सरकार बरकरार, जनता दरकिनार?

 -चुनाव परिणाम घोषित होते ही गूंजने वाला यह नारा, सच्चाई या राजनीतिक भ्रम?

विनोद कुमार झा 

हर चुनाव के बाद कुछ शब्द अचानक हवा में तैरने लगते हैं। जीतने वालों के समर्थक विजय गीत गाते हैं तो हारने वाले पक्ष के बीच एक वाक्य बार-बार सुनाई देता है "सरकार बरकरार, जनता दरकिनार।" चुनावी परिणामों के बाद यह नारा केवल राजनीतिक प्रतिक्रिया नहीं होता, बल्कि लोकतंत्र की कार्यप्रणाली, जनता की अपेक्षाओं और सत्ता की जवाबदेही पर एक गंभीर प्रश्न भी खड़ा करता है। लेकिन क्या वास्तव में सरकारें जनता को दरकिनार कर देती हैं, या यह चुनावी पराजय से उपजी एक धारणा मात्र होती है? इस प्रश्न का उत्तर लोकतंत्र की गहराइयों में छिपा हुआ है।

लोकतंत्र में सरकार जनता द्वारा चुनी जाती है। चुनाव के दौरान नेता गांव-गांव, शहर-शहर जाकर जनता से संवाद करते हैं। सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा, स्वास्थ्य, रोजगार और सुरक्षा जैसे मुद्दे प्रमुखता से उठाए जाते हैं। उम्मीदवार खुद को जनता का सेवक बताते हैं और यह भरोसा दिलाते हैं कि सत्ता में आने के बाद उनकी प्राथमिकता आम नागरिकों का कल्याण होगी। लेकिन जैसे ही चुनाव समाप्त होते हैं और सरकार का गठन होता है, जनता के एक वर्ग को यह महसूस होने लगता है कि उनकी आवाज पहले जैसी नहीं सुनी जा रही। यहीं से "सरकार बरकरार, जनता दरकिनार" जैसी धारणाएं जन्म लेने लगती हैं।

इस सोच के पीछे कुछ वास्तविक कारण भी हैं। अक्सर देखा गया है कि चुनावी घोषणापत्र में किए गए अनेक वादे समय पर पूरे नहीं हो पाते। बेरोजगारी, महंगाई, स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी और स्थानीय समस्याएं वर्षों तक जस की तस बनी रहती हैं। जनता को लगता है कि चुनाव के समय जो नेता उनके घर तक पहुंचते थे, वे सत्ता मिलने के बाद आम नागरिकों से दूर हो गए हैं। जनप्रतिनिधियों की प्राथमिकताएं बदल गई हैं और जनता की अपेक्षाएं फाइलों के ढेर में दबकर रह गई हैं।

हालांकि तस्वीर का दूसरा पक्ष भी उतना ही महत्वपूर्ण है। किसी भी सरकार के सामने केवल चुनावी वादे पूरे करना ही चुनौती नहीं होती, बल्कि आर्थिक संसाधनों का प्रबंधन, राष्ट्रीय सुरक्षा, वैश्विक परिस्थितियों से निपटना, प्राकृतिक आपदाओं का सामना करना और विकास योजनाओं को धरातल पर उतारना भी उसकी जिम्मेदारी होती है। कई बार सरकारें ऐसे निर्णय लेती हैं जो तत्काल लोकप्रिय नहीं होते, लेकिन दीर्घकालिक दृष्टि से आवश्यक माने जाते हैं। ऐसे में जनता के एक हिस्से को यह महसूस हो सकता है कि उनकी मांगों की अनदेखी की जा रही है, जबकि सरकार व्यापक हितों को ध्यान में रखकर काम कर रही होती है।

वास्तविक समस्या तब पैदा होती है जब सरकार और जनता के बीच संवाद कमजोर पड़ जाता है। लोकतंत्र केवल मतदान तक सीमित नहीं है। यह निरंतर संवाद, सहभागिता और जवाबदेही की व्यवस्था है। यदि सरकार जनता की बात सुनना बंद कर दे, जनप्रतिनिधि क्षेत्र से कट जाएं और प्रशासन आम लोगों की समस्याओं के प्रति संवेदनशील न रहे, तो जनता में असंतोष बढ़ना स्वाभाविक है। दूसरी ओर यदि नागरिक भी चुनाव के बाद अपनी लोकतांत्रिक जिम्मेदारियों से विमुख हो जाएं और केवल अगले चुनाव का इंतजार करें, तो लोकतंत्र की आत्मा कमजोर पड़ जाती है।

सोशल मीडिया के इस दौर में धारणाएं बहुत तेजी से बनती और फैलती हैं। कभी-कभी कुछ घटनाओं के आधार पर पूरे शासन तंत्र को कठघरे में खड़ा कर दिया जाता है, जबकि कई बार वास्तविक समस्याओं को प्रचार के शोर में दबा दिया जाता है। इसलिए यह आवश्यक है कि किसी भी निष्कर्ष पर पहुंचने से पहले तथ्यों, नीतियों और उनके प्रभावों का निष्पक्ष मूल्यांकन किया जाए।

"सरकार बरकरार, जनता दरकिनार" एक ऐसा वाक्य है जो लोकतंत्र को आईना दिखाता है। यह सरकारों को याद दिलाता है कि सत्ता का वास्तविक स्रोत जनता है और जनता की उपेक्षा किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए शुभ संकेत नहीं हो सकती। वहीं यह जनता को भी स्मरण कराता है कि लोकतंत्र केवल वोट देने का अधिकार नहीं, बल्कि सत्ता से निरंतर जवाब मांगने और जनहित के मुद्दों पर सक्रिय रहने की जिम्मेदारी भी है।

 यह कहना पूरी तरह सही नहीं होगा कि हर बार सरकार बरकरार रहते ही जनता दरकिनार हो जाती है। लेकिन यह भी उतना ही सत्य है कि जब जनता की उम्मीदें और सरकार की प्राथमिकताएं एक-दूसरे से दूर होने लगती हैं, तब यह नारा केवल राजनीतिक टिप्पणी नहीं रह जाता, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य पर एक गंभीर चेतावनी बन जाता है। किसी भी राष्ट्र की मजबूती इस बात में नहीं कि सरकार कितने समय तक सत्ता में रहती है, बल्कि इस बात में है कि वह जनता के कितने करीब रहती है। लोकतंत्र की असली जीत तब होती है जब सरकार भी बरकरार रहे और जनता भी केंद्र में रहे।

(स्वतंत्र लेखक एवं सामाजिक विश्लेषक)

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