विनोद कुमार झा
भाद्रपद मास की अमावस्या सनातन धर्म की उन पवित्र तिथियों में मानी जाती है, जिनका संबंध केवल व्रत और उपवास से नहीं, बल्कि प्रकृति, देव आराधना, पितृ स्मरण और वैदिक परंपराओं से भी जुड़ा है। इसी अमावस्या को कुशोत्पाटिनी अमावस्या, कुशाग्रहणी अमावस्या या कुशी अमावस्या के नाम से जाना जाता है। वर्ष 2026 में अमावस्या तिथि 10 सितंबर को प्रारंभ होकर 11 सितंबर की सुबह तक रहेगी। उदया तिथि के अनुसार शुक्रवार, 11 सितंबर को कुशाग्रहणी अमावस्या का धार्मिक महत्व माना जा रहा है।
इस दिन का सबसे विशिष्ट विधान है वर्षभर के धार्मिक कार्यों के लिए पवित्र कुशा घास का संग्रह करना। सनातन परंपरा में कुशा को केवल एक सामान्य घास नहीं माना गया, बल्कि इसे वैदिक कर्मकांड का पवित्र अंग माना गया है। श्राद्ध, तर्पण, यज्ञ, हवन, संकल्प और अनेक धार्मिक अनुष्ठानों में कुशा का प्रयोग किया जाता है। इसलिए भाद्रपद अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने की परंपरा को विशेष महत्व प्राप्त है।
कुश उखाड़ने का मुहूर्त और शास्त्रीय विधि : कुशोत्पाटिनी अमावस्या के दिन कुश ग्रहण करने के लिए प्रातःकाल का समय सबसे उपयुक्त माना गया है। 11 सितंबर 2026 को अमावस्या तिथि सूर्योदय के समय विद्यमान रहेगी और सुबह 8:56 बजे तक रहेगी। इसलिए सूर्योदय के बाद और अमावस्या तिथि समाप्त होने से पहले, स्नान आदि से निवृत्त होकर कुश ग्रहण करना श्रेष्ठ माना जा सकता है। उपलब्ध पंचांग गणना के अनुसार दिल्ली-एनसीआर में सूर्योदय लगभग सुबह 6:05 बजे है, इसलिए सुबह 6:05 बजे से 8:56 बजे तक कुश उखाड़ने का विशेष अवसर रहेगा।
ध्यान रहे कि अलग-अलग पंचांगों और स्थान के अनुसार सूर्योदय में कुछ मिनट का अंतर हो सकता है। इसलिए स्थानीय पंचांग को प्राथमिकता देना उचित है।
कुश उखाड़ने से पहले पढ़ें यह श्लोक : कुश को उखाड़ने से पहले स्वच्छ होकर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके कुश का श्रद्धापूर्वक स्पर्श करें और यह प्रार्थना पढ़ें:-
ॐ विरञ्चिना सहोत्पन्नः परमेष्ठिनिसर्गजः।
नुद सर्वाणि पापानि दर्भ! स्वस्तिकरो भव॥
भावार्थ : हे दर्भ! तुम ब्रह्मा से उत्पन्न और परमेष्ठी से संबंधित पवित्र वनस्पति हो। मेरे सभी पापों और अशुभताओं को दूर करो तथा मेरे लिए मंगलकारी बनो।
इसके बाद कुश की महत्ता का स्मरण करते हुए यह श्लोक भी पढ़ा जा सकता है :-
कुशाग्रे वसते रुद्रः, कुशमध्ये तु केशवः।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा, कुशान् मे देहि मेदिनी॥
भावार्थ : कुशा के अग्रभाग में भगवान रुद्र, मध्य में भगवान केशव और मूल भाग में भगवान ब्रह्मा का निवास माना गया है। हे धरती माता! मुझे पवित्र कुश प्रदान करें।
धार्मिक विधि के अनुसार मंत्रोच्चार के बाद “ॐ हूँ फट्” का उच्चारण करते हुए कुश को दाहिने हाथ से जड़ सहित ग्रहण करने की परंपरा बताई गई है। कुश को यथासंभव एक ही बार में उखाड़ना चाहिए; इसे अनावश्यक रूप से काटना नहीं चाहिए।
कुश में देवताओं का निवास मानने की परंपरा : धार्मिक मान्यता के अनुसार कुशा की पवित्रता का संबंध देवत्व से जोड़ा गया है। कुश ग्रहण करते समय प्रचलित प्रार्थना है:-
