लघुकथा: सुलगते अंगारे, जलते घर...

 विनोद कुमार झा 

गर्मियों की एक तपती दोपहर थी। आसमान से आग बरस रही थी और धरती तवे की तरह तप रही थी। गाँव के किनारे बसे छोटे से मकान में रामदयाल अपने परिवार के साथ रहता था। मेहनत-मजदूरी करके वह अपने परिवार का पेट पालता था। उसकी पत्नी सीता और दो बच्चे उसके जीवन की सबसे बड़ी पूँजी थे। घर भले ही साधारण था, लेकिन उसमें प्रेम और अपनापन भरा हुआ था।

उस दिन खेतों में काम करने के बाद रामदयाल थका-हारा घर लौटा। घर के आँगन में मिट्टी का चूल्हा जल रहा था। सीता खाना बना रही थी। तेज हवा चल रही थी और चूल्हे से निकलती चिंगारियाँ इधर-उधर उड़ रही थीं। सीता ने कई बार बच्चों को चूल्हे के पास न आने की हिदायत दी थी, लेकिन बच्चे खेल में मस्त थे। किसी ने ध्यान नहीं दिया कि एक छोटी-सी चिंगारी हवा के साथ उड़कर घर के पीछे रखे सूखे भूसे के ढेर पर जा गिरी।

शुरुआत में किसी को कुछ पता नहीं चला। भूसे के ढेर में धीरे-धीरे धुआँ उठने लगा। कुछ ही मिनटों में वह धुआँ आग की लपटों में बदल गया। तेज हवा ने आग को और भड़का दिया। देखते ही देखते आग ने पूरे भूसे के ढेर को अपनी चपेट में ले लिया। जब पड़ोसियों की नजर उस पर पड़ी, तब तक आग घर की दीवारों तक पहुँच चुकी थी।

"आग... आग... बचाओ!" की आवाज पूरे गाँव में गूँज उठी।

रामदयाल और सीता घबराकर बाहर भागे। उन्होंने देखा कि उनके सपनों का आशियाना आग की भयंकर लपटों में घिर चुका है। पड़ोसी बाल्टियों में पानी भर-भरकर आग बुझाने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन हवा इतनी तेज थी कि आग लगातार फैलती जा रही थी। कुछ लोग घर के भीतर रखे सामान को बचाने में जुट गए।

रामदयाल की आँखों के सामने उसकी वर्षों की मेहनत जल रही थी। बच्चों की किताबें, कपड़े, अनाज और घर की छोटी-बड़ी जमा पूँजी सब आग की भेंट चढ़ रहे थे। सीता की आँखों से आँसू बह रहे थे। वह भगवान से प्रार्थना कर रही थी कि किसी तरह उनका घर बच जाए।

काफी देर बाद दमकल की गाड़ी पहुँची। दमकल कर्मियों ने घंटों की मशक्कत के बाद आग पर काबू पाया, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। घर का अधिकांश हिस्सा जलकर राख हो चुका था। जहाँ कभी खुशियों की आवाजें गूँजती थीं, वहाँ अब केवल धुएँ और राख का ढेर बचा था।

उस रात रामदयाल का परिवार खुले आसमान के नीचे बैठा था। उनके पास न पहनने के लिए पर्याप्त कपड़े थे और न रहने के लिए घर। गाँव वालों ने मिलकर उन्हें भोजन और अस्थायी आश्रय दिया। लोगों की सहानुभूति ने उनके दुख को कुछ कम जरूर किया, लेकिन उनके मन में घर खोने का दर्द गहरा था।

अगले दिन गाँव की पंचायत ने बैठक बुलाई। सभी लोगों ने निर्णय लिया कि रामदयाल के परिवार की मदद की जाएगी। किसी ने ईंटें दीं, किसी ने सीमेंट, तो किसी ने आर्थिक सहायता की। युवाओं ने श्रमदान करने का संकल्प लिया। धीरे-धीरे एक बार फिर नया घर बनने लगा।

कुछ महीनों बाद उसी जगह पर एक नया और मजबूत घर खड़ा था। गृह प्रवेश के दिन रामदयाल की आँखों में खुशी के आँसू थे। उसने गाँव वालों का धन्यवाद करते हुए कहा, "एक छोटी-सी चिंगारी ने मेरा घर जला दिया, लेकिन आप सबके प्रेम और सहयोग ने मेरे जीवन की उम्मीद को फिर से जगा दिया।"

उस दिन रामदयाल ने एक बात गहराई से समझी सुलगते अंगारे केवल घर ही नहीं जलाते, वे लापरवाही की कीमत भी याद दिलाते हैं। लेकिन जब समाज साथ खड़ा हो जाए, तो राख से भी नए सपनों का निर्माण किया जा सकता है।

छोटी-सी लापरवाही बड़े नुकसान का कारण बन सकती है। साथ ही, कठिन समय में समाज का सहयोग किसी भी व्यक्ति के जीवन में नई आशा का संचार कर सकता है।

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