हमदर्दी या राजनीति?

-छात्र आंदोलनों की आड़ में सियासी अवसरवाद का सवाल

विनोद कुमार झा 

भारत में छात्र आंदोलनों का एक लंबा इतिहास रहा है। स्वतंत्रता संग्राम से लेकर शिक्षा, रोजगार, आरक्षण और परीक्षा व्यवस्था जैसे मुद्दों तक, युवाओं ने समय-समय पर अपनी आवाज बुलंद की है। लोकतंत्र में यह उनका अधिकार भी है और जिम्मेदारी भी। किंतु पिछले कुछ वर्षों में एक प्रवृत्ति तेजी से उभरकर सामने आई है, जिसमें छात्रों की वास्तविक समस्याओं और आंदोलनों के बीच राजनीतिक दल अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश करते दिखाई देते हैं। इससे मूल मुद्दा अक्सर पीछे छूट जाता है और राजनीति केंद्र में आ जाती है।

हाल ही में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में कथित पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं को लेकर दिल्ली के जंतर-मंतर पर छात्रों द्वारा विरोध प्रदर्शन किया गया। हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर सड़कों पर उतरे। उनकी मांगें स्पष्ट थीं परीक्षा प्रक्रिया में पारदर्शिता, दोषियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई और भविष्य में ऐसी घटनाओं की रोकथाम। यह एक ऐसा विषय था जो सीधे युवाओं के भविष्य और देश की परीक्षा प्रणाली की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ था। लेकिन जैसे-जैसे आंदोलन ने गति पकड़ी, राजनीतिक दलों की सक्रियता भी बढ़ती गई। विभिन्न दलों के नेताओं ने प्रदर्शन स्थलों पर पहुंचकर छात्रों के प्रति समर्थन और हमदर्दी व्यक्त की। कुछ नेताओं ने छात्रों के प्रतिनिधिमंडलों को संसद भवन तक ले जाने का प्रयास किया, तो कुछ ने सरकार के खिलाफ राजनीतिक अभियान चलाने का अवसर तलाशा। सवाल यह है कि क्या यह वास्तव में छात्रों के हित में था, या फिर यह एक संवेदनशील मुद्दे पर राजनीतिक लाभ लेने की कोशिश थी?

लोकतंत्र में किसी भी नागरिक समूह को राजनीतिक समर्थन मिलना अस्वाभाविक नहीं है। विपक्ष का दायित्व भी है कि वह जनता की समस्याओं को सरकार के सामने रखे। लेकिन जब समर्थन और सहानुभूति का उद्देश्य समस्या के समाधान के बजाय राजनीतिक लाभ प्राप्त करना बन जाए, तब स्थिति चिंताजनक हो जाती है। छात्रों का आंदोलन मूलतः परीक्षा प्रणाली में सुधार और न्याय की मांग को लेकर था। उनकी चिंता अपने भविष्य को लेकर थी। वे यह जानना चाहते थे कि वर्षों की मेहनत के बाद यदि परीक्षा प्रणाली ही भरोसेमंद नहीं रहेगी, तो उनके सपनों का क्या होगा। लेकिन जब आंदोलन के केंद्र में राजनीतिक बयानबाजी आने लगे, तब वास्तविक मुद्दा धीरे-धीरे धुंधला पड़ने लगता है।

यह पहली बार नहीं है जब ऐसा हुआ हो। भारतीय राजनीति का इतिहास इस प्रकार के उदाहरणों से भरा पड़ा है। चाहे वह रोजगार से जुड़े आंदोलन हों, किसान आंदोलन हों, आरक्षण संबंधी प्रदर्शन हों या शिक्षा व्यवस्था के खिलाफ विरोध—लगभग हर बड़े आंदोलन में राजनीतिक दलों ने अपनी उपस्थिति दर्ज कराई है। कई बार यह समर्थन सकारात्मक भी साबित हुआ है, लेकिन अनेक अवसरों पर आंदोलनों का राजनीतिकरण उनकी मूल भावना को कमजोर करता दिखाई दिया है। सबसे बड़ा प्रश्न राजनीतिक दलों की विश्वसनीयता का है। जो दल आज परीक्षा प्रणाली में सुधार और पेपर लीक के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, वे भी कभी न कभी सत्ता में रहे हैं। केंद्र में हों या राज्यों में, विभिन्न राजनीतिक दलों के शासनकाल में भी परीक्षा घोटाले, भर्ती अनियमितताएं और पेपर लीक जैसी घटनाएं सामने आती रही हैं।

