‘झाल मुड़ी’ बदली और ‘बिरयानी’ फीकी पड़ी

 विनोद कुमार झा 

पश्चिम बंगाल की राजनीति कभी भी केवल मतपेटियों का खेल नहीं रही; यह संस्कृति, विचारधारा और तीखे संघर्षों का एक जटिल मिश्रण रही है। दशकों तक 'लाल' दुर्ग रहने के बाद, बंगाल ने 'हरे' रंग की परिवर्तनकारी लहर देखी थी। लेकिन वर्तमान चुनावी परिणामों ने एक नए और अभूतपूर्व अध्याय की शुरुआत कर दी है। इस बार के नतीजे केवल सत्ता परिवर्तन के संकेत नहीं हैं, बल्कि यह बंगाल की 'राजनैतिक रसोई' में आए उस बदलाव की कहानी है जहाँ पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद फीका पड़ गया है और नए जायके ने अपनी जगह बना ली है।

बंगाल के ग्रामीण हाट-बाजारों और शहरी नुक्कड़ों पर मिलने वाली 'झाल मुड़ी' वहाँ की सादगी और आम जनजीवन का प्रतीक है। चुनावी विश्लेषकों के लिए सबसे बड़ा आश्चर्य 'झाल मुड़ी' के इस पारंपरिक स्वाद का 'भगवा' रंग में रंग जाना है। यह इस बात का प्रमाण है कि भारतीय जनता पार्टी की विचारधारा अब केवल कोलकाता के 'भद्रलोक' तक सीमित नहीं रही, बल्कि उसने उन सुदूर गांवों के 'पांत' (पंगत) में भी जगह बना ली है जहाँ कभी वामपंथ या तृणमूल का एकाधिकार था। झाल मुड़ी का भगवा होना यह दर्शाता है कि आम मतदाता अब केवल 'अस्मिता' की राजनीति से संतुष्ट नहीं है। उसे केंद्र की योजनाओं का सीधा लाभ, सुरक्षा का अहसास और एक नई राजनैतिक पहचान की आकांक्षा है। यह रंग बदलाव उस 'सबअल्टरन' (अधःस्थ) वर्ग की आवाज़ है जिसने खुद को वर्षों से हाशिए पर महसूस किया था।

पिछले एक दशक में ममता बनर्जी की राजनीति ने 'बिरयानी' जैसी एक विशिष्ट छवि गढ़ी थी मसालेदार, लुभावनी और खास वर्गों को तृप्त करने वाली। उनकी लोक-लुभावन योजनाओं (Dole Politics) और तुष्टीकरण के आरोपों के इर्द-गिर्द बुनी गई यह रणनीति इस बार अपनी खुशबू खोती दिखी। 'दीदी' के करिश्मे पर भारी पड़ती 'एंटी-इनकंबेंसी' (सत्ता विरोधी लहर) ने यह साफ कर दिया कि जनता अब 'मुफ्त' की सौगातों से आगे बढ़कर संस्थागत सुधार और भ्रष्टाचार मुक्त शासन की मांग कर रही है। 'कट मनी' और स्थानीय स्तर पर सिंडिकेट राज के आरोपों ने उस बिरयानी के स्वाद को कड़वा कर दिया, जिसे तृणमूल कांग्रेस अपना सबसे बड़ा हथियार मानती थी। यह इस बात का संकेत है कि चुनावी प्रबंधन और रैलियों की भीड़ हमेशा वफादार वोट बैंक में तब्दील नहीं होती।

इस चुनाव की सबसे मार्मिक और प्रतीकात्मक उपलब्धि 'हरे रंग' का 'लाल' में परिवर्तित होना है। यहाँ ध्यान देना आवश्यक है कि यह 'लाल' रंग मार्क्सवादी विचारधारा की वापसी का सूचक नहीं, बल्कि पराजय के उस घाव और 'खतरे' (Danger) का प्रतीक है जो किसी भी सत्ताधारी दल के लिए अंतिम चेतावनी होता है। तृणमूल का वह 'हरा' रंग, जो विकास और शांति का दावा करता था, अब चुनावी हिंसा, प्रशासनिक विफलताओं और जनाक्रोश की 'लाल' रेखाओं से ढक गया है।जब सत्ता का रंग लाल होने लगे, तो इसका अर्थ है कि लोकतंत्र के भीतर एक बड़ा 'स्टॉप' (विराम) लग चुका है। यह लाल रंग उन मतदाताओं के गुस्से का प्रतिबिंब है जिन्होंने बदलाव के लिए चुप्पी साधी थी, लेकिन बटन दबाते समय अपनी नाराजगी को स्पष्ट कर दिया।

क्या यह एक स्थायी बदलाव है? बंगाल की माटी में यह रंग-परिवर्तन रातों-रात नहीं हुआ है। यह वर्षों के असंतोष और नई राजनीतिक खाद का परिणाम है। झाल मुड़ी का भगवा होना और बिरयानी का बेअसर होना बंगाल के सामाजिक ताने-बाने में आ रहे उस बदलाव की तस्दीक करता है जहाँ अब 'विचारधारा' से ज्यादा 'परिणाम' मायने रखते हैं। आने वाले समय में यह देखना चुनौतीपूर्ण होगा कि क्या भगवा रंग बंगाल की सांस्कृतिक विरासत के साथ सामंजस्य बिठा पाएगा, या फिर यह भी एक अस्थायी राजनीतिक प्रयोग बनकर रह जाएगा। फिलहाल, बंगाल ने अपना जनादेश लिख दिया है पुराने प्रतीक ध्वस्त हो चुके हैं और नए रंगों ने सत्ता के गलियारों में दस्तक दे दी है। यह संदेश स्पष्ट है: बंगाल का स्वाद और स्वाभिमान अब नई दिशाओं की ओर अग्रसर है।

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