विनोद कुमार झा
त्रेतायुग में जब अधर्म अपने चरम पर था और लंका का स्वर्णिम साम्राज्य रावण के पराक्रम से जगत में प्रसिद्ध था, तब उसी लंका में एक ऐसा महापुरुष भी रहता था, जिसका हृदय धर्म, सत्य और भगवान के प्रति भक्ति से भरा हुआ था। वह थे विभीषण।
राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद विभीषण का स्वभाव अपने भाइयों रावण और कुंभकर्ण से बिल्कुल भिन्न था। जहाँ रावण शक्ति और अहंकार का प्रतीक था, वहीं विभीषण विनम्रता, नीति और धर्म का स्वरूप थे। यही कारण है कि आज भी लोग उनके जीवन को इस प्रश्न के साथ याद करते हैं कि आखिर विभीषण कौन थे और क्या वे किसी देवता के अवतार थे?
विभीषण का जन्म महर्षि विश्रवा और राक्षसी कैकसी के घर हुआ था। उनके बड़े भाई रावण और कुंभकर्ण थे, जबकि बहन का नाम शूर्पणखा था। बचपन से ही विभीषण का मन भगवान की भक्ति, तपस्या और सदाचार में लगता था। जब उनके भाई शक्ति और साम्राज्य प्राप्त करने के लिए कठोर तप कर रहे थे, तब विभीषण ने भी ब्रह्माजी की आराधना की।
ब्रह्माजी उनके तप से प्रसन्न हुए और वरदान माँगने को कहा। विभीषण ने धन, राज्य या अपार शक्ति नहीं माँगी। उन्होंने प्रार्थना की "हे प्रभु! मुझे ऐसा वरदान दीजिए कि मेरा मन सदैव धर्म के मार्ग पर चले और मैं किसी भी परिस्थिति में सत्य का साथ न छोड़ूँ।"
विभीषण की इस महान भावना से ब्रह्माजी अत्यंत प्रसन्न हुए। उन्होंने उन्हें धर्मपरायण रहने का वरदान दिया और दीर्घायु होने का आशीर्वाद भी प्रदान किया।
क्या विभीषण किसी देवता के अवतार थे?
वाल्मीकि रामायण, रामचरितमानस और अधिकांश प्राचीन ग्रंथों में विभीषण को किसी देवता का प्रत्यक्ष अवतार नहीं बताया गया है। वे एक धर्मात्मा राक्षस और भगवान श्रीराम के महान भक्त के रूप में वर्णित हैं।
कुछ लोककथाओं और पौराणिक मान्यताओं में उन्हें भगवान विष्णु के दिव्य अंश से संबंधित माना गया है, लेकिन इसका स्पष्ट प्रमाण प्रमुख रामायण ग्रंथों में नहीं मिलता। इसलिए सनातन परंपरा में विभीषण को किसी विशेष देवता के अवतार से अधिक धर्म के आदर्श पुरुष के रूप में सम्मान दिया जाता है।
जब रावण ने सीता का हरण किया
एक दिन रावण माता सीता का हरण करके उन्हें लंका ले आया। यह घटना विभीषण को बिल्कुल पसंद नहीं आई। उन्होंने रावण को समझाया "भ्राता! आपने एक महान अपराध किया है। माता सीता कोई साधारण स्त्री नहीं हैं। उन्हें उनके पति श्रीराम को लौटा दीजिए। यही आपके और लंका के कल्याण का मार्ग है।" लेकिन अहंकार में डूबे रावण ने विभीषण की बात नहीं मानी। उसने अपने भाई की सलाह को कमजोरी समझा।
विभीषण बार-बार रावण को चेतावनी देते रहे कि श्रीराम कोई साधारण मनुष्य नहीं हैं। वे धर्म की स्थापना के लिए आए हैं। यदि सीता को वापस नहीं किया गया तो लंका का विनाश निश्चित है।
धर्म और परिवार के बीच कठिन निर्णय
जब रावण ने विभीषण का अपमान किया और उन्हें सभा से निकाल दिया, तब उनके सामने जीवन का सबसे कठिन प्रश्न था परिवार का साथ दें या धर्म का?
विभीषण जानते थे कि धर्म का मार्ग आसान नहीं होता। फिर भी उन्होंने सत्य का साथ चुना। उन्होंने लंका छोड़ दी और समुद्र पार करके श्रीराम की शरण में पहुँच गए।
वानर सेना में कई योद्धाओं को उन पर संदेह था। सुग्रीव ने कहा कि यह रावण का भाई है, इस पर विश्वास नहीं किया जा सकता। लेकिन तब श्रीराम ने वह अमर वचन कहा जिसे आज भी शरणागत धर्म का सर्वोच्च उदाहरण माना जाता है, "जो एक बार मेरी शरण में आ जाता है, उसे मैं अवश्य स्वीकार करता हूँ।" श्रीराम ने विभीषण को अपने हृदय से लगा लिया।
लंका विजय में विभीषण की भूमिका
विभीषण ने श्रीराम को लंका की सेना, उसके योद्धाओं और रावण की शक्तियों के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी दी। उन्होंने युद्ध के दौरान कई बार रणनीतिक सहायता प्रदान की।
जब मेघनाद अपने मायावी युद्ध से वानर सेना को परेशान कर रहा था, तब भी विभीषण ने उसके रहस्यों का खुलासा किया। उन्होंने बताया कि रावण का वध कैसे संभव है और उसके अमोघ वरदानों का रहस्य क्या है। उनकी सहायता से धर्म की सेना को विजय प्राप्त हुई।
रावण का अंत और विभीषण का राज्याभिषेक
अंततः वह दिन आया जब श्रीराम के बाणों से रावण का अंत हुआ। लंका का महान योद्धा धराशायी हो गया। युद्ध समाप्त होने के बाद श्रीराम ने विभीषण को लंका का राजा बनाया।
यह केवल एक राज्याभिषेक नहीं था, बल्कि धर्म की विजय का प्रतीक था। जिस व्यक्ति ने सत्य के लिए अपना परिवार, अपना घर और अपना सम्मान तक दाँव पर लगा दिया था, उसे धर्म ने उसका उचित फल प्रदान किया।
सप्त चिरंजीवियों में स्थान
सनातन परंपरा में विभीषण को सप्त चिरंजीवियों में स्थान प्राप्त है। मान्यता है कि भगवान श्रीराम के वरदान से वे आज भी जीवित हैं और धर्म की रक्षा के लिए संसार में विद्यमान हैं।सप्त चिरंजीवियों में अश्वत्थामा, महाबली, वेदव्यास, हनुमान, कृपाचार्य, परशुराम और विभीषण का नाम लिया जाता है।
विभीषण की कथा हमें सिखाती है कि व्यक्ति का जन्म नहीं, बल्कि उसके कर्म उसे महान बनाते हैं। राक्षस कुल में जन्म लेने के बाद भी विभीषण धर्म के पथ पर अडिग रहे। उन्होंने रिश्तों से ऊपर सत्य को रखा और सत्ता से ऊपर धर्म को।
इसलिए विभीषण को केवल रावण का भाई कहकर नहीं याद किया जाता, बल्कि उन्हें धर्म, नीति, सत्य और श्रीराम भक्ति के अमर प्रतीक के रूप में सम्मान दिया जाता है। उनका जीवन हमें यह प्रेरणा देता है कि जब भी अधर्म और धर्म के बीच चुनाव करना पड़े, तब निडर होकर सत्य का साथ देना ही वास्तविक विजय का मार्ग है।