उत्तर प्रदेश से लेकर बिहार, राजस्थान, मध्य प्रदेश और अन्य राज्यों तक, विभिन्न सरकारों के कार्यकाल में ऐसी घटनाओं के उदाहरण मौजूद हैं। इसलिए जब कोई दल केवल विरोध के लिए विरोध करता है और अपने अतीत की जिम्मेदारियों को भूल जाता है, तब जनता के मन में स्वाभाविक रूप से सवाल उठते हैं। राजनीति में स्मृति अक्सर चयनात्मक हो जाती है। विपक्ष में रहते हुए जो मुद्दा लोकतंत्र की रक्षा का प्रतीक बन जाता है, वही सत्ता में आने पर प्रशासनिक चुनौती के रूप में प्रस्तुत किया जाता है। यही कारण है कि जनता अब केवल नारों और बयानों से संतुष्ट नहीं होती, बल्कि राजनीतिक दलों के अतीत और वर्तमान दोनों का मूल्यांकन करती है।

क्या आंदोलनों को और भड़काना उचित है? किसी भी संवेदनशील मुद्दे पर जनप्रतिनिधियों की जिम्मेदारी केवल समर्थन देने तक सीमित नहीं होती। उनसे अपेक्षा की जाती है कि वे समाधान का रास्ता भी सुझाएं। यदि कोई आंदोलन उग्र होने की आशंका रखता है, तो जनप्रतिनिधियों का दायित्व स्थिति को शांतिपूर्ण और संवादपरक बनाए रखना होता है।

लोकतंत्र में विरोध प्रदर्शन आवश्यक हैं, लेकिन उन्हें टकराव का माध्यम बनाने के बजाय संवाद का पुल बनाना चाहिए। यदि राजनीतिक दल छात्रों के आक्रोश को केवल सरकार के खिलाफ हथियार के रूप में इस्तेमाल करने लगें, तो इससे समस्या का समाधान नहीं निकलता। उलटे समाज में तनाव और अविश्वास बढ़ता है। एक जिम्मेदार राजनीतिक नेतृत्व वह होता है जो छात्रों को आश्वस्त करे, सरकार पर जवाबदेही सुनिश्चित करने का दबाव बनाए और साथ ही आंदोलन को शांतिपूर्ण दिशा देने का प्रयास करे। लेकिन यदि उद्देश्य केवल मीडिया की सुर्खियां और राजनीतिक लाभ हो, तो आंदोलन अपने मूल उद्देश्य से भटक सकता है। 

पेपर लीक और परीक्षा अनियमितताओं का सबसे बड़ा नुकसान युवाओं के मनोबल पर पड़ता है। लाखों छात्र वर्षों तक तैयारी करते हैं। वे अपने परिवारों की उम्मीदों और अपने सपनों को लेकर संघर्ष करते हैं। जब किसी परीक्षा का प्रश्नपत्र लीक होता है या भर्ती प्रक्रिया विवादों में घिरती है, तो केवल एक परीक्षा प्रभावित नहीं होती, बल्कि युवाओं का व्यवस्था पर भरोसा भी कमजोर पड़ता है। ऐसी स्थिति में राजनीतिक दलों को प्रतिस्पर्धी राजनीति से ऊपर उठकर एक साझा राष्ट्रीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए। शिक्षा और रोजगार जैसे विषय किसी दल विशेष के नहीं, बल्कि पूरे देश के हैं। इन पर राजनीति नहीं, नीति की आवश्यकता है।

समस्या का स्थायी समाधान केवल विरोध प्रदर्शनों या राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप में नहीं है। इसके लिए परीक्षा प्रणाली को तकनीकी रूप से अधिक सुरक्षित बनाना होगा। पेपर लीक मामलों की त्वरित जांच, दोषियों के खिलाफ कठोर दंड, भर्ती एजेंसियों की जवाबदेही और डिजिटल सुरक्षा तंत्र को मजबूत करना आवश्यक है। साथ ही, सभी राजनीतिक दलों को इस विषय पर एक साझा संकल्प लेना चाहिए कि वे छात्रों के मुद्दों का उपयोग केवल चुनावी लाभ के लिए नहीं करेंगे। संसद और विधानसभाओं में इस विषय पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए, ताकि ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकी जा सके।

छात्रों की पीड़ा वास्तविक है, उनका आक्रोश जायज है और उनकी मांगें भी उचित हैं। लेकिन उनकी समस्याओं को राजनीतिक मंच बनाकर सत्ता और विपक्ष की प्रतिस्पर्धा का हिस्सा बना देना लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं कहा जा सकता। हमदर्दी तभी सार्थक है जब वह समाधान की दिशा में ले जाए। यदि समर्थन केवल राजनीतिक उपस्थिति दर्ज कराने और लाभ लेने का माध्यम बन जाए, तो वह हमदर्दी नहीं, अवसरवाद कहलाता है। देश के युवाओं को राजनीति का मोहरा नहीं, बल्कि राष्ट्र निर्माण का भागीदार माना जाना चाहिए। उनकी आवाज को सुनना जरूरी है, लेकिन उससे भी अधिक जरूरी है कि उस आवाज को राजनीतिक शोर में दबने न दिया जाए। छात्र आंदोलन का केंद्र छात्र ही रहें, राजनीति नहीं यही लोकतंत्र और युवाओं, दोनों के हित में होगा।

(लेखक स्वतंत्र एवं सामाजिक विश्लेषक )

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