“कुशाग्रे वसते रुद्रः, कुश मध्ये तु केशवः।
कुशमूले वसेद् ब्रह्मा, कुशान् मे देहि मेदिनी॥”
अर्थात कुशा के अग्रभाग में भगवान रुद्र, मध्य भाग में भगवान केशव और मूल भाग में भगवान ब्रह्मा का निवास माना गया है। इसलिए कुशा को श्रद्धा और शुद्धता के साथ ग्रहण करने की परंपरा है।
यह मान्यता हमें यह संदेश भी देती है कि सनातन संस्कृति में प्रकृति की प्रत्येक उपयोगी वस्तु को केवल भौतिक दृष्टि से नहीं देखा गया, बल्कि उसके संरक्षण और सम्मान को धार्मिक जीवन का हिस्सा बनाया गया।
सालभर के कर्मकांड में काम आती है कुशा : कुशाग्रहणी अमावस्या का सबसे बड़ा विशेष पक्ष यही है कि इस दिन ग्रहण की गई कुशा का उपयोग पूरे वर्ष विभिन्न धार्मिक कार्यों में किया जाता है। विशेष रूप से श्राद्ध और तर्पण के समय कुशा का प्रयोग महत्वपूर्ण माना जाता है।
वैदिक कर्मकांडों में संकल्प लेते समय हाथ में कुशा धारण करने, आसन के रूप में कुशा का प्रयोग करने तथा पितरों को तर्पण देते समय कुशा का उपयोग करने की परंपरा है। यज्ञ और हवन जैसे धार्मिक अनुष्ठानों में भी इसका उपयोग किया जाता है।
इस दृष्टि से यह अमावस्या आने वाले पितृपक्ष की तैयारी से भी जुड़ी हुई है। भाद्रपद अमावस्या के बाद शीघ्र ही पितृपक्ष का आगमन होता है। इसलिए इस समय पितरों के प्रति श्रद्धा, स्मरण और सेवा का भाव और अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है।
कैसे करें कुश का ग्रहण : कुशा ग्रहण करने से पहले स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करने की परंपरा है। मन को शांत रखते हुए ईश्वर का स्मरण करना चाहिए। इसके बाद स्वच्छ स्थान पर उगी हुई पवित्र कुशा का चयन किया जाता है।
कुशा को पैरों से कुचलना, गंदे स्थान से उठाना अथवा बिना श्रद्धा के तोड़ना उचित नहीं माना जाता। परंपरा में कुशा को विधिपूर्वक ग्रहण करने और उसके प्रति सम्मान रखने का विधान है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में कुश ग्रहण करने की विधि में अंतर हो सकता है। इसलिए परिवार की परंपरा अथवा योग्य आचार्य के मार्गदर्शन को प्राथमिकता देना उचित है।
अमावस्या का संबंध पितरों से माना गया है। इसलिए इस दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान करके पितरों का स्मरण करते हैं। सामर्थ्य के अनुसार जल और काले तिल से तर्पण किया जाता है तथा जरूरतमंद व्यक्ति को अन्न, वस्त्र अथवा उपयोगी सामग्री का दान किया जाता है।
पितरों के नाम से भोजन कराना और गौ, कुत्ते, पक्षियों आदि के लिए अन्न-पानी की व्यवस्था करना भी सेवा और करुणा की भावना को मजबूत करता है।
इसका वास्तविक संदेश केवल कर्मकांड तक सीमित नहीं है। अमावस्या हमें अपने पूर्वजों को याद करने, उनके प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने और परिवार की अगली पीढ़ी को अपनी परंपराओं से जोड़ने का अवसर देती है।
कुशा क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
