। कभी रास्ते में धूप मिलती है, कभी छांव। कभी कदमों के नीचे फूल होते हैं, कभी कांटे। समझदार वही है जो फूल मिलने पर अहंकार नहीं करता और कांटे मिलने पर रास्ता छोड़ता नहीं क्योंकि समय बदलता है, परिस्थितियां बदलती हैं और जीवन भी बदलता रहता है बस मनुष्य को हर परिस्थिति में इंसान बने रहना चाहिए।

- लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक 

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