लेखक: विनोद कुमार झा
एक समय की बात है। एक बड़े और चहल-पहल वाले शहर में दो भिखारी रहते थे। दोनों की दोस्ती पूरे शहर में मशहूर थी। एक का नाम था तुनुक और दूसरे का नाम था मुनुक।
तुनुक अपने नाम की तरह ही तुनुकमिजाज था। छोटी-सी बात पर गुस्सा हो जाना उसकी आदत थी। कोई उसे कम पैसे दे दे, कोई उसकी बात न सुने, या कोई मजाक कर दे, तो वह तुरंत नाराज हो जाता था। दूसरी ओर मुनुक बहुत ही सीधा-सादा और मंदबुद्धि था। लोग जो भी कहते, वह आसानी से मान लेता। उसे दुनिया की चालाकियां समझ में नहीं आती थीं।
दोनों रोज सुबह शहर के मुख्य बाजार में जाकर भीख मांगते थे। शाम को जो कुछ मिलता, उसे मिल-बांटकर खाते और एक पुराने बरगद के पेड़ के नीचे सो जाते।
एक दिन बाजार में खूब भीड़ थी। तुनुक और मुनुक दोनों भीख मांग रहे थे। तभी एक अमीर व्यापारी वहां से गुजरा। उसने तुनुक को दस रुपये और मुनुक को पचास रुपये दे दिए। यह देखकर तुनुक का पारा चढ़ गया।
"यह अन्याय है!" वह चिल्लाया। "मुझे केवल दस रुपये और इस मंदबुद्धि मुनुक को पचास रुपये! आखिर क्यों?"
व्यापारी मुस्कुराया और बोला, "मैंने मुनुक को इसलिए ज्यादा पैसे दिए क्योंकि उसने मुझे हंसाया।" तुनुक और भी नाराज हो गया। उसने गुस्से में व्यापारी को बहुत कुछ सुना दिया। व्यापारी चुपचाप चला गया।
मुनुक ने मासूमियत से पूछा, "भाई तुनुक, हंसाने से ज्यादा पैसे मिलते हैं क्या?" तुनुक ने झल्लाकर कहा, "चुप रहो! तुम्हें कुछ नहीं पता।"
अगले दिन मुनुक ने सोचा कि यदि लोगों को हंसाने से ज्यादा पैसे मिलते हैं, तो वह यही करेगा। वह बाजार में खड़ा होकर अजीब-अजीब चेहरे बनाने लगा। कभी बंदर की तरह उछलता, कभी बिल्ली की आवाज निकालता। लोग उसे देखकर हंसने लगे। किसी ने दो रुपये दिए, किसी ने पांच रुपये। शाम तक मुनुक के पास अच्छी-खासी रकम जमा हो गई।
जब तुनुक ने यह देखा, तो उसे ईर्ष्या होने लगी। उसने भी लोगों को हंसाने की कोशिश की, लेकिन उसका गुस्सैल स्वभाव बीच में आ जाता। कोई हंसता तो उसे लगता कि लोग उसका मजाक उड़ा रहे हैं। वह नाराज होकर लोगों से झगड़ने लगता।
धीरे-धीरे शहर के लोग मुनुक को पसंद करने लगे। बच्चे उसके पास आकर खेलते, दुकानदार उसे खाने के लिए कुछ दे देते और राहगीर भी उसे देखकर मुस्कुरा देते।
एक दिन शहर में एक मेले का आयोजन हुआ। वहां एक प्रतियोगिता रखी गई थी, "सबसे मनोरंजक व्यक्ति"। विजेता को एक हजार रुपये का पुरस्कार मिलना था।
मुनुक भी प्रतियोगिता में पहुंच गया। उसने अपने भोलेपन और मजेदार हरकतों से सभी का दिल जीत लिया। लोग हंसते-हंसते लोटपोट हो गए। अंत में निर्णायकों ने उसे विजेता घोषित कर दिया। मुनुक को एक हजार रुपये मिले।
तुनुक यह देखकर दंग रह गया। पहली बार उसे महसूस हुआ कि उसका गुस्सा ही उसकी सबसे बड़ी कमजोरी है।
उस रात वह बरगद के पेड़ के नीचे चुपचाप बैठा था। मुनुक ने पूछा, "भाई, आज इतने उदास क्यों हो?"
तुनुक ने धीमी आवाज में कहा, "मुनुक, मैं हमेशा सोचता था कि तुम मंदबुद्धि हो। लेकिन आज समझ आया कि लोगों का प्यार पाने के लिए बुद्धिमान होना जरूरी नहीं, अच्छा स्वभाव होना जरूरी है।"
मुनुक मुस्कुराया और बोला, "मुझे तो कुछ ज्यादा समझ नहीं आता, लेकिन इतना जानता हूं कि मुस्कुराने से मन हल्का हो जाता है।" तुनुक ने पहली बार दिल खोलकर हंसी लगाई।
उस दिन के बाद उसने अपने गुस्से पर नियंत्रण करना शुरू कर दिया। अब वह लोगों से प्यार से बात करता। धीरे-धीरे उसकी भी पहचान एक अच्छे इंसान के रूप में बनने लगी।
कुछ महीनों बाद दोनों ने भीख मांगना छोड़ दिया। मेले में मिले पैसों से उन्होंने चाय और पकौड़ी का एक छोटा-सा ठेला लगा लिया। मुनुक ग्राहकों को अपनी मजेदार बातों से हंसाता और तुनुक हिसाब-किताब संभालता।
देखते ही देखते उनका ठेला पूरे शहर में प्रसिद्ध हो गया।
लोग कहते थे, "एक समय था जब तुनुक गुस्से के लिए और मुनुक अपनी मंदबुद्धि के लिए जाने जाते थे। आज दोनों अपनी मेहनत, दोस्ती और मुस्कान के लिए पहचाने जाते हैं।"
शिक्षा: मनुष्य की सबसे बड़ी ताकत उसका अच्छा व्यवहार और सकारात्मक सोच है। गुस्सा रिश्तों को तोड़ता है, जबकि मुस्कान और विनम्रता लोगों के दिल जीत लेती है।