कुशा की महत्ता का एक कारण यह भी है कि वैदिक परंपरा में इसे शुद्धता और संरक्षण का प्रतीक माना गया। धार्मिक अनुष्ठान में कुशा का प्रयोग व्यक्ति को अपने मन, वाणी और कर्म की पवित्रता का स्मरण कराता है।
कुशा का उपयोग केवल पूजा तक सीमित नहीं है। संकल्प, तर्पण, श्राद्ध, हवन और यज्ञ जैसे अनेक संस्कारों में इसका उल्लेख मिलता है। यही कारण है कि वर्षभर की धार्मिक आवश्यकता को ध्यान में रखते हुए इस अमावस्या पर कुशा संग्रह करने की परंपरा विकसित हुई।
अमावस्या का एक गहरा आध्यात्मिक संदेश है हम जिस जीवन को जी रहे हैं, उसके पीछे अनेक पीढ़ियों का योगदान है। हमारे माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी और उनसे भी पहले के पूर्वजों ने परिवार, संस्कार और संस्कृति की जो विरासत हमें दी, उसका स्मरण करना हमारी जिम्मेदारी है।
पितरों का स्मरण केवल किसी विशेष दिन किया जाने वाला कर्मकांड नहीं, बल्कि उनके प्रति कृतज्ञता का भाव है। कुशाग्रहणी अमावस्या इसी भाव को और मजबूत करती है।
घर में कैसे करें अमावस्या की सरल पूजा : इस दिन प्रातः स्नान करके घर के पूजा स्थान की सफाई करें। भगवान विष्णु, भगवान शिव, माता-पार्वती अथवा अपने इष्टदेव का स्मरण करें। इसके बाद पितरों का ध्यान करके जल में काले तिल डालकर श्रद्धापूर्वक तर्पण किया जा सकता है।
इसके पश्चात - दीप प्रज्ज्वलित करें।
- पितरों का स्मरण करें।
- सामर्थ्य के अनुसार अन्न या वस्त्र का दान करें।
- जरूरतमंद को भोजन कराएं।
- पशु-पक्षियों के लिए अन्न और जल रखें।
- घर में सात्विक वातावरण बनाए रखें।
- ईश्वर के नाम का जप और ध्यान करें।
- वर्षभर के धार्मिक कार्यों के लिए विधिपूर्वक कुशा सुरक्षित रखें।
यदि किसी व्यक्ति को श्राद्ध या तर्पण की विस्तृत विधि का ज्ञान न हो तो किसी योग्य आचार्य से मार्गदर्शन लेना बेहतर है।
कुशोत्पाटिनी अमावस्या केवल कुशा एकत्र करने का दिन नहीं है। यह प्रकृति के प्रति सम्मान, पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और धर्म के प्रति आस्था का पर्व है।
आज जब आधुनिक जीवन में परिवार और परंपराओं के बीच दूरी बढ़ रही है, ऐसे पर्व हमें अपनी जड़ों से जोड़ने का अवसर देते हैं। बच्चों को कुशा की महत्ता, पितृ स्मरण, दान और सेवा की परंपरा समझाना भी हमारी सांस्कृतिक जिम्मेदारी है।
कुश कैसी होनी चाहिए?
धार्मिक कार्यों के लिए कुश स्वच्छ, हरी और पूर्ण होनी चाहिए। उसे गंदे स्थान, कूड़े-कचरे या अपवित्र स्थान से ग्रहण नहीं करना चाहिए। कुश को श्रद्धा से ग्रहण करके स्वच्छ स्थान पर सुरक्षित रखना चाहिए।
शास्त्रीय परंपरा में भाद्रपद अमावस्या पर ग्रहण की गई दर्भा को विशेष रूप से पूरे वर्ष धार्मिक कार्यों में उपयोग योग्य माना गया है। यही कारण है कि इस अमावस्या को कुशाग्रहणी या कुशोत्पाटिनी अमावस्या कहा जाता है।
कुश ग्रहण करते समय केवल पौधा उखाड़ने की भावना न रखें, बल्कि इसे देवकार्य, पितृकार्य और धार्मिक संस्कारों के लिए पवित्र सामग्री ग्रहण करने का संस्कार मानें। इसके बाद प्राप्त कुशा को पूजा, संकल्प, तर्पण, श्राद्ध और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है।
