विनोद कुमार झा
मिथिलांचल के एक छोटका गाम में, जहाँ माटि के सोंधी गंध आ अपनापा हर घर में बसल रहे, ओतहि रहैत छल फूलो देवी। फूलो देवी गरीब जरूर छली, मुदा मन से बहुत धनवान। हुनकर घर में संपत्ति के नाम पर बस एक पुरान परिया साड़ी (हल्की, साधारण सूती साड़ी) आ रोज के भोजन में अक्सर बनैत रहैत छल खेसारिक साग।
गाम के लोग अक्सर कहैत छल “फूलो के घर में कुछो नइ छै, बस परिया साड़ी आ खेसारिक साग।” ई बात कहैत समय किछु लोग हँसी उड़बैत छल, त किछु लोग दया दिखाबैत। मुदा फूलो देवी के चेहरा पर हमेशा संतोष के मुस्कान रहैत छल।
फूलो देवी के एक बेटी छल सरिता। सरिता जवान होइत जा रहल छल आ गाम में हुनकर विवाह के चर्चा शुरू भ’ गेल। मिथिलांचल के परंपरा अनुसार, बेटी के विवाह में साड़ी, गहना, दहेज सब बहुत जरूरी मानल जाइत छल। गाम के औरत सब आपस में कहैत “फूलो अपन बेटी के की देत? ओकरा पास त परिया साड़ी के अलावा कुछो नइ छै।”
एक दिन पड़ोस के बिंदो काकी फूलो से कहली, “फूलो, तोहर बेटी के बियाह के बात चल रहल छै, मुदा तू की देब? एहन गरीबी में समाज की कहत?”
फूलो मुस्कुरा के कहली, “काकी, हम अपन बेटी के संस्कार देब, मेहनत सिखाएब, ई सब सों बड़ा दहेज होइ छै।”गाम के लोग ई बात सुन के फेर हँस पड़ल “संस्कार से पेट भरत?”
समय बीतल, आ सरिता के विवाह एक सच्चा, मेहनती लड़का रामनाथ से तय भ’ गेल। रामनाथ गरीब जरूर छल, मुदा दिल के बहुत अमीर। विवाह के दिन फूलो देवी अपन सबसे साफ परिया साड़ी निकालली, ओकरा धो-पोंछ के बेटी के पहिरा देली। भोजन में गाम भर के लोग के खेसारिक साग, भात आ चटनी परोसल गेल।
किछु लोग मुँह बनौलक“एहनो बियाह होइत छै?” मुदा रामनाथ आ ओकर परिवार संतोष से भोजन के प्रशंसा करलक। विवाह के बाद सरिता अपन ससुराल में बहुत मेहनत आ समझदारी से घर संभाललक। धीरे-धीरे ओकरा घर में खुशहाली आब’ लगल। ओ अपन सास-ससुर के सेवा, पति के सहयोग आ अपन व्यवहार से पूरा गाम के दिल जीत लेलक।
कुछ साल बाद, ओहि गाम में एक बड़ा आयोजन भेल। ओतहि सरिता अपन मायके पहुँचल अब ओ सुंदर रेशमी साड़ी में सजल छल, मुदा व्यवहार में ओहि पुरान सादगी छल। गाम के लोग आश्चर्य में पड़ि गेल।
बिंदो काकी धीरे से फूलो से कहली, “फूलो, तोहर बात सही रहल। संस्कार सच में सबसों बड़ा धन छै।”
फूलो देवी हँस के कहली, “परिया साड़ी आ खेसारिक साग गरीब के पहचान जरूर हो सकैत छै, मुदा इज्जत आ सुख त मन के सच्चाई से आवैत छै।” ओ दिन गाम के लोग के समझ में आबि गेल कि मिथिलांचल में सिर्फ बाहरी दिखावा या दहेज से सम्मान नहीं मिलैत, बल्कि असली सम्मान संस्कार, मेहनत आ सादगी से बनैत छै।
ई कहानी मिथिलांचल के ओ सामाजिक सोच पर चोट करैत छै, जतय अक्सर गरीबी के मजाक बनाओल जाइत छै। मुदा असल में, “परिया साड़ी आ खेसारिक साग” सिर्फ अभाव के प्रतीक नहि, बल्कि सादगी, आत्मसम्मान आ जीवन के सच्चाई के प्रतीक छै।